इस तरह की शानदार नज्मों से लोगों की जिंदगी को 'गुलजार' करने वाले गुलजार साहब की ख्याति भी उनका नाम की तरह ही देश में फैली हुई है। बॉलीवुड के मशहूर कवि, लेखक, गीतकार, स्क्रीनराइटर और निर्देशक गुलजार साहब आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं। गुलजार साहब का एहसासों और जिंदगी के हर पहलू को अपनी कलम से मोतियों की तरह कविताओं में पिरोने का अंदाज सबसे जुदा है और यह हमें कहने पर मजबूर करता है कि उनके जैसा शायद ही दूसरा कोई हो। कलम के साथ-साथ निर्देशन के जरिए भी गुलजार ने सिनेमा इंडस्ट्री को अपना कायल बनाया है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगा कि आज भारतीय सिनेमा की शान की तरह देखे जाने वाले गुलजार साहब का पाकिस्तान से बहुत गहरा नाता रहा है। चलिए आज उनके 89वें जन्मदिन के मौके पर बताते हैं उनसे जुड़ी खास बातें..
Gulzar Birthday: दो वक्त की रोटी कमाने मैकेनिक बने थे गुलजार, परिवार की विरोध के बाद भी नहीं घटी संगीत की ललक
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'आंधी', 'मौसम' और 'मिर्जा गालिब' जैसी मशहूर और यादगार फिल्मों का निर्देशन करने वाले गुलजार साहब का जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के झेलम जिले में हुआ था। गुलजार साहब का दीना गांव बंटवारे से पहले भारत में था, लेकिन अब यह पाकिस्तान का हिस्सा है। लेकिन गुलजार साहब का जन्म बंटवारे से पहले हुआ था इसलिए वह जन्म से ही हिंदुस्तानी रहे हैं। वह एक सिख परिवार में जन्मे थे और उनका नाम संपूर्ण सिंह कालरा रखा गया था। बंटवारे के बाद अपने परिवार के साथ पंजाब आकर रहने वाले गुलजार साहब कि दिली इच्छा शुरू से ही लेखक बनने की थी। लेकिन गुलजार साहब का परिवार उनके लेखक और संगीत की तरफ झुकाव के खिलाफ थे। सभी को लगता था कि वह समय बर्बाद कर रहे हैं इसलिए वह पड़ोसी के घर जाकर लिखने की प्रैक्टिस किया करते थे।
अपनी संगीत और लेखन की कला को सीखने की ललक को पूरा करने के लिए गुलजार परिवार की मर्जी के खिलाफ माया नगरी में आकर बस गए थे। जब वह मुंबई आए तब उन्होंने यहां की भागती-दौड़ती जिंदगी में गुजारा करने के लिए कई छोटी-छोटी नौकरियां की थी। सिर पर छत और दो वक्त की रोटी कमाने के लिए गुलजार ने एक गैरेज में मैकेनिक का काम तक किया था। वहां काम करते-करते ही उनकी दोस्ती प्रोग्रेसिव राइटर एसोसिएशन के लेखकों से होने लगी थी। इसके बाद धीरे-धीरे वह अपनी पैंठ बनाते गए और निर्देशक बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी और संगीतकार हेमंत कुमार के साथ सहायक के तौर पर काम करने लगे थे।
सहायक के तौर पर काम करने वाले गुलजार साहब को पहली बार बिमल रॉय ने अपनी फिल्म 'बंदिनी' में गाना लिखने का मौका दिया था। गुलजार ने पहला गाना 'मोरा गोरा अंग' लिखा और इसी से उनकी किस्मत के दरवाजे खुलते चले गए। 'मोरा गोरा अंग' अपने जमाने के बेहद हिट गानों में से एक रहा था और इसने बॉलीवुड के निर्माताओं को गुलजार का मुरीद बना दिया था। बिमल रॉय तो गुलजार के इस कदर फैन हो गए थे कि उन्होंने उन्हें अपना असिस्टेंट बना लिया था और यहीं से गुलजार साहब के निर्देशन का सफर शुरू हो गया। इसके बाद गुलजार ने बॉलीवुड फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक गाने लिखे, जिनमें 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी..', 'दिल ढूंढता है', 'ओ माझी रे अपना किनारा' शामिल हैं।
गुलजार की निजी जिंदगी की बात करें तो इंडस्ट्री में ऊंचे मुकाम तक पहुंचने के बाद बॉलीवुड में काम के दौरान गुलजार की मुलाकात फिल्म अभिनेत्री राखी से हुई। दोनों के बीच प्यार हुआ और सारे बंधनों को तोड़कर दोनों ने एक दूसरे से शादी भी की। राखी और गुलजार की एक बेटी है, जिनका नाम मेघना गुलजार है। अपने माता-पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए मेघना ने भी अपना करियर बॉलीवुड में ही बनाया। वह इंडस्ट्री की जानी-मानी निर्माता-निर्देशक हैं। राखी और गुलजार की शादी में एक साल अंदर ही खटपट सुनाई देने लगी थी और वह दोनों अलग भी हो गए थे। चार दशक से भी अधिक समय से दोनों अलग रह रहे हैं, लेकिन दोनों ने तलाक नहीं लिया।