पालने में पांव सिर्फ पूतों के ही नहीं बेटियों के भी दिखाई देते हैं। तारा सुतारिया ऐसी ही बेटी हैं जिन्होंने कोई 11 साल पहले पोगो के अमेजिंग किड्स अवार्ड्स के सात टॉप प्रतिभागियों में बनाई। ओए जस्सी और द सुईट लाइफ और करन एंड कबीर जैसे टीवी शोज से पहचान बनाई। करण जौहर की फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 से हिंदी सिनेमा की नई पौध की अभिनेत्रियों में शुमार हो गईं। इसी महीने की 19 तारीख को 24 साल की होने जा रहीं तारा सुतारिया की अमर उजाला से एक खास मुलाकात।
SOTY 2 के लिए तारा ने छोड़ दी थी ये हॉलीवुड फिल्म, EXCLUSIVE मुलाकात में पहली बार किया खुलासा
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हिंदी सिनेमा में हीरोइन बनने के ख्वाब पालने वाली लड़कियां अपनी शुरुआती फिल्मों में ग्लैमरस रोल करना चाहती हैं। लेकिन, आपने दूसरी ही फिल्म मरजावां में चुना ऐसा किरदार जिसके पास फिल्म में संवाद ही नहीं है?
और, यही बात मुझे भीड़ में अलग जगह देती है। मरजावां एक लव स्टोरी है और किसी प्रेम कहानी में लड़की का गूंगा होना कहानी को खास बना देता है। इससे पहले मैंने सिर्फ एक फिल्म की है, जिसमें मेरा रोल एक मस्तमौला लड़की का था। उसके बाद ये फिल्म करना मेरे लिए एक चुनौती भी है खुद को साबित करने की और मौका भी है सिनेमा को सही तरीके से समझने का। इस फिल्म ने मुझे एक और हुनर भी दे दिया, इशारों में बातें करना।
इशारों में बातें करना यानी कि जिस साइन लैंग्वेज का इस्तेमाल आपने फिल्म में किया है, वह आपने किन दिनों में सीखी?
मैं उस वक्त 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2' शूट कर रही थी जब मिलाप (झावेरी) सर ने मुझे 'मरजावां' की स्क्रिप्ट दो बार पूरी सुनाई। मुझे पता चला कि मेरा किरदार एक गूंगी लड़की का है तो मुझे यह भाषा सीखनी पड़ेगी। तो मैं दिन में स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 की शूटिंग करती थी और रात में देर तक जागकर ये इशारों वाली भाषा सीखती थी। मुझे हर नई चीज सीखने की ललक रहती है जिससे मैं कुछ भी बहुत जल्दी सीख जाती हूं।
आपने दुनिया भर में म्यूजिकल शोज में डांस भी किया है और गाने भी गाए हैं। एक प्रशिक्षित नर्तकी और गायिका होना अभिनय में कितना मदद करता है?
गायिकी मैं बचपन से सीख रही हूं। मेरा इरादा तब गायिका बनना ही थी। फिर कॉलेज से थिएटर शुरू हुआ तो मुझे अभिनय से प्यार हो गया। फिर मैं करण (जौहर) सर से मिली। उन्होंने कहा कि तुम पहले ग्रेजुएट हो जाओ फिर ऑडिशन कर लेते हैं। देखते हैं कि तुम कर पाओगी या नहीं।
आपकी बहन पिया भी प्रशिक्षित नर्तकी हैं, क्या भविष्य में वह भी हमें फिल्मों में देखने के लिए मिल सकती हैं?
इस बारे में मैं कुछ कह नहीं सकती! वह बैले डांस सिखाती है। उनकी अपनी एक कंपनी है। बैले डांस पश्चिमी देशों में बहुत लोकप्रिय है। वह हमेशा सफर में रहती हैं, व्यस्त रहती हैं। मैं हिंदी सिनेमा में व्यस्त हो चुकी हूं तो हमारा मिलना बहुत कम हो पाता है। हो सकता है कि वह भी कभी अभिनय में आने की कोशिश करें। मैं इस बारे में तयशुदा तरीके से कुछ नहीं कह सकती।
टेलीविजन और सिनेमा में अभिनय में आपको क्या अंतर समझ आया?
अंतर है भी और नहीं भी। अभिनय तो अभिनय ही होता है। मुझे लगता है कि दोनों में शूटिंग के घंटों का अंतर है। टीवी शोज को शूट करने में टाइम लगता है जबकि फिल्मों में सब कुछ बहुत जल्दी-जल्दी होता है। लेकिन, मुझे दोनों में ही बहुत मज़ा आया। वहीं 'मरजावां के बाद मेरे पास दक्षिण भारतीय फिल्म आरएक्स-100 की रीमेक है।
बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के फिल्मों में आना कितना मुश्किल है? परिवार का आपको कितना समर्थन मिला और दूसरों को क्या सलाह देना चाहेंगी?
जीवन में आसान कुछ भी नहीं है। किसी भी प्रोफेशन में अपनी जगह बनाने के लिए आपको इसके लिए प्रशिक्षित होना जरूरी है। डॉक्टर, इंजीनियर बनने के लिए भी सात-आठ साल लगते ही हैं, वैसा ही फिल्म इंडस्ट्री में है। पहले खुद को तैयार करना जरूरी है। अभिनय में आना है तो थिएटर वगैरह करके खुद को तराशना चाहिए। जहां तक मेरी बात है तो मेरे अभिभावक ही मेरे सबसे अच्छे दोस्त भी हैं। हम आपस में एक दूसरे को समझते हैं। मुझे और मेरी जुड़वा बहन पिया का वह हर फैसले में समर्थन करते हैं।