वर्ल्ड चिल्ड्रंस डे के मौके पर यूनिसेफ के सेलिब्रिटी एडवोकेट आयुष्मान खुराना का मानना है कि कोरोना वायरस महामारी की वजह से बच्चों के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार का खतरा काफी बढ़ गया है। वह कहते हैं कि आमतौर पर बच्चे हर दिन किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार होते हैं!
बच्चों को हिंसा से बचाने के लिए आयुष्मान खुराना ने शुरू की मुहिम, बोले, बचपन बचेगा तभी सुधरेगा भविष्य
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अभिनेता आयुष्मान खुराना अपनी फिल्मों के जरिए समाज में बदलाव लाने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। टाइम मैगजीन ने आयुष्मान को दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक माना और हाल ही में यूनिसेफ ने उन्हें अपने ग्लोबल कैंपेन EVAC (बच्चों के खिलाफ़ हिंसा को खत्म करना) के सेलिब्रिटी एडवोकेट के रूप में नियुक्त किया। वर्ल्ड चिल्ड्रंस डे (20 नवंबर) के मौके पर आयुष्मान ने आने वाली जनरेशन की हिफाजत को बेहद जरूरी बताया। वह कहते हैं कि कोरोना वायरस महामारी की वजह से बच्चों के खिलाफ हिंसा और दुर्व्यवहार का खतरा काफी बढ़ गया है।
आयुष्मान कहते हैं, “हमें मालूम है कि कोविड-19 का यह दौर किसी के लिए भी खासतौर पर बच्चों के लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा है और उन पर हिंसा का खतरा काफी बढ़ गया है। हम जागरूक बनकर और अपने आसपास के बच्चों की हिफाज़त करके इसे रोक सकते हैं। पुरुषों और लड़कों के रूप में हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी यह है कि हम दूसरों के लिए रोल मॉडल बनें, क्योंकि हम जानते हैं कि अक्सर पुरुष ही इस तरह के हिंसा के लिए दोषी होते हैं। यूनिसेफ का सेलिब्रिटी एडवोकेट होने के नाते, मैंने बच्चों के खिलाफ़ होने वाले हिंसा को खत्म करने का संकल्प लिया है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (2018) के अनुसार भारत में हर घंटे चाइल्ड सेक्सुअल अब्यूज के 5 मामले रिपोर्ट किए जाते हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 4 के आंकड़ों से पता चलता है कि 15 साल की उम्र की 5 में से 1 किशोर लड़की को फिजिकल हिंसा का सामना करना पड़ता है। आयुष्मान कहते हैं, किसी भी तरह की हिंसा से मुक्त रहना बच्चों का हक़ है। चाइल्ड राइट्स भी ह्यूमन राइट्स की तरह हैं। हिंसा का बच्चों की जिंदगी पर बड़ा भयंकर परिणाम होता है और उनकी शारीरिक एवं मानसिक सेहत पर इसका काफी बुरा असर होता है। ऐसी घटनाओं से उनकी पूरी ज़िंदगी प्रभावित हो सकती है और फिर बच्चे को खुशहाल, स्वस्थ जीवन जीने का मौका नहीं मिल पाता है।
बच्चों के खिलाफ हिंसा से जुड़े कलंक और टैबू को खत्म करने में आयुष्मान लोगों का साथ चाहते हैं। वह कहते हैं, “अक्सर बच्चे अपने साथ होने वाले हिंसा के बारे में बताते नहीं हैं इसलिए ऐसे ज्यादातर मामलों का पता ही नहीं चल पाता है। बच्चे अपने माता-पिता को इस बारे में नहीं बताते हैं और अगर माता-पिता को इसकी जानकारी हो जाए तब भी वे इसे रिपोर्ट नहीं करते हैं। यौन उत्पीड़न को एक कलंक के तौर पर देखा जाता है और इसी वजह से बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता भी ऐसे मामलों को रिपोर्ट करने से कतराते हैं।”
पढ़ें: ऋषि कपूर के निधन के बाद काम पर वापस लौटीं नीतू, अनुपम खेर ने यूं बढ़ाया अभिनेत्री का हौसला