अभिनेत्री अंकिता लोखंडे फिल्म 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' में सावरकर की पत्नी यमुनाबाई की भूमिका निभा रही हैं। अंकिता लोखंडे मानती है कि यमुनाबाई का ऐसा किरदार है जो आज की महिलाओं के लिए प्रेरणादायक साबित हो सकता है। अभिनेत्री से निर्देशक बनी कंगना रणौत के निर्देशन में फिल्म 'मणिकर्णिका - झांसी की रानी' में काम करने के बाद अंकिता लोखंडे ने अभिनेता से निर्देशक बने रणदीप हुड्डा के साथ फिल्म ''स्वातंत्र्य वीर सावरकर' में काम किया है। अंकिता लोखंडे कहती है कि अगर वह निर्देशक बनी तो रणदीप जैसी निर्देशक बनेंगी। हाल ही में अंकिता लोखंडे ने ‘अमर उजाला’ से खास बातचीत की।
Ankita Lokhande Interview: सावरकर-यमुनाबाई की प्रेम कथा बहुत अनोखी, रणदीप हुड्डा के निर्देशन में दिखी अलग बात
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जब आप से फिल्म 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' के लिए पहली बार संपर्क किया गया तो इस फिल्म को लेकर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या रही?
मैं इस फिल्म को लेकर बहुत ही ज्यादा उत्साहित थी। जब इस फिल्म का ऑफर आया तो सबसे पहले मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि यह सावरकर जी की कहानी है और उनकी पत्नी का किरदार है तो बहुत ही उत्साहित हुई। सावरकर की पत्नी यमुनाबाई का ऐसा किरदार है जिसके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। लेकिन इस किरदार को देखकर आज की महिलाएं काफी प्रेरित होंगी। मुझे बहुत अच्छा लगा कि ऐसा किरदार निभाने का मौका मिला।
सावरकर की पत्नी यमुनाबाई के बारे में आप कितना जानती थी और इस किरदार के लिए आपको किस तरह की तैयारी करनी पड़ी ?
सावरकर के बारे में मैंने थोड़ा बहुत पढ़ा है, लेकिन इससे ज्यादा उनके बारे में सुना था। महाराष्ट्र में इनकी प्रसिद्धि बहुत ज्यादा है। मैं खुद महाराष्ट्रियन परिवार से हूं। लेकिन मुझे सावरकर की पत्नी यमुनाबाई के बारे में ज्यादा पता नहीं था। लेकिन जब इस फिल्म का ऑफर आया तो उनके बारे में पढ़ा कि वह किस तरह की औरत थीं? अपने पति का बहुत ही सम्मान करती थी। छोटी सी उम्र में उन्हें पता था कि उनके पति देशभक्त हैं जिन्हें परिवार से ज्यादा चिंता देश को आजादी दिलाने की थी। यह जानते हुए भी उन्होंने सावरकर से शादी की। इससे पता चलता कि उनका खुद इस देश के लिए कितना प्यार था।
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और क्या खास बात नजर आई यमुनाबाई के किरदार में?
सावरकर का जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण रहा है, इस बात को तो सभी जानते हैं। लेकिन, यमुनाबाई के जीवन में भी बहुत ही संघर्ष रहा है। उन्होंने तलवार और बंदूक से तो युद्ध नहीं किया, लेकिन देश के आजादी के लिए उनका एक अलग युद्ध चल रहा थी। वह चाहतीं तो सावरकर का साथ छोड़कर जा सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इस फिल्म में सावरकर और जमुना बाई की छोटी सी प्रेम कहानी भी देखने को मिलेगी। सावरकर ने अपनी पत्नी के लिए कविताएं भी लिखीं।
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अभिनेता से निर्देशक बने रणदीप हुड्डा के निर्देशन में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा है। उन्हें देखकर यह समझने का मौका मिला कि इस तरह से भी निर्देशन किया जा सकता है। अपने काम के प्रति वह बहुत ही समर्पित थे उनको पता था कि कैसे काम करना है। वह अपने काम को बहुत ही अच्छे तरीके से जानते हैं। उनको डायरेक्शन करते देखती थी तो मुझे बहुत अच्छा लगता था सोचती थी कि अगर मैं कभी डायरेक्टर बनूंगी तो उनके जैसा ही डायरेक्शन करूंगी।
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