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25 Years Of Satya: मनोज बाजपेयी का बड़े पर्दे पर पहला ब्लॉकबस्टर धमाका, ‘सत्या’ की रिलीज को पूरे हुए 25 साल

Sun, 02 Jul 2023 11:25 AM IST
पंकज शुक्ल एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: पंकज शुक्ल Updated Sun, 02 Jul 2023 11:25 AM IST
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Manoj Bajpayee starrer Satya completes 25 years of release Bioscope with Pankaj Shukla Ram Gopal Varma Urmila
फिल्म सत्या और मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जिस दौर में आमिर खान, सलमान खान और शाहरुख खान जैसे धुरंधर सितारे हिंदी सिनेमा में मोहब्बत की चाशनी घोल रहे थे, उसी दौर में निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने बनाई एक ऐसी फिल्म जिसने हिंदी सिनेमा में अपराध कथाओं की दशा और दिशा ही बदल दी। प्यार से लोग राम गोपाल वर्मा को रामू कहकर बुलाते हैं और उनकी 3 जुलाई 1998 को रिलीज हुई फिल्म ‘सत्या’ को आज 25 साल पूरे हो रहे हैं। मनोज बाजपेयी को भीकू म्हात्रे के तौर पर रातोंरात मशहूर कर देने वाली इस फिल्म की मेकिंग के किस्से आज के ‘बाइस्कोप’ में।

Manoj Bajpayee starrer Satya completes 25 years of release Bioscope with Pankaj Shukla Ram Gopal Varma Urmila
फिल्म सत्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

रिलीज होते ही बनी कालजयी फिल्म
‘सत्या’ को तकरीबन सभी समीक्षकों ने कालजयी फिल्म कहा। हिंदी सिनेमा की मस्ट वॉच फिल्म बताया। बीबीसी से लेकर तमाम दूसरे विदेशी चैनलों ने इसकी तारीफ के पुल बांधे और इसे हिंदी सिनेमा का एक टर्निंग प्वाइंट भी कहा। 'सत्या' को मैं भी एक क्लासिक अपराध फिल्म मानता हूं लेकिन ये फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ के बाद की फिल्म है और हिंदी सिनेमा में मुंबई के गली कूंचों में सांस लेने वाले अंडरवर्ल्ड की सच्ची दिखने वाली असल कहानी की इस तथाकथित कैटेगरी की नींव डालने वाली निर्देशक सुधीर मिश्रा की यही फिल्म है। राम गोपाल वर्मा से लेकर अनुराग कश्यप तक सबका सिनेमा इसी एक फिल्म से पानी पाता है।

Manoj Bajpayee starrer Satya completes 25 years of release Bioscope with Pankaj Shukla Ram Gopal Varma Urmila
फिल्म सत्या - फोटो : सोशल मीडिया

रामू ने निजी जिंदगी से उठाया नायक
राम गोपाल वर्मा ‘सत्या’ से पहले भी अपनी फिल्मों ‘शिवा’, ‘रंगीला’ और ‘दौड़’ से हिंदी सिनेमा के तब युवा हो रहे दर्शकों में अपनी अलग पहचान बना चुके थे। आमिर खान स्टारर फिल्म ‘रंगीला’ खासतौर से लोगों को खूब पसंद आई और जैसा कि रामू खुद कहते हैं कि वह अपने भीतर के ही बदलावों का ही सबसे ज्यादा अध्ययन करते हैं, तो ‘रंगीला’ के बाद ‘सत्या’ का आना उनके प्रशंसकों के लिए किसी विक्षोम से कम नहीं था। इसके बीच आई फिल्म ‘दौड़’ फ्लॉप रही थी। रामू को उनके घर के लोग नकारा कहते थे। वह खुद बताते हैं, ‘ये काफी हद तक सही भी था। मेरे पास करने को कुछ था ही नहीं। मुझे बस उन लोगों में दिलचस्पी होती जो दबंग होते। स्कूल के बदमाश लड़के मुझे वैसे ही नजर आते जैसे लो एंगल कैमरे के सामने चलता हीरो। मुझे ऐसे ही लोग पसंद आते थे और धीरे धीरे मैं ऐसे लोगों का प्रशंसक बनता गया। मेरी फिल्में भी इसी का विस्तार बनती रहीं।’

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फिल्म सत्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

जब शेखर कपूर ने कहा, रामू ठग है
राम गोपाल वर्मा निर्देशित ‘सत्या’ को और गहराई से समझना हो तो उनका वह बयान जरूर पढ़ना चाहिए जो उन्होंने फिल्म ‘दिल से’ के बाद दिया था। मणिरत्नम की शाहरुख खान और मनीषा कोइराला स्टारर फिल्म ‘दिल से’ बनाने के लिए भारतीय सिनेमा के तीन दिग्गजों मणिरत्नम, शेखर कपूर और रामगोपाल वर्मा ने एक कंपनी बनाई थी, इंडिया टॉकीज। इरादा था भाषा और प्रांत की सरहदों को मिटाकर अच्छा भारतीय सिनेमा बनाना। पैन इंडिया फिल्में बनाने की तरफ ये एक बड़ा कदम था। इस कंपनी की फिल्मों में हर भाषा के कलाकार होने थी और कहानी ऐसी हो जो विदेश में भारतीय सिनेमा का समेकित प्रतिनिधित्व कर सके। पर पहली फिल्म के बाद ही तीनों की आपस में पटरी नहीं बैठ सकी। रामगोपाल वर्मा ने तब कहा था, ‘शेखर एक काबिल फिल्म निर्देशक हैं और मणि को सिनेमा के सौंदर्य शास्त्र का बढ़िया ज्ञान हैं। लेकिन, मणि को मेरी फिल्मों से नफरत है और उन्हें लगता है कि मैं बिगड़ चुका हूं। और, शेखर को लगता है कि मैं ठग हूं। तो ये मेल फिर होने से रहा।’

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फिल्म सत्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

रामगोपाल वर्मा का शीर्षस्थ निर्देशन
‘सत्या’ की कहानी कहते कहते रामू की कहानी कहना इसलिए भी यहां जरूरी है क्योंकि दो फिल्म निर्माण कंपनियों, के सेरा सेरा और सहारा, के गठजोड़ में उन्हें 10 फिल्में बनाने का ठेका मिला था, वह चाहते तो हिंदी सिनेमा को एक नई राह पर ले जा सकते थे। लेकिन, उन्होंने न अधिकतर पैसा बर्बाद किया बल्कि एक से बढ़कर एक इतनी खराब फिल्में बनाईं कि ‘रामगोपाल वर्मा की आग’ के आने तक उनके कट्टर प्रशंसकों ने भी उनकी फिल्में न देखने की कसम खा ली। उन्हें पता था कि किसी हिंदी फिल्म के बारे में विदेश से कोई तारीफ करे तो भारत के लोगों को वह फिल्मकार या कलाकार महान लगने लगता है। लेकिन, उन्होंने कभी ये नहीं बताया कि ऐन रैंड से लेकर नीत्शे तक की अपनी पढ़ाई के बीच वह दरअसल जेम्स हेडली चेईज के उपन्यासों से कभी आगे नहीं बढ़ सके।

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