छोटे परदे के धारावाहिकों से निर्देशक की शुरुआत करने वाले जमशेदपुर के इम्तियाज अली बड़े परदे के स्थापित निर्देशक हैं। आशिकी उनकी मिजाज में भी है और उनकी फिल्मों का चटख रंग भी। वैलेंटाइंस डे पर उनकी फिल्म लव आज कल रिलीज हो रही है। इम्तियाज से ये खास बातचीत की पंकज शुक्ल ने।
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EXCLUSIVE: करीना, दीपिका और सारा पर बोले इम्तियाज अली, औरतें मर्दों से ज्यादा होशियार होती हैं
Sat, 08 Feb 2020 11:49 AM IST
प्रतीक्षा राणावत
पंकज शुक्ल, मुंबई
पंकज शुक्ल, मुंबई
Published by: प्रतीक्षा राणावत
Updated Sat, 08 Feb 2020 11:49 AM IST
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इम्तियाज अली
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
इम्तियाज अली
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
अपनी ही हिट फिल्म 'लव आज कल' को रिबूट करने की क्या जरूरत पड़ी?
'लव आज कल' प्रेम की ऐसी धारणा है, जिसे मैं एक फ्रेंचाइजी की तरह देखता हूं। मेरा मानना है कि समय के साथ प्यार करने की प्रक्रिया भी बदल जाती है। पिछले 10 साल में युवाओं ने प्रेम की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है। पहले के समय में किसी भी प्रेम में शारीरिक संबंध आखिरी पड़ाव होता था लेकिन अब तो शुरुआत ही वहीं से होती है और, फिर भी कोई गारंटी नहीं कि ये रिश्ते को बनाए रखेंगे। मेरी पिछली 'लव आज कल' में जो आज था वह अब कल बन चुका है और एक नया आज खड़ा है। ऐसे में ये नई कहानी, नए किरदारों के साथ जेहन में आती है।
किसी सुपरस्टार के साथ फिल्म बनाते समय क्या ये जोखिम होता है कि एक निर्देशक उसकी चकाचौंध में अपनी कहानी का सोचा हुआ विस्तार भूल जाए?
सच कहूं, तो ऐसा होने की संभावनाएं हमेशा रहती हैं, लेकिन मुझे आज तक किसी ने मेरी कहानी में कुछ भी बदलने के लिए नहीं बोला। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि मैं जो सोचकर चला हूं, उसी पर अडिग रहूं। कहानी से भटकने का एक कारण यह हो सकता है कि कभी-कभी कलाकार की शख्सियत से आप कुछ चीजें अपनी कहानी में समाहित कर लेते हैं, जोकि एक अच्छी बात है। इससे अभिनय में भी प्रमाणिकता आती है। लेकिन एक निर्देशक का किसी के दबाव में आना गलत है।
'लव आज कल' प्रेम की ऐसी धारणा है, जिसे मैं एक फ्रेंचाइजी की तरह देखता हूं। मेरा मानना है कि समय के साथ प्यार करने की प्रक्रिया भी बदल जाती है। पिछले 10 साल में युवाओं ने प्रेम की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है। पहले के समय में किसी भी प्रेम में शारीरिक संबंध आखिरी पड़ाव होता था लेकिन अब तो शुरुआत ही वहीं से होती है और, फिर भी कोई गारंटी नहीं कि ये रिश्ते को बनाए रखेंगे। मेरी पिछली 'लव आज कल' में जो आज था वह अब कल बन चुका है और एक नया आज खड़ा है। ऐसे में ये नई कहानी, नए किरदारों के साथ जेहन में आती है।
किसी सुपरस्टार के साथ फिल्म बनाते समय क्या ये जोखिम होता है कि एक निर्देशक उसकी चकाचौंध में अपनी कहानी का सोचा हुआ विस्तार भूल जाए?
सच कहूं, तो ऐसा होने की संभावनाएं हमेशा रहती हैं, लेकिन मुझे आज तक किसी ने मेरी कहानी में कुछ भी बदलने के लिए नहीं बोला। मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि मैं जो सोचकर चला हूं, उसी पर अडिग रहूं। कहानी से भटकने का एक कारण यह हो सकता है कि कभी-कभी कलाकार की शख्सियत से आप कुछ चीजें अपनी कहानी में समाहित कर लेते हैं, जोकि एक अच्छी बात है। इससे अभिनय में भी प्रमाणिकता आती है। लेकिन एक निर्देशक का किसी के दबाव में आना गलत है।
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इम्तियाज अली
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
लव आज कल में कार्तिक आर्यन को बतौर मुख्य अभिनेता चुनने की क्या वजह रही?
इस किरदार के लिए मुझे एक युवा कलाकार की जरूरत थी जो आज से 30 साल पहले के उदयपुर की मानसिकता को और आज के दिल्ली को अच्छी तरह समझ सके। कार्तिक मुझे तब बहुत होशियार लगे जब मैं उनके साथ बैठकर फिल्म के दृश्यों पर चर्चा कर रहा था। वह पुराने शहर में रहे हैं और मेरी भावनाओं को अच्छे से समझ रहे थे। कार्तिक की भी कुछ अलग करने की इच्छा थी। इसलिए इनका चुनाव किया गया। मैंने उनकी कोई फिल्म अब तक नहीं देखी है।
'रॉकस्टार' में रणबीर को अपनी कहानी के किरदार में ढालना कितना कठिन था? और कार्तिक के साथ कितनी आसानी हुई?
मैंने रणबीर की एक फिल्म देख रखी थी लेकिन मेरे दिमाग में नहीं था। मैं एक लेखक भी हूं तो मेरे दिमाग में हमेशा एक कलाकार की आधी छवि बनी रहती है। मैं किसी को परिवर्तित नहीं करता बल्कि उसे समझाता हूं। एक अभिनेता और एक निर्देशक के बीच में विचारों का तालमेल बहुत जरूरी है, जोकि जैसा मेरे और रणबीर के बीच था, ठीक वैसा ही कार्तिक और मेरे बीच था। तो इन दोनों को किरदार में ढालना मेरे लिए आसान ही था। हां, तकनीकी तौर पर इन दोनों का तरीका अलग है।
इस किरदार के लिए मुझे एक युवा कलाकार की जरूरत थी जो आज से 30 साल पहले के उदयपुर की मानसिकता को और आज के दिल्ली को अच्छी तरह समझ सके। कार्तिक मुझे तब बहुत होशियार लगे जब मैं उनके साथ बैठकर फिल्म के दृश्यों पर चर्चा कर रहा था। वह पुराने शहर में रहे हैं और मेरी भावनाओं को अच्छे से समझ रहे थे। कार्तिक की भी कुछ अलग करने की इच्छा थी। इसलिए इनका चुनाव किया गया। मैंने उनकी कोई फिल्म अब तक नहीं देखी है।
'रॉकस्टार' में रणबीर को अपनी कहानी के किरदार में ढालना कितना कठिन था? और कार्तिक के साथ कितनी आसानी हुई?
मैंने रणबीर की एक फिल्म देख रखी थी लेकिन मेरे दिमाग में नहीं था। मैं एक लेखक भी हूं तो मेरे दिमाग में हमेशा एक कलाकार की आधी छवि बनी रहती है। मैं किसी को परिवर्तित नहीं करता बल्कि उसे समझाता हूं। एक अभिनेता और एक निर्देशक के बीच में विचारों का तालमेल बहुत जरूरी है, जोकि जैसा मेरे और रणबीर के बीच था, ठीक वैसा ही कार्तिक और मेरे बीच था। तो इन दोनों को किरदार में ढालना मेरे लिए आसान ही था। हां, तकनीकी तौर पर इन दोनों का तरीका अलग है।
इम्तियाज अली
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
हिंदी सिनेमा में महिला सशक्तीकरण का दौर चल रहा है लेकिन आपकी फिल्मों की अभिनेत्रियां शुरू से ही आजाद ख्यालों की रही हैं। इस मजबूती का ख्याल आपको कहां से आता है?
दरअसल, मेरे आसपास अब तक जितनी भी महिलाओं को मैंने देखा है, चाहे वह मेरी मां हो या मेरी कोई चचेरी, ममेरी बहन हो, सभी काफी होशियार और मजबूत रही हैं। वह अपने फैसले भी खुद ले सकती हैं, और अपना काम भी करवा सकती हैं। मेरा यकीनी तौर पर मानना है कि औरतें मर्दों से ज्यादा होशियार होती हैं। वह किसी बात को मर्दों से पहले समझती भी हैं और अपना काम भी निकलवाना जानती हैं।
हिंदी सिनेमा में दीपिका पादुकोण एक मजबूत महिला का उदाहरण हैं, पिछली 'लव आज कल' से लेकर आज तक की दीपिका में आए बदलाव को एक निर्देशक के नजरिए से किस तरह देखते हैं?
दीपिका को मैं जब से जानता हूं वह मुझे तभी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले व्यक्तित्व की महिला लगीं। जब उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू भी नहीं किया था तब से मैं उनके साथ काम करने की इच्छा रखता था। एक साधारण इंसान नहीं समझ सकता, लेकिन मैं एक निर्देशक के तौर पर बता सकता हूं कि दीपिका बहुत शर्मीली लड़की हैं। जब मैंने उनके साथ पहली फिल्म में काम किया तो वह किरदार को अपने पीछे छुपा लेती थीं, मैंने उनके अंदर से उस किरदार को कुरेदकर बाहर निकाला था।
दरअसल, मेरे आसपास अब तक जितनी भी महिलाओं को मैंने देखा है, चाहे वह मेरी मां हो या मेरी कोई चचेरी, ममेरी बहन हो, सभी काफी होशियार और मजबूत रही हैं। वह अपने फैसले भी खुद ले सकती हैं, और अपना काम भी करवा सकती हैं। मेरा यकीनी तौर पर मानना है कि औरतें मर्दों से ज्यादा होशियार होती हैं। वह किसी बात को मर्दों से पहले समझती भी हैं और अपना काम भी निकलवाना जानती हैं।
हिंदी सिनेमा में दीपिका पादुकोण एक मजबूत महिला का उदाहरण हैं, पिछली 'लव आज कल' से लेकर आज तक की दीपिका में आए बदलाव को एक निर्देशक के नजरिए से किस तरह देखते हैं?
दीपिका को मैं जब से जानता हूं वह मुझे तभी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने वाले व्यक्तित्व की महिला लगीं। जब उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू भी नहीं किया था तब से मैं उनके साथ काम करने की इच्छा रखता था। एक साधारण इंसान नहीं समझ सकता, लेकिन मैं एक निर्देशक के तौर पर बता सकता हूं कि दीपिका बहुत शर्मीली लड़की हैं। जब मैंने उनके साथ पहली फिल्म में काम किया तो वह किरदार को अपने पीछे छुपा लेती थीं, मैंने उनके अंदर से उस किरदार को कुरेदकर बाहर निकाला था।
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इम्तियाज अली
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
और, आपकी नई लव आज कल की हीरोइन सारा अली खान की खूबियां दीपिका के एकदम उलट हैं।
सही बात है। सारा शर्मीली बिल्कुल नहीं हैं। वह होशियार है और बहादुर भी है। लेकिन उनके अंदर काम को सही ढंग से करने की एक बेचैनी सी है। दीपिका जिस तरह शर्माती है, वैसे ही सारा को थोड़ी बेचैनी सी रहती है।
आपके फिल्मों में इरशाद कामिल या प्रीतम ने हमेशा अलहदा गीत संगीत दिया है। ऐसा तभी मुमकिन हो सकता है जब एक निर्देशक भी संगीत की समझ रखता हो। आपका क्या कहना है?
मैं राज कपूर साहब की फिल्मों को देखता हूं तो उनकी फिल्मों में कविताएं और शायरियां बहुत अच्छी होती थी। राज कपूर बहुत अच्छे निर्देशक थे शायद इसलिए ही शैलेंद्र उनके लिए इतना अच्छा लिख पाए। इसके अलावा जो निर्देशक एक संगीतकार को समझाता है उसमें भी गुंजाइश रहनी चाहिए। मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं और मुझे बचपन से ही शायरियों और कविताओं का शौक रहा है। इरशाद और मुझमें एक चीज एक जैसी है कि हम दोनों ही साहित्य के विद्यार्थी रहे हैं। हम जब काम की बात नहीं कर रहे होते हैं तब भी हम कविताओं की बात करते हैं।
सही बात है। सारा शर्मीली बिल्कुल नहीं हैं। वह होशियार है और बहादुर भी है। लेकिन उनके अंदर काम को सही ढंग से करने की एक बेचैनी सी है। दीपिका जिस तरह शर्माती है, वैसे ही सारा को थोड़ी बेचैनी सी रहती है।
आपके फिल्मों में इरशाद कामिल या प्रीतम ने हमेशा अलहदा गीत संगीत दिया है। ऐसा तभी मुमकिन हो सकता है जब एक निर्देशक भी संगीत की समझ रखता हो। आपका क्या कहना है?
मैं राज कपूर साहब की फिल्मों को देखता हूं तो उनकी फिल्मों में कविताएं और शायरियां बहुत अच्छी होती थी। राज कपूर बहुत अच्छे निर्देशक थे शायद इसलिए ही शैलेंद्र उनके लिए इतना अच्छा लिख पाए। इसके अलावा जो निर्देशक एक संगीतकार को समझाता है उसमें भी गुंजाइश रहनी चाहिए। मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हूं और मुझे बचपन से ही शायरियों और कविताओं का शौक रहा है। इरशाद और मुझमें एक चीज एक जैसी है कि हम दोनों ही साहित्य के विद्यार्थी रहे हैं। हम जब काम की बात नहीं कर रहे होते हैं तब भी हम कविताओं की बात करते हैं।
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