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'लुका छुपी' के डायरेक्टर ने किया खुलासा, इन वजहों से कार्तिक आर्यन रातों रात बने सुपरस्टार

Mon, 18 Feb 2019 09:10 AM IST
shrilata biswas एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: shrilata biswas Updated Mon, 18 Feb 2019 09:10 AM IST
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luka chuppi director Laxman Utekar talks about her career
Luka Chuppi - फोटो : instagram

मराठी सिनेमा का बड़ा नाम बन चुके लक्ष्मण उतेकर ने जब मथुरा की कहानी पर फिल्म लुका छुपी बनाने का फैसला किया तो वह महीनों तक कान्हा की नगरी की गलियों में घूमते रहे। हिंदी सिनेमा के मशहूर सिनेमैटोग्राफर लक्ष्मण की बतौर निर्देशक पहली हिंदी फिल्म है लुका छुपी, उनसे अमर उजाला की एक खास मुलाकात।

luka chuppi director Laxman Utekar talks about her career
लक्ष्मण उतेकर - फोटो : file photo

सिनेमैटोग्राफर से डायरेक्टर बने राधू करमाकर और लॉरेंस डिसूजा जैसे मशहूर लोगों में आपका नाम भी शामिल हो गया है, ऐसा कब लगा कि आपको डायरेक्टर बनना चाहिए ? 
कैमरे के पीछे के अनुभव का इस्तेमाल कहानी कहने में कहना ही मेरा लक्ष्य रहा है। मैंने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म तपाल में अपने गांव की कहानी दिखाई। फिर मैंने एक और फिल्म बनाई लालबागची रानी। निर्देशन दरअसल अपने भीतर के इंसान के नजरिए को पर्दे पर पेश करने की कोशिश होती है और यही मेरा ट्रिगर प्वाइंट रहा।

luka chuppi director Laxman Utekar talks about her career
Hindi Medium

आप की मातृभाषा मराठी है और आपने फिल्म लुका छुपी ब्रज क्षेत्र में शूट की। मथुरा को समझने के लिए आपने क्या खास किया?
हिंदी मीडियम और 102 नॉट आउट जैसी फिल्मों में कैमरे की जिम्मेदारी संभालने के दौरान ही मेरे पास लुका छुपी की कहानी आई। लालबागची रानी लिखने वाले मेरे दोस्त रोहन की ये कहानी है। पहले तो इस कहानी का दायरा देख मैंने मना कर दिया कि मथुरा को पर्दे पर पेश करना शायद मेरे लिए मुश्किल होगा। फिर मैंने सोचा कि अगर इस चुनौती से मैं पीछे हट गया तो कभी हिंदी फिल्म निर्देशित नहीं कर पाऊंगा। इसके बाद मैं और रोहन डेढ़ साल तक मथुरा, आगरा, ग्वालियर घूमते रहे। घाटों पर पड़े रहे, गलियों में घूमे और वहां का रहन-सहन और बोलचाल सीखी। 

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Luka Chuppi first poster - फोटो : Instagram

हिंदी सिनेमा में सहयोगी कलाकारों की भूमिकाएं फिर दमदार होने लगी हैं, क्या कहेंगे इस बदलाव के बारे में?
दर्शकों की पसंद हर तीन साल में बदल जाती है। अब कोई भी फिल्म सिर्फ हीरो हीरोइन की वजह से नहीं चलती, सहयोगी कलाकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं। फिल्ममेकिंग टीम वर्क है और मैं अपनी फिल्म में एक स्पॉटब्वॉय को भी उतनी ही अहमियत देता हूं जितनी कि एक लीड कलाकार को।

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लक्ष्मण उतेकर - फोटो : file photo

आप अब तक एक दर्जन से ज्यादा फिल्में शूट कर चुके हैं। किसी सिनेमैटोग्राफ के डायरेक्टर बनने से फिल्म की शूटिंग और एडिटिंग में कितना फर्क आता है?
बहुत फर्क आता है। हम बेहिसाब शूटिग नहीं करते। हमें पता होता है कि फाइनली फिल्म में हम क्या दिखाएंगे। तो हम उतना ही शूट करते हैं। तमाम निर्देशक तामझाम दिखाने के लिए पूरा सेट लगा लेते हैं लेकिन, मुझे पता है कि अगर मेरी जरूरत कमरे का एक कोना है तो मैं सेट पर बस कोना ही बनवाता हूं। गौरी शिंदे और अमित शर्मा जैसे निर्देशकों की फिल्में शूट करके मैंने बहुत कुछ सीखा है।

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