छोटा परदा अब बड़ा होना चाहता है। बरसों से अपने ऊपर लगे बुद्धू बक्से के तमगे को वह नोंच फेकना चाहता है। सास बहू की कहानियों के दिन कब के पूरे हो चुके हैं। नए दौर में नए तरह की कहानियों की तलाश हो रही है। ऐसी कहानियां जिनमें जिंदगी की सच्चाई हो, समाज से भिड़ने की जिजीविषा हो और हो अपने बूते समुदाय की बेहतरी की कोशिश। ऐसी ही एक कहानी है जौनपुर, उत्तर प्रदेश की बिटिया मनीषा यादव की। मनीषा ने अपनी कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर मुंबई में अपने बुजुर्ग पिता के ऐसे कारोबार को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया जिसमें महिलाओं का आना अब भी वर्जित ही माना जाता है। मनीषा ने तमाम विकट परिस्थितियों में इस काम को कामयाबी का मुकाम दिया है। वह कहती हैं, ‘बाकी सब तो बाद में है, आप तो बस ये सोचकर देखिए कि पूरा पूरा दिन मैं सिर्फ इसलिए पानी नहीं पीती थी क्योंकि जहां हमारी फैक्ट्री है, उस औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए कोई शौचालय ही नहीं है जहां मैं लघुशंका समाधान के लिए जा सकती।’
Sunday Interview: ‘मैं पूरा पूरा दिन पानी ही नहीं पीती थी क्योंकि आसपास कोई महिला शौचालय नहीं था’, मुंबई की मनीषा की मार्मिक कहानी
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मनीषा यादव का संघर्ष अब रंग ला रहा है। उनके पिता मेवालाल यादव को भी अपनी इस बेटी पर गर्व हैं। मनीषा कुल चार बहनें हैं। दो बड़ी। और, एक छोटी। सब अपने अपने परिवार के साथ व्यस्त हैं। ऐसे में मनीषा को जब लगा कि उनके बुजुर्ग पिता अकेले शायद अपनी फैक्ट्री न संभाल सकें तो उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। मनीषा बताती हैं, ‘एमबीए करने के बाद जैसे ख्वाब सबके होते हैं, मेरे भी थे कि मेरे पिता ने मुझे पढ़ा लिखाकर जिस काबिल बनाया है उसके मुताबिक मैं नौकरी करूंगी। अच्छा ऑफर मिला तो मैंने नौकरी शुरू भी कर दी। लेकिन, फिर एक दिन लगा कि लाखों की नौकरी का भी क्या फायदा, अगर पिता परेशान हैं?’
बस, उस दिन से मनीषा ने अपने पिता की खास पुर्जे बनाने की फैक्ट्री संभालने का फैसला कर लिया। मनीषा की इस कहानी पर अब छोटे परदे का एक धारावाहिक बनाने की सुगबुगाहट है। मनोरंजन जगत को कहानियों के विचार, उनका शोध और उनका विस्तार पहंचाने वाली एक कंपनी ने मनीषा यादव पर शोध शुरू किया है। उनके जीवन संघर्ष और उनकी व्यावसायिक व निजी जीवन के विस्तार को दस्तावेज की शक्ल दी जा रही है। मनीषा कहती हैं, ‘उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों ‘स्त्री शक्ति’ से लेकर ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं' जैसे नारे खूब उछल रहे हैं, लेकिन वास्तविकता में एक स्त्री का संघर्ष उसका अपना होता है। अगर उसे सामाजिक दस्तूरों के विरुद्ध जाकर कुछ करना है तो उसके लिए भी उसे खुद ही लड़ाई लड़नी होगी।’
मनीषा के पिता देश दुनिया की तमाम फैक्ट्रियों के ऐसे पुर्जे बनाते हैं जिन्हें सिर्फ ऑर्डर मिलने पर ही बनाना होता है। इनका थोक में निर्माण कोई फैक्ट्री नहीं करती। गोरेगांव ईस्ट में स्थित औद्योगिक इलाके में जहां उनकी फैक्ट्री है, वहां आसपास की सैकड़ों दूसरी फैक्ट्रियों में कोई महिला काम नहीं करती। लिहाजा कोई महिला शौचालय बनाने का ख्याल ही किसी को नहीं आया। मनीषा ने जब अपने पिता की फैक्ट्री संभाली तो अपने आधुनिक पहनावे को लेकर फब्तियां सुनने के बाद सबसे पहली मुश्किल उनको इसी की हुई। मनीषा बताती हैं, ‘मैं पूरा पूरा दिन पानी ही नहीं पीती थी। सुबह घर से फ्रेश होकर निकलती और देर शाम घर जाकर ही बाथरूम जाने का मौका मिल पाता। यहां कहीं कुछ था ही नहीं। फिर कोरोना काल में पापा का गांव जाना हुआ तो मैंने अपनी बचत के पैसों से यहीं फैक्ट्री के एक तल पर अलग बाथरूम बनवाया।’
मनीषा का संघर्ष सिर्फ जीवनशैली का संघर्ष ही नहीं है। ये संघर्ष बरसों से काम कर रहे कारीगरों को ये समझाने का भी था कि एक लड़की भी उन्हें काम दे सकती है और उनके काम को समझ सकती है। मनीषा के मुताबिक, ‘पहले तो मैं मीटिंग्स में जाती थी तो लोग मुझे ऑर्डर ही नहीं देते थे। उनको लगता था कि कॉरपोरेट से निकली लड़की ये मेहनत का काम कर ही नहीं पाएगी। लेकिन मैंने उनको भी समझाया और अपने कारीगरों को भी समझा कि वे मुझे अपनी टीम की मेंबर समझें। मैंने उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और उन्हें ये समझाया कि मैं उनकी बॉस नहीं हूं। मैं भी उनकी तरह कंपनी के लिए काम कर रही हूं और सबके साथ से ही सबका विकास हो सकेगा। अब मुझे खूब ऑर्डर मिल रहे हैं और कंपनी का काम कोरोना काल की मुश्किलों के बाद फिर से पटरी पर लौट रहा है।’