जो निर्देशक अमिताभ बच्चन को लेकर अपने जमाने की क्लासिक सुपरहिट फिल्म सत्ते पे सत्ता बना चुका हो, अक्षय कुमार को फिल्मों में लाने का सेहरा फिल्म सौगंध से अपने सिर सजा चुका हो, जैकी श्रॉफ औऱ अनिल कपूर की जोड़ी को पहली बार फिल्म अंदर बाहर में परदे पर पेश करने का क्रेडिट ले चुका हो और विनोद खन्ना जब रजनीश का आश्रम छोड़ वापस फिल्मों में आए तो उनकी सेकंड इनिंग्स की पहली फिल्म सत्यमेव जयते बना चुका हो, वह भला अपने खास दोस्त मिथुन चक्रवर्ती के बेटे मिमोह की डेब्यू फिल्म जिम्मी में गच्चा कैसे खा सकता है?
Bioscope: डायरेक्टर अक्षय कुमार का, राइटर शाहरुख खान का, और मिथुन के बेटे के लिए बनाई ये फिल्म
मिथुन चक्रवर्ती को सुपरस्टार का दर्जा दिलाने वाली फिल्म रही डिस्को डांसर जो साल 1982 में रिलीज हुई। इसी फिल्म का एक गाना है, जिम्मी जिम्मी जिम्मी, आ जा, आ जा, आ जा। फिल्म डिस्को डांसर के सिनेमैटोग्राफर नदीम खान की पत्नी मशहूर सिंगर पार्वती खान ने ये गाना गाया है। पार्वती खान वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर में गुपचुप तरीके पूजा करके एक बार बहुत बड़ा बखेड़ा खड़ा कर चुकी हैं। ख़ैर, हम बात कर रहे थे फिल्म जिम्मी की। साल 2008 में रिलीज हुई फिल्म जिम्मी को दरअसल रिलीज होने में ही कई साल लग गए।
फिल्म के प्रोड्यूसर नवान मलिक ने अपने दोस्त मिथुन चक्रवर्ती के कहने पर फिल्म तो बना दी लेकिन इसे रिलीज करने में उनके पसीने छूट गए। और, ये तब जब मिथुन चक्रवर्ती लगातार उनके पीछे खड़े रहे। ये अलग बात है कि मिथुन ने अपने बेटे के लिए फिल्म खुद बनाई नहीं। वैसे वे चाहते तो भी बना नहीं पाते क्योंकि ये वो दौर था जब मिथुन की आर्थिक हालात बहुत ठीक नहीं थी।
अपने बेटे की फिल्म जिम्मी के लिए राइटर मिथुन ने खुद चुना। लेकिन, जैसे कि डायरेक्टर राज एन सिप्पी सत्तर के दशक के ऐसे निर्देशक हो चुके थे जिन्हें इक्कीसवीं सदी के बदलावों पर यकीन नहीं था। वैसे ही फिल्म लेखक रणबीर पुष्प भी जमाने के हिसाब से खुद को न बदल पाने के चलते हाशिये पर हो चुके थे। आपको शायद यकीन नहीं होगा ये जानकर कि जिम्मी की औसत से भी खराब पटकथा लिखने वाले रणबीर पुष्प एक समय में शाहरुख खान की डेब्यू फिल्म दीवाना लिख चुके हैं। नाना पाटेकर की अग्निसाक्षी लिखने के लिए भी उनकी तारीफ खूब हुई। इनके अलावा गीत, साहेबजादे, इज्जत की रोटी और रिटर्न ऑफ ज्वैल थीफ उनकी चर्चित फिल्में रही हैं। अब मिथुन ने उनका नाम दीवाना के चक्कर में ओके किया या फिर देश की अपनी तरह की अनोखी म्यूजिकल फिल्म लाल दुपट्टा मलमल का की वजह से, किसी को समझ नहीं आया।
गड़बड़ी सबसे बड़ी यहां यही हुई कि फिल्म के लेखक और निर्देशक दोनों ओल्ड स्कूल के थे और हीरो जो लॉन्च होने जा रहा था वह था नई जेनरेशन का। पुश्तैनी परंपराओं का पालन करने वाला नए जमाने का एक डीजे। ये होनी चाहिए थी जिम्मी की एक लाइन की कहानी। और वो इसलिए क्योंकि मिमोह संस्कारी शुरू से रहे हैं। मुंबई के लोखंडवाला में नवान मलिक के दफ्तर में ही मिथुन चक्रवर्ती ने मिमोह से मेरी पहली मुलाकात कराई थी। मिमोह के भीतर संस्कार कितने कूट कूट कर भरे गए थे, ये इस बात से जाहिर होता है कि अभिवादन में हाथ बढ़ाने पर उन्होंने तब लपककर पैर छू लिए थे।
मिथुन के ज्यादा मित्र नहीं हैं फिल्म इंडस्ट्री में। सलमान खान उनकी बहुत इज्जत करते हैं। फिल्म जिम्मी का म्यूजिक रिलीज भी सलमान ने ही किया था। मधुर भंडारकर जैसे निर्देशक उनके फैन रहे हैं। टीवी भी उन्होंने बहुत मुश्किल से और बहुत समझाने पर किया। उनका कहना था कि इससे उनका स्टारडम कमजोर होता है, तब मैंने ही उन्हें समझाया था कि जिस दौर में अमिताभ बच्चन टेलीविजन पर दोनों हाथों से पैसा बटोर रहे हों, उस दौर में इस बात पर उन्हें एतराज नहीं करना चाहिए। जी न्यूज के कार्यक्रम बॉलीवुड बाजीगर में उन पर बनी डॉक्यूमेंट्री को मिली टीआरपी देख जी बांग्ला ने उनका पहला टीवी शो डांस बांग्ला डांस बनाया था और इसी का हिंदी रीमेक था जी टीवी का शो, डांस इंडिया डांस। मिमोह का भी डांस ही सबसे बड़ा हथियार था। फिल्म का नाम भी मिथुन ने डिस्को डांसर में अपने किरदार के नाम पर ही जिम्मी रखा था। लेकिन, जिम्मी वाले इमोशंस लाने में मिमोह चूक गए।
फिल्म जिम्मी की पूरा प्लानिंग ही एक तरह से देखा जाए तो गड़बड़ रही। कहानी अमिताभ बच्चन की फिल्म मजबूर से मारी हुई। फिल्म के बाकी कलाकार भी सब थके हारे हुए। हीरोइन थी विवाना सिंह जिसका नाम तक लोगों ने कहीं नहीं सुना था। जुल्फी सैयद, आदि ईरानी, पृथ्वी, राहुल देव सब सहायक कलाकार बिना करंट के। शक्ति कपूर ही थे ऐसे जिनके नाम से फिल्म को थोड़ा बहुत भाव मिला बाकी ने फिल्म के बिजनेस में कोई चमक नही जोड़ी।
रति अग्निहोत्री को फिल्म में जिम्मी का मां का किरदार करना था, लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने ना कह दिया था। नौ करोड़ रुपये की लागत से बनी ये फिल्म 9 मई 2008 को रिलीज हुई और फिल्म का पहले दिन का रेस्पॉन्स देखने के बाद मिथुन ने अगले एक हफ्ते तक किसी मित्र का फोन नहीं उठाया। वह पहले दिन ही समझ गए थे कि इस फिल्म का कुछ नहीं होने वाला। उन्होंने अपनी जान पहचान के तमाम फिल्म समीक्षकों में से किसी से भी फोन करके ये तक नहीं कहा कि जरा देख लेना। बी ग्रेड फिल्मों सा म्यूजिक और पूरी टेकिंग भी फिल्म की बी ग्रेड फिल्म जैसी ही रही। फिल्म निर्देशक की तो इस फिल्म ने दुकान बंद कराई ही, मिमोह के करियर भी इसने बड़ा सवालिया निशान लगा दिया। आपको फिल्म सिर्फ इसलिए देखनी हो कि खराब फिल्मों की दिक्कतें क्या होती हैं, तो इसे यहां देख सकते हैं।
(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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