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Exclusive Interview: स्टूडियो में कैसे महेंद्र कपूर में जोश भरते थे मनोज कुमार, रोहन कपूर का दिलचस्प खुलासा

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Exclusive Interview of ruhan Kapoor on his father Mahendra Kapoor birthday mohd rafi hamraaz ukar Dilip kumar
हिंदी सिनेमा के कपूर - फोटो : अमर उजाला

भारत सरकार की तरफ से पद्मश्री से सम्मानित पार्श्वगायक महेंद्र कपूर ने अपनी हिट फिल्मों के गीतों की सफलता का कभी भी जश्न नहीं मनाया। उनका मानना था कि सब कुछ ऊपर वाले की कृपा से हो रहा है। फिल्म की या फिल्म के गानों की सफलता के बाद वह अपनी खुशी मंदिर जाकर अपने इष्टदेव के साथ साझा करते और वहीं बैठकर देर तक मंत्रों का जाप किया करते। महेंद्र कपूर के जीवन मे उनके सीनियर गायक मोहम्मद रफी का काफी प्रभाव रहा है। दोनों की आवाज़ भी काफी मिलती थी। दोनों ने मिलकर ये तय किया  था कि वे कभी साथ में नहीं गाएंगे। लेकिन, निर्माता, निर्देशक, अभिनेता मनोज कुमार की एक जिद ने इन दोनों महान गायकों का एक गाने में संगम करा ही दिया। मोहम्मद रफी साहब की चरित्र, रियाज और जमीन से हमेशा जुड़े रहने वाली सीख का महेंद्र कपूर ने आजीवन पालन किया। महेंद्र कपूर के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर ‘अमर उजाला’ ने उनके बेटे रोहन कपूर से लंबी बातचीत की।

Exclusive Interview of ruhan Kapoor on his father Mahendra Kapoor birthday mohd rafi hamraaz ukar Dilip kumar
महेंद्र कपूर-रोहन कपूर-सिद्धांत - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आपने जब होश संभाला तो आपको पहली बार कैसे इस बात का इल्म हुआ कि आपके पिता इतने मशहूर गायक हैं?

तब हम स्कूल जाया करते थे तो कभी इस बात का इल्म नहीं हुआ कि डैडी इतने बड़े गायक थे। हमें लगता था कि जैसे बाकी लोगों के डैडी काम पर जाते हैं, वैसे हमारे डैडी भी काम पर जा रहे हैं। ये उन दिनों की बात है जब मैं छठी कक्षा में पढ़ रहा था। मेरा वास्तविक नाम संजीव है। एक दिन प्रिंसिपल ने कहा, 'संजीव, क्या तुम्हारे पिता हमारे स्कूल के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनेंगे?’ क्रिकेटर फारुख इंजीनियर भी कार्यक्रम में आने वाले थे। मैंने सोचा कि ये लोग मेरे डैडी का सम्मान क्यों करना चाहते हैं? जब डैडी कार्यक्रम में आए तो स्कूल के सैकड़ों छात्र उनसे मिलने के लिए उनके पीछे भागे। सारे शिक्षक, प्रधानाचार्य सब डैडी का सम्मान कर रहे थे। मैं अचंभित था कि ये क्या हो रहा है? शिक्षक अक्सर डैडी के गाए गानों का जिक्र किया करते थे कि मैंने फलां फिल्म में फलां गाना देखा जिसे तुम्हारे डैडी ने गाया है। तब मुझे धीरे धीरे एहसास हुआ कि डैडी वाकई बड़ी हस्ती हैं।
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महेंद्र कपूर-मनोज कुमार - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पहला गाना जो आपने अपने पिता का रेडियो पर बजते सुना और उस गाने से जुड़ी कोई याद?
मेरा पूरा बचपन ही संगीतमय माहौल में बीता। मम्मी जब सुबह छह बजे जगाती थी तो उस समय तक डैडी का रियाज शुरू हो चुका होता था। तलत महमूद हमारे घर पर रहते थे। जब स्कूल से लौटता तब तक उस्ताद नियाज अहमद खान के साथ संगीत की महफिलें जम चुकी होती थीं। 24 घंटे हमारे घर में सरमग ही सुनाई देती थी। टीवी तब था नहीं तो खाना खाते वक्त हम रेडियो सुनते थे। ठीक से याद नहीं कि पहला गाना कौन सा रेडियो पर सुना था। 1965 की मेरी पैदाइश है। होश संभालने पर फिल्म ‘उपकार’ का गाना 'मेरे देश की धरती' मैंने सुना। इसके लिए डैडी को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। और, संभाला तो 'पूरब और पश्चिम' का गाना ‘भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं’ तो जमाने का गीत बन चुका था।
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महेंद्र कपूर एवं सुनील दत्त - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आपके जन्म के आगे पीछे महेंद्र कपूर को खूब पुरस्कार मिले। इन पुरस्कारों को लेकर घर में कभी कोई जश्न मनाया गया?
आप को जानकर यह हैरानी होगी कि डैडी ने कभी भी ऐसी चीजों को लेकर जश्न मनाया ही नहीं। उनका मानना था कि इंसान को अपना कर्म करते रहना चाहिए, आगे मालिक के हाथ में है। वह बस अभ्यास पर जोर देते थे। मेरी मां ने मुझे बताया था कि मेरे पिताजी हनुमानजी और शिवजी के बहुत बड़े भक्त थे। जब फिल्म 'हमराज' हिट हुई तो इसके गाने (‘किसी पत्थर की मूरत से’, ‘ना मुंह छुपा के जियो’ और ‘नीले गगन के तले’) दिन भर रेडियो पर बजते रहते थे। इसका धन्यवाद देने वह सुबह चार बजे वर्ली के मार्कंडेश्वर मंदिर पहुंचे और शाम चार बजे तक मंदिर के एक कोने में बैठकर निर्जल जाप करते रहे। भगवान से कभी उन्होंने कुछ मांगा नहीं। उनका कहना था कि मांगना क्या? वह तो स्वयं हमारे पिता हैं। उनको पता है कि हमें क्या चाहिए।

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महेंद्र कपूर, स्मिता पाटिल, बीआर चोपड़ा और उनकी पत्नी, राज बब्बर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

महेंद्र कपूर को तीन फिल्मफेयर पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ गायक के मिले। इन तीनों गानों ‘चलो एक बार फिर से’, ‘नीले गगन के तले’ और ‘और नहीं बस और नहीं’ में देखा जाए तो एक तरह से उनके गायन की विशाल रेंज भी पता चलती है। आपका क्या कहना है इस बारे में?
उनकी गायकी का जो तरीका था, वैसा तरीका बहुत कम गायकों में देखने को मिलेगा आपको। फिल्म ‘धर्मपुत्र’ (1961) का गाना 'भूल सकता है भला कौन ये प्यारी आंखे' अपने समय का बहुत लोकप्रिय गाना रहा। फिल्म ‘गुमराह’ (1963) का गाना 'आप आए तो ख्याल ए दिले नाशाद आया’ और ‘धर्मपुत्र’ का ही गाना 'आज की रात मुरादों की बारात'..! इन गीतों में उनकी आवाज बिल्कुल रुई की तरह कोमल है। और, अचानक 'मेरे देश की धरती है' सुनिए तो लगेगा ही नहीं कि ये वही गायक है। ऐसी विविधता बहुत कम गायकों में मिलती है। वह प्यार से भी गाते थे और जब गरजने की बारी आती थी तो उनसे तेज कोई गरज नहीं सकता था।

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