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जब अमिताभ बच्चन बड़े अंतर से जीते थे चुनाव, राजनीतिक गढ़ में धुरंधर नेता को चटाई थी धूल
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 11 Dec 2018 12:41 PM IST
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amitabh bachchan
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विधानसभा चुनाव के बाद आज पांच राज्यों के लिए बहुत बड़ा दिन है । मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, मिजोरम और छत्तीसगढ़ में वोटिंग चल रही है । उम्मीदवारों से लेकर मतदाता तक सबकी सांसें थमी हुई हैं। इंतजार बस कुछ देर का है। कौन सी पार्टी किस राज्य में सरकार बनाएगी, ये सवाल सभी के मन है । जब तक वोटिंग नतीजे आते हैं तब तक आपको बॉलीवुड के उस नौसिखिया राजनीतिज्ञ के बारे में बताते हैं जिसके आगे बड़े-बड़े धुरंधर भी चुनावी अखाड़े में धराशाई हो गए थे ।
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हम बात कर रहे हैं अमिताभ बच्चन की । 1984 में अमिताभ और राजीव गांधी के रिश्ते नई ऊंचाई पर थे, राजीव गांधी ने अपने दोस्त अमिताभ बच्चन को कांग्रेस के टिकट पर इलाहाबाद से चुनाव लड़ने के लिए तैयार कर लिया। 1984 में अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से कांग्रेस का टिकट मिला और उन्होंने बड़े अंतर से हेमवती नंदन बहुगुणा को हराया । बहुगुणा और अमिताभ के बीच हुए चुनावी संघर्ष के कई दिलचस्प किस्से हैं ।
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1977 में अगर उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हुआ था तो कांग्रेस ने 1984 में अमिताभ बच्चन को चुनाव में खड़ा कर उसका बदला लिया था । जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर ने विपक्ष के कई बड़े दिग्गजों को चुनावी अखाड़े में जमीन सुंघा दी थी। ग्वालियर में अटल बिहारी वाजपेयी और माधव राव सिंधिया जैसा ही एक और दिलचस्प चुनावी मुकाबला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में माटी के लाल हेमवती नंदन बहुगुणा और छोरा गंगा किनारे वाला अमिताभ बच्चन के बीच भी हुआ था।
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इलाहाबाद हेमवती नंदन बहुगुणा का राजनीतिक गढ़ माना जाता था। यूं तो बहुगुणा अविभाजित उत्तर प्रदेश (तब उत्तराखंड राज्य का गठन नहीं हुआ था) के गढ़वाल इलाके के रहने वाले थे लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में ही हुई थी। बहुगुणा की पत्नी कमला बहुगुणा भी इलाहाबाद की थीं। हालांकि बहुगुणा लखनऊ और पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट से भी सांसद रह चुके थे। लेकिन 1984 में वह इलाहाबाद से लोकदल के उम्मीदवार थे। पूरा विपक्ष उनके पीछे एकजुट था।
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ऐसे में उनके मुकाबले जब अमिताभ बच्चन को कांग्रेस ने उतारा तो यह चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया था। अमिताभ तब तक सुपर स्टार बन चुके थे। उनकी कई फिल्में हिट हो चुकी थीं और एंग्री यंग मैन का नौजवानों में बेहद क्रेज था। लेकिन बहुगुणा भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे, इसलिए यह कहना मुश्किल था कि कौन जीतेगा।बहुगुणा को इस चुनाव में इलाहाबाद की अपनी जमीनी ताकत, पहाड़ी, कायस्थ और मुस्लिम मतदाताओं के मजबूत ध्रुवीकरण और निजी लोकप्रियता पर पूरा भरोसा था।