'मदर इंडिया' का बिरजू (1957), 'जिस देश में गंगा बहती है' का राका (1960), 'मेरा गांव मेरा देश' का जब्बर सिंह (1971) या 'कच्चे धागे' का ठाकुर लक्ष्मण सिंह (1973), हिंदी सिनेमा के दर्शकों के लिए डकैत नए नहीं थे। 1975 में आई 'शोले' का डाकू गब्बर सिंह इन डकैतों से बिलकुल अलग था। मैनरिज्म और कॉस्ट्यूम में हिंदी सिनेमा के पिछले सभी डकैतों से गब्बर अलग था, वह उस विलेन की तरह बिलकुल नहीं सोचता था, जिसकी आदत हिंदी सिनेमा के दर्शकों को थी। मदर इंडिया, जिस देश में गंगा बहती है और मेरा गांव मेरा देश की धारणा थी कि डकैत हालात की उपज होते हैं। गब्बर का फलसफा ही क्रूरता थी।
गब्बर सिंह के 'कितने आदमी थे' बोलते ही पसर जाता था सन्नाटा, क्रूर विलेन बन रचा इतिहास
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सलीम-जावेद ने एक ऐसा चरित्र गढ़ा था, जिसने किसी मकसद के लिए डकैती को नहीं चुना, बल्कि उसका मकसद ही डकैती थी। बिरजू का रोमांटिक शेड, राका का नर्म दिल गब्बर में नहीं था। वह हिंदी सिनेमा का 'नया विलेन' था। पथरीले भरकों में गंदी कमीज, बढ़ी हुई दाढ़ी, खैनी चबाकर पिच्च से थूकता गब्बर सौंदर्यशास्त्र के उस खांचे में नहीं ढाला गया था, जिस खांचे में हिंदी सिनेमा के उस समय तक के विलेन गढे़ गए थे। वह फूहड़ और सैडिस्टिक था। गब्बर ने हिंदी सिनेमा की खल-चरित्र को नया आयाम दिया। गब्बर के बाद हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने विलेन के नए नजरिये से देखना शुरू किया।
1974 में रमेश सिप्पी, अमजद खान और उनकी पत्नी शेहला खान ने बंगलौर की एक टैरो कार्ड रीडर से मुलाकात की थी। उन दिनों 'शोले' की शूटिंग बंगलौर के बाहरी इलाके रामनगरम में हो रही थी। अमजद खान अपने भाई इम्तियाज खान के साथ थियेटर में सक्रिय थे, लेकिन बॉलीवुड में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वह 1951 में आई 'नाजनीन' में बाल कलाकार के रूप में काम कर चुके थे। 17 साल की उम्र में 1957 में उन्होंने 'अब दिल्ली दूर नहीं' में भी काम किया था। 1973 में आई 'हिंदुस्तान की कसम' में भी वह पर्दे पर दिख चुके थे, लेकिन उन्होंने एक ऐसी फिल्म का इंतजार था, जो उन्हें बॉलीवुड में स्थापित कर सके।
बंगलौर की उस टैरो कार्ड रीडर डेलॉरोस परेरा ने अमजद खान की ओर देखकर कहा था, 'शोले के बाद तुम्हारे सितारे बुलंदी पर होंगे।' रमेश सिप्पी से उस महिला ने कहा कि ये फिल्म कई सालों तक सिनेमा हॉल में चलती रहेगी। डेलॉरोस की दोनों ही भविष्यवाणियां सौ फीसदी सच साबित हुई। शोले ने न केवल अमजद खान को बॉलीवुड मे स्थापित किया, बल्कि 'गब्बर सिंह' के रूप में एक किरदार गढ़ा, जो बॉलीवुड के विलेन की कसौटी बन गया। डकैत का 'स्टिरीयोटाइप' कैरैक्टर अमजद खान के मैनरिज्म और संवाद अदायगी के बदौलत 'लार्जर दैन लाइफ' कैरेक्टर में तब्दील हो गया। बॉलीवुड में बाद में शाकाल (शान, 1980) , मुगैंबो (मिस्टर इंडिया, 1987) और जगीरा (चाइनागेट, 1998) जैसे खल चरित्र गढे़ गए, जो कहीं न कहीं गब्बर सिंह के चरित्र से प्रभावित थे।
अमजद जानेमाने चरित्र अभिनेता जयंत (जकारिया खान) के बेटे थे, जो अपनी दमदार आवाज के लिए जाने जाते थे। 1971 में राज खोसला न डकैती की थीम पर ही 'मेरा गांव मेरा देश' बनाई थी, जिसमें जयंत ने हवलदार मेजर जसवंत सिंह की भूमिका निभाई थी। 'शोले' का ठाकुर यानी ठाकुर बलदेव सिंह का कैरेक्टर बहुत हद तक हवलदार मेजर जसवंत सिंह के कैरेक्टर से प्रभावित था। रोचक बात यह थी कि 'शोले' में डकैत गब्बर था और 'मेरा गांव मेरा देश' में जब्बर। जावेद अख्तर ने जयंत की दमदार आवाज अमजद खान में भी ढूंढ़ने की कोशिश की। हालांकि सलीम खान ने एक साक्षात्कार में बताया था कि गब्बर के कैरेक्टर के लिए अमजद का नाम जावेद अख्तर ने ही सुझााया था। उन्होंने अमजद और उनके बड़े भाई इम्तियाज को 1963 में 'ऐ मेरे वतन के लोगों' नाटक में अभिनय करते देखा था।