जिसके हाथ का नमक खाया, उसका जीवन भर साथ देते रहे जगजीत सिंह। चित्रा भी उनके जीवन में ऐसे ही आईं। उनके पति ने उन्हें छोड़ा तो जगजीत उनका सहारा बने। दोनों ने साथ साथ खाना भी खूब बनाया और संगीत भी। लेकिन, जगजीत की एक मोहब्बत गुलजार से भी रही। गायिकी की मौसिकी से मोहब्बत। दोनों पहली बार कब और कहां मिले? इसे लेकर तमाम लोग तमाम बातें कहते हैं। किस्सा उस दौर का है जब जगजीत सिंह कहीं खटमलों और चूहों वाले एक होटल में मुंबई सेंट्रल स्टेशन के करीब रहा करते थे और मुंबई की लोकल ट्रेन में अपनी हारमोनियम के साथ सफर किया करते थे।
Jagjit Singh Gulzar: टूटी चप्पल, हताश मन, कोने में दुबके जगजीत, पहली मुलाकात में गुलजार बोले, आप तो मेहंदी...
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गुलजार जगजीत सिंह की जिंदगी में कैसे आए और कैसे दोनों की दोस्ती ने हिंदुस्तानी संगीत में नए गुल खिलाए। इसे समझने के लिए वह दर्द भी समझना जरूरी है जो गुलजार ने अपने इस अजीज के खोने पर महसूस किया। बकौल गुलजार, 'ऊपर वाला जो देता है वह छीन लेता है, परन्तु जो लेता है वह लौटाता नहीं। क्या वह सही है? मैं जानता हूं कि मृत्यु जीवन को एक परिप्रेक्ष्य में रखने में मदद करती है, लेकिन किस कीमत पर? जगजीत (सिंह) एक प्रिय मित्र थे, मेरा एक हिस्सा थे, लेकिन अब वह चले गये हैं। मेरे लिए उसके बारे में भूतकाल में बात करना कठिन है।'
जिसको अपने आसपास न होने की बात मान पाना तक कठिन हो, उस दोस्त से गुलजार मिले थे मुंबई की एक बरसाती रात में। संगीतकार मदन मोहन के घर महफिल जमी थी और पहली बार जगजीत के पास मौका था, अपना हुनर मुंबई फिल्म जगत को दिखाने का। भीगते भागते उनके घर पहुंचे। बताते हैं कि बेटे संजीव कोहली ने दरवाजा खोला तो जगजीत अपनी टूटी चप्पल के साथ अंदर आने में हिचक रहे थे। संजीव ने उन्हें अपने पिता की एक मोजरी लाकर दी। उस्ताद के जूते में शागिर्द का पांव आ तो गया, लेकिन मामला अभी दूर तलक जाना बाकी था।
जिस महफिल में गुलजार और जगजीत मिले, उसका किस्सा थोड़ा लंबा है। दोनों की एक दूसरे से तहजीब की आशिकी रही। गुलजार कहते हैं, 'मैं उन्हें बहुत याद करूंगा, सिर्फ एक गजल गायक के तौर पर नहीं बल्कि एक दोस्त के तौर पर। जब उनकी मौत हुई तो खुद पर काबू नहीं रख पाया, वो मेरे बहुत करीब था। मेरा दोस्त एक हवा के झोके की तरह था, एक ऐसा शख्स जो कभी थमा नहीं।'
और, गुलजार ने उस दिन भी एक हवा का झोंका ही महसूस किया था जिस दिन दोनों पहली बार आमने सामने हुए। तो, मदन मोहन की महफिल में जगजीत ने एक दो गजलें सुनाईं। फिल्मी पार्टी थी, सब अपने में मगन। ऐसे में कौन किसी नौजवां को गाते हुए और वो भी कोई पचास साल पहले गजल गाते हुए, देखने का शौकीन रहा होगा? जगजीत ने गाना खत्म किया और जाकर गुमसुम से एक कोने में दुबक गए। बेहद जहीन शख्सियत के एक दूसरे नौजवान ने उनके कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘जनाब, आप तो मेहंदी हसन से भी उम्दा गाते हैं...!’