अगले गुरुवार यानी 29 जुलाई को संजय दत्त 62 साल के हो जाएंगे। अपने परिचितों के बीच संजू बाबा के नाम से पुकारे जाने वाले संजय दत्त दुनिया में उन गिनती के लोगों में हैं, जिनके जीवन काल में ही उनकी बायोपिक बनी और जिसे दर्शकों ने बेइंतहा पसंद भी किया। संजय दत्त 11 साल के थे जब पहली बार वह किसी फिल्म में परदे पर नजर आए, वह फिल्म थी ‘रेशमा और शेरा’ और इस फिल्म को रिलीज हुए 50 साल शुक्रवार को पूरे हो गए। और, इसी के साथ ही संजय दत्त को भी रुपहले परदे पर उतरे हुए 50 साल पूरे हुए। आज के बाइस्कोप में मैं आपको फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से तो बताने ही वाला हूं, साथ ही आप देख सकेंगे इस फिल्म की और इस फिल्म की मेकिंग के दौरान कुछ नायाब तस्वीरें।
Bioscope S2: संजय दत्त को बड़े परदे पर उतरे पूरे हुए 50 साल, आज ही के दिन रिलीज हुई ‘रेशमा और शेरा’
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लेखक एस रजा की काबिलियत को सलाम
लेखक एस अली रजा की लिखी एक दमदार फिल्म रही है, ‘रेशमा और शेरा’। ‘रेशमा और शेरा’ के अलावा रजा हिंदी सिनेमा के चंद नायाब नगीनों मसलन ‘आन’, ‘अंदाज’, ‘मदर इंडिया’, ‘राजा जानी’ और ‘दस नंबरी’ की लेखन टीम का भी हिस्सा रहे। फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ के लिए रजा ने फिल्मफेयर अवार्ड भी जीता और इसी फिल्म को देखने के बाद अभिनेता सुनील दत्त ने उन्हें एक प्रेम कहानी लिखने का न्योता दिया था। एस अली रजा ने एक बहुत ही चर्चित फिल्म ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ निर्देशित भी की। सुनील दत्त ने रजा से वादा किया था कि जब भी वह कोई फिल्म निर्देशित करना चाहेंगे, वह उस फिल्म में काम करने के लिए हमेशा तैयार मिलेंगे। ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ में काम करके सुनील दत्त ने अपना ये वादा पूरा भी किया। लेकिन, फिलहाल बात फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ की।
राजस्थान की अनूठी प्रेम कहानी
एस अली रजा सुनील दत्त की शख्सीयत के कायल थे। बतौर निर्देशक सुनील दत्त की पहली फिल्म ‘यादें’ वह देखकर काफी प्रभावित हुए थे। वह यह भी जानते थे कि सुनील दत्त अपने करियर में पहली बार प्रोड्यूसर अपने भाई सोम दत्त के लिए बने थे। सोम दत्त को सुनील दत्त ने फिल्म ‘मन का मीत’ में लॉन्च किया था। इसके बाद उन्होंने जब अगली फिल्म बनाने की तैयारी की तो एस अली रजा ने पूरी शिद्दत से इसकी कहानी लिखनी शुरू की। राजस्थान के रेतीलों टीलों से उड़ती बहती और हर दूसरे पल में एक नई शक्ल ले लेने वाली मोहब्बत की ये दास्तां भी ‘लैला मजनू’, ‘हीर रांझा’, ‘शीरीं फरहाद’ और ‘ढोला मारू’ की कहानी जैसी है, नाम इसका रखा गया ‘रेशमा और शेरा’। ‘रेशमा और शेरा’ के रिलीज होने की तारीख 23 जुलाई 1971 मिलती है और इस लिहाज से फिल्म ने शुक्रवार को रिलीज के 50 साल पूरे कर लिए।
जब सुलोचना को याद आए बिग बी
एस अली रजा की लिखी फिल्मों में मोहब्बत की एक अलग तासीर नजर आती है। इसकी वजह बताते हैं उनकी वह मोहब्बत जो उन्होनें फिल्म ‘बरसात’ में राज कपूर की खोज के तौर पर परदे पर पेश हुईं निम्मी से की। निम्मी का वास्ता मोहब्बत की सबसे बेहतरीन निशानी ताजमहल के शहर आगरा से रहा। दोनों की मोहब्बत ताउम्र बेमिसाल रही। फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ की कहानी सुनाने से पहले इस फिल्म के कुछ और नगीनों के बारे में जानना भी जरूरी है। जिनकी आवाज के आज भी करोड़ों दीवाने हैं, वह अमिताभ बच्चन इस फिल्म में जिस किरदार में नजर आते हैं, उसका नाम है छोटू और यह शख्स बोल नहीं सकता। अमिताभ बच्चन जब 75 साल के हुए थे तो इस फिल्म की यादें संजोती एक चिट्ठी अभिनेत्री सुलोचना ने अमिताभ बच्चन को लिखी थी। उन्होंने इस पत्र में अमिताभ बच्चन को एक संकोची स्वभाव के युवा के तौर पर याद किया और माना कि उनकी शख्सीयत में जो तब्दीली इतने सालों में आई वह ईश्वर के किसी चमत्कार से कम नहीं है।
सुनील दत्त ने लगाया कलाकारों का मेला
छोटू अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ में विनोद खन्ना भी हैं, अमरीश पुरी भी हैं और राखी भी। ये सब तब हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे और अपने प्रोडक्शन हाउस अजंता आर्ट्स में सुनील दत्त ने सबको उगने और लहराने की जगह भी दी और खाद पानी भी दिया। फिल्म की हीरोइन थीं सुनील दत्त की फेवरिट अदाकारा वहीदा रहमान। वहीदा रहमान का फिल्म ‘मुझे जीने दो’ का किस्सा तो आपको पता होगा कि कैसे एक सीन में वहीदा रहमान ने सुनील दत्त को दे दनादन तमाम चांटे असली वाले मारे थे। हुआ ये था कि सीन में पहला चांटा खाने के बाद सीन तो ओके हो गया लेकिन सुनील दत्त को लगा कि चांटा खाते समय उनकी आंखों का मिच जाना उनके किरदार को हल्का करता था। तो परफेक्शन के लिए वह तब तक चांटे खाते रहे जब तक कि गाल पर पड़े चांटे के वक्त उनकी दोनों आंखें खुली नहीं रहीं। ऐसा ही एक वाकया फिल्म रेशमा और शेरा का भी है, यहां चांटा खाने का नंबर लगा था अमिताभ बच्चन का।