आंखों में अब भी कुछ कर गुजरने का जुनून, शरीर में अब भी किसी युवा सी ही लचक और बातों में अब भी किसी बच्चे सी खनक, ये 54 के हो चले मकरंद देशपांडे की पहचान हैं। हिंदी के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम सिनेमा में बड़ा नाम कमा चुके मकरंद का रंगमच में भी बड़ा काम है। वह अब तक छोटे बड़े मिलाकर करीब सौ नाटकों का मंचन कर चुके हैं। फिल्मों से जुड़ी हस्तियों के लंबे इंटरव्यू की श्रृंखला में अगला ‘लंबा इंटरव्यू’ उन्हीं का है। वरिष्ठ लेखक-निर्देशक विनोद पांडे के इंटरव्यू को किस्तों में प्रकाशित करने के दौरान पाठकों ने हमसे ये ‘लंबे इंटरव्यू’ एक साथ ही प्रकाशित करने की फरमाइश की सो मकरंद का पूरा इंटरव्यू एक बार में ही प्रकाशित किया जा रहा है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक पंकज शुक्ल ने इस बार मकरंद देशपांडे से उनके जीवन दर्शन, उनकी कला, उनके माता-पिता और उनकी सामाजिक सोच पर लंबी बातचीत की है। आपकी टिप्पणियो का इंतजार रहेगा।
Makrand Deshpande Long Interview: ‘मुझे मंजिल तक पहुंचना ही नहीं है, मैं यात्रा में रहना चाहता हूं’
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
रुचि नारायण की इससे पहले आई फिल्म ‘गिल्टी’ तो बहुत ही सामयिक बन पड़ी, क्या कहेंगे?
मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही हिम्मतभरा प्रयास रहा। स्त्री सशक्तीकरण की जो वह बात करती हैं, उसे आकर अब खुले में बोलना पड़ेगा। कानून कोशिश कर रहा है लेकिन कानून की अपनी दिक्कतें हैं। जो न्याय मिलना है, वो मिल ही रहा है ऐसा नहीं है। निर्भया मामले में कानून ने जो किया वह एक महान उदाहरण है। पुरुष प्रधान संस्कृति में क्रूरता बहुत है। लोग ये भी बोलेंगे कि स्त्री भी तो क्रूर होती है लेकिन इसका कोई मतलब नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। हम पुरुष प्रधान संस्कृति में मानकर चलते हैं कि स्त्री गौण है। निर्बल है। दुबली है। ‘हंड्रेड’ में एक ऐसी पुलिस अफसर दिखती है जो महिला होने के चलते खाकी पहनकर भी कुछ नहीं कर सकती।
महिला सशक्तीकरण का जिक्र चला तो मुझे आपका फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ का किरदार बाबा याद आता है, जो कहानी में आता ही है लड़कियों को छेड़ने…
(जोर से हंसते हुए..) हमारी जो पुरानी फिल्में रही हैं उनमें जब तक हीरोइन को छेड़ा न जाए तब तक हीरो नहीं बनता। पहले के जमाने में क्या होता था कि इंटरवल के पहले एक विलेन चाहिए होता था फिर इंटरवल के बाद दूसरा बड़ा विलेन चाहिए होता था। तो हम वो इंटरवल के पहले वाले छोटे विलेन थे। लेकिन, ये सब करने में घिन भी बहुत आती है। ‘अंत’ नाम की एक फिल्म थी सुनील शेट्टी की। उसमें मैं एक नेता का बेटा हूं। मेरे लिए तो बड़ा मुश्किल होता था वो रेप सीन करना। फिर मैं सोचने लगा कि यार ये मैं क्या कर रहा हूं, मैं कौन हूं और क्यों ये करवाया जा रहा है मुझसे। फिर मुझे खुद ही इसका उत्तर मिला और इसी के चलते मैंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। सब वही करवाना चाहते थे और उस पर तुर्रा ये कि इसको अच्छे से कर दो। भई, इसमें अच्छा क्या होता
मुझे सिनेमा में अगर कोई फकीर दिखता है तो वह सूरत मकरंद देशपांडे की है, कैसे बचा लेते हैं खुद को ग्लैमर के इस मोह से?
हां, ये सच है कि लोगों को मैं फकीर जैसा लगता हूं। कभी आमिर (खान) ने भी यही कहा था कि मैं फकीर हूं। बात उन दिनों की है जब मैं 17-18 साल का था और क्रिकेट खेल रहा था। ग्राउंड पर मुझे ऐसा एक विचार आया कि कभी तो यहां से रिटायर होना पड़ेगा। फिर मेरे मन में विचार आया कि नहीं नहीं ऐसा कोई काम नहीं करना है जिसमें रिटायर होना पड़े। क्योंकि जीवन का और जीने का कोई विकल्प नहीं है। जीना तो पड़ेगा ही तो कोई ऐसा काम करते रहो कि जिसमें जीवन आपका आपके काम के साथ में रहे।
तो दुविधा के समय आप किससे मार्गदर्शन लेते हैं?
मेरे जीवन में दुविधा कम ही रही। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि ये एक्टिंग ही जीवन है। मुझे ऐसा लगा कि जीवन इसके बाहर भी बहुत कुछ है। मैं उसी हिसाब से जीता हूं। समय अपना साथ होना चाहिए ताकि जीवन उसके हिसाब से चलता रहे। मुझे कोई आत्मकथा लिखनी नहीं है। आत्मकथा लोग लिखते हैं दुनिया को बताने के लिए कि देखो मैंने ये मकाम हासिल किया। मैंने ये किया, मैंने वो किया तो मैंने तय किया कि मुझे मंजिल तक पहुंचना ही नहीं। मैं यात्रा में रहना चाहता हूं। सहज जीवन जीना चाहता हूं। आपने पूछा था ना कि दुविधा हो तो किससे मार्गदर्शन लेते हैं, मैंने अपनी मां से पूछा था कि क्या करूं? उसने इतना ही कहा, ‘जो सहज बन रहा हो वो कर लेना चाहिए।’ मुझे लगता है कि सहज वही है जिसमें आप कुछ भी छोड़ सकते हैं। क्या है कि मुझमें वह अहंकार भी नहीं है।
और पिता जी से क्या सीखा?
मेरी माता जी निर्मला देशपांडे चल बसीं अभी चार पांच साल पहले। पिताजी विनायक देशपांडे का हाथ अभी मेरे सिर पर है। वह भारतीय डाक में सार्टिंग अफसर थे। उनसे मैंने हिंदुस्तान सीखा है। उनकी उम्र अभी 96 साल की है। लेकिन, वह कैसे बात करते हैं, मैं बताता हूं। जैसे मैं नाम ले दूं, कटनी। तो बस मैं कटनी नाम भर ले दूं तो वो मुझे बता देंगे कि कटनी एक जंक्शन है वहां से शहडोल क्या जाता है, वहां से गुजरने वाली सारी ट्रेनों के बारे में वह बता देंगे। मतलब कि उनके दिमाग में पूरा हिंदोस्तान बसा हुआ है। कई राज्यों में रहे, ज्यादातर वक्त उन्होंने ट्रेन में बिताया है, उनको जो हिंदुस्तान की मालूमात है वह गजब है।