हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्राकृतिक रूप से मां बनने के चलन की वापसी का चेहरा बन चुकीं अभिनेत्री अनुष्का शर्मा सिनेमा को बदलाव का बड़ा माध्यम मानती हैं। वह कहती हैं कि सिनेमा समाज में महिलाओँ की छवि बदलने की भी ताकत रखता है। अनुष्का के मुताबिक यही वजह है कि उन्होंने अपने किरदार हमेशा ऐसे चुनें जो बदलते समय की महिलाओं का नजरिया दिखाती हों।
International Women’s Day 2021 पर बोलीं अनुष्का, लीक से अलग करना, फिर तन कर खड़े रहना ही असली शक्ति
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अनुष्का का मानना है कि ‘सुल्तान’, ‘बैंड बाजा बारात’, ‘एनएच10’, ‘फिल्लौरी’, ‘जब तक है जान’, ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और ‘सुई धागा’ जैसी फिल्मों में निभाए उनके किरदारों ने ये दिखाया है कि जिंदगी के फैसले खुद करने के मामले में महिलाएं निडर, साहसी, आत्मनिर्भर, महत्वाकांक्षी और आजाद खयाल हो सकती हैं। अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए भी अनुष्का ऐसी कहानियों को ही तवज्जो दे रही हैं जो महिलाओं को खुद की शर्तों पर जिंदगी जीने वाले इंसान के तौर पर पेश कर सकें।
अनुष्का कहती हैं, “हमारी फिल्में बदलाव लाने की ताकत रखती हैं और अगर ठीक ढंग से काम किया जाए तो फिल्में लोगों को अच्छे-बुरे के बीच फर्क करने की आदत डालना सिखा सकती हैं। सिनेमा में महिलाओं के चरित्र चित्रण के बारे में स्पष्ट होकर ही हम इस बात को लेकर लोगों की मानसिकता बदल सकते हैं कि वे महिलाओं को किस निगाह से देखते हैं। साथ ही साथ हम सदियों पुरानी दकियानूसी मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं को भी ध्वस्त कर सकते हैं।“
परदे पर अपनी भूमिकाओं के बारे में पूछे जाने पर वह कहती हैं, “मेरे खयाल से ऐसी फिल्मों और भूमिकाओं के चयन को लेकर मैं पर्याप्त सचेत रही हूं। मैंने ऐसी फिल्में ही ज्यादा की हैं जिनके बारे में मुझे लगा कि ये स्क्रीन पर महिलाओं के चरित्र चित्रण को बदलने की दिशा में योगदान कर सकती हैं। पहले तो एक कलाकार होने के नाते और बाद में बतौर निर्माता ऐसा सोचने और करने में मेरा आत्मविश्वास बड़े काम आया क्योंकि एक तरह से मैं बहाव की विपरीत दिशा में तैरने की कोशिश कर रही थी और परदे पर अब तक महिलाओं के चित्रण की धारणा और तरीके को चुनौती दे रही थी।“
अनुष्का का मानना है, “लीक से अलग होकर कुछ करना, फिर उसके समर्थन में तन कर खड़े रहना और खुद ऐसा कर पाना मुक्ति का अहसास कराने वाला अनुभव था। फिल्मों में खुद को सजावट की चीज की तरह देखते देखते पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था और मैंने तय किया था कि बतौर निर्माता मैं भी किसी महिला को दकियानूसी और पीछे ढकेलने वाली सोच से दिखाए जाने की इजाजत नहीं दूंगी। मैं समाज में समानता, आत्मसम्मान और महिला सशक्तीकरण को लेकर चर्चा छेड़ने वाला सिनेमा ही बनाना चाहती हूं।”