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अफसाना: हीरो से बढ़कर था बॉलीवुड में इन विलेन का रुतबा, एंट्री पर खड़े हो जाते थे दर्शकों के रोंगटे

Amrin Hussain अमरीन हुसैन
Updated Mon, 12 Apr 2021 08:18 PM IST
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Most famous and larger than life Bollywood villains and their cult dialogues
बॉलीवुड विलेन - फोटो : Social media

वर्ष 1913 से शुरू हुआ भारतीय सिनेमा का इतिहास अब एक सदी से भी अधिक प्रगाढ़ हो चुका है। इस देश में जितना पुराना सिनेमा का अस्तित्व है उतने ही विशिष्ट और विलक्षित इसके किरदार भी। और इनमें एक स्थान जिसकी जड़ें वर्षों से अपनी विशेष पकड़ बनाए हुई हैं वो है खलनायिकी का किरदार। वैसे तो अब तक न जाने कितनी ही फिल्में पर्दे पर उतर चुकीं और दर्शकों ने कई खलनायकों की चूं-चां सुनी है।



लेकिन इनमें से कुछ ऐसे विलेन निकलकर आए, जिन्होंने साबित किया कि खलनायिकी महज एक नकारात्मक किरदार नहीं बल्कि सकारात्मक बिंदुओं को जागृत कर मृत हीरो को जीवनदान देने की क्षमता रखने वाला अमृत है। आपने भी कई ऐसी पिक्चरें देखी होंगी, जिनमें विलेन के आगे हीरो का रोल फीका पड़ जाता है। और विलेन खलनायक होकर भी लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर छा जाता है।

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कुलभूषण खरबंदा (शाकाल, फिल्म: शान)

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शाकाल के रूप में कुलभूषण खरबंदा - फोटो : Social media

बेशक आप सबने गब्बर, मोगैंबो और कांचा चीना की खलनायिकी जरूर देखी होगी। लेकिन आज बॉलीवुड के उन खास विलेन के बारे में उनके सिग्नेचर डायलॉग्स के साथ जिक्र करेंगे, जिन्होंने अपनी दमदार विलने रोल के जरिए अपने किरदार को अमर कर दिया। और आज भी हमारे जहन के किसी कोने में जीवित हैं। सबसे पहले शुरुआत करेंगे ‘शाकाल' से। हो सकता है आपमें कइयों को ये किरदार याद भी हो। ये रोल कुलभूषण खरबंदा ने 1980 में आई फिल्म 'शान' में निभाया था।

'शाकाल के हाथ में जितने पत्ते होते हैं, उतने ही पत्ते उसकी आस्तीन में होते हैं...' यह डायलॉग सुनते ही फिल्म शान का विलेन शाकाल याद आ जाता है। खूंखार विलेन के स्विमिंग पूल में इंसानी मांस के भूखे मगरमच्छ रहा करते थे। ऐसे विलेन से भिड़ने के लिए तो हीरो को भारी-भरकम तैयारी करनी पड़ती थी।

कुलभूषण खरबंदा ने एक बार अपने एक इंटरव्यू में यह भी बताया था कि कैसे उन्हें इस रोल के लिए कास्ट किया गया था। शोले के बाद रमेश सिप्पी एक खलनायक की तलाश में थे। कुलभूषण को एक दिन लंच पर बुलाया गया था और इस फिल्म में साइन करने से पहले एक और फिल्म के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करवाया गया था। इस किरदार के लिए उन्हें आज भी याद किया जाता है।

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अजीत (लॉयन, फिल्म: जंजीर)

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अजीत - फोटो : Social media

1976 में आई एनएन सिप्पी द्वारा निर्मित फिल्म ‘कालीचरण’ में ‘लॉयन’ के रूप में अजीत की खलनायिकी भला कौन भूल सकता है। ‘सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है…’ उनका मशहूर डायलॉग था। अजीत ने इस फिल्म से खलनायिकी के तौर-तरीके ही बदल दिए थे। जोर-जोर से चिल्लाना, ठहाके मारकर हंसना और ओवर एक्टिंग के इतर वे विलेन के रोल में काफी संजीदगी और स्मार्टनेस ले आए थे।

‘लॉयन’ के किरदार में अजीत ने अपनी व्यक्तिगत शैली और विशिष्ट लहजे के साथ अपने किरदार को न सिर्फ अमर कर दिया बल्कि पूरा का पूरा ढर्रा ही बदल डाला। इस फिल्म के बाद से तो हर जगह खलनायक के किरदार में अजीत की ही डिमांड होने लगी थी। एक समय ऐसा आया था जब वो अभिनेता से ज्यादा फीस लिया करते थे।

रंजीत (कुंदन, फिल्म: शर्मीली)

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रंजीत - फोटो : Social media

गोपाल बेदी जिन्हें दर्शकों ने रंजीत के नाम से जाना, एक ऐसे खलनायक थे जो स्क्रीन पर आते थे तो ऑडियन्स भी हीरो की सलामती के लिए दुआ मांगती थी। रंजीत बड़ी-बड़ी फिल्मों में सुपरहिट हीरोज के खतरनाक विलेन रहे। अपने करियर में इन्होंने बड़े ही जबरदस्त किरदार निभाए और अपना एक अलग मुकाम बनाया। रंजीत ही बॉलीवुड के वो विलेन थे, जिनपर लड़कियां मरा करती थीं। क्योंकि उनके पास स्टाइल, चार्म और जबरदस्त पर्सनैलिटी थी। इनके नाम पर 350 बार ऑनस्क्रीन दुष्कर्म का रिकॉर्ड था।

रंजीत को 25 फिल्मों में उनके असली नाम से कास्ट किया गया था। कहते हैं कि गब्बर के किरदार के लिए निर्माताओं ने रंजीत के नाम पर भी गहन विचार किया था। हालांकि, पहली पसंद डैनी थे। रंजीत को फिल्म ‘शर्मीली’ से जबरदस्त पहचान मिली थी, जिसमें राखी लीड अभिनेत्री थीं। और इस फिल्म में राखी के साथ दुष्कर्म का सीन देखकर हॉल में बेटे की पिक्चर देखने आई रंजीत की फैमिली उनसे खासा खफा होकर हॉल से उठकर चली गई थी। बाद में राखी को उनके घर जाकर परिवार वालों को समझाना पड़ा था कि आपका बेटा आचरण से बहुत अच्छा है और फिल्म में वो सिर्फ एक्टिंग कर रहा था।

रंजीत ने अपने फिल्म से लेकर टीवी तक के अभिनय के सफर में बहुत सारे किरदार निभाए, लेकिन एक डायलॉग ‘भगवान के लिए मुझे छोड़ दो’ ने रंजीत की खलनायिकी को सालों तक जिंदा रखा। ‘और चिल्ला! यहां तेरी चीख सुनने वाला कोई नहीं’, ‘इतनी अच्छी चीज भगवान के लिए छोड़ दूं...तो मैं क्या करूंगा’, ‘हमने कोई धरम खाता नहीं खोल रखा है…हम जब कुछ देता है तो उसके बदले कुछ लेता भी है (कीमत) ’, ‘ब्यूटी ब्यूटी ब्यूटी…बेटी बेटी बेटी (हाउसफुल 2)’ ये उनके मशहूर डायलॉग्स में शुमार हैं।

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जीवन (रॉबर्ट, फिल्म: अमर अकबर एंथोनी)

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जीवन - फोटो : Social media

24 अक्टूबर 1915 में श्रीनगर में जन्में जीवन 60, 70 और 80 के दशक के बॉलीवुड सिनेमा के शीर्ष खलनायक थे। उन्हें सबसे पहले 60 फिल्मों में ‘नारायण-नारायण’ कहने वाले नारद मुनि के तौर पर पहचान मिली। उनका सफर काफी लंबा सफल रहा। 1977 में आई ‘अमर अकबर एंथोनी’ फिल्म में उन्होंने रॉबर्ट का किरदार निभाकर अपने खलनायिकी चक्र को और गति दे दी थी।

उनके बोलने का अंदाज, दुश्मनी निभाने का तरीका और लक्ष्य पर तीखी नजरें अभिनेता जीवन की खलनायिकी को सबसे जुदा करती थीं और वे पर्दे पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करते थे। जीवन ने अपनी जिंदगी में सभी प्रकार की खलनायक भूमिकाओं में अभिनय किया। कभी मध्ययुगीन फिल्म में एक दुष्ट मंत्री, एक बुरे ग्रामीण तो कभी बर्बर शहरी का किरदार निभाया।

जीवन के कुछ आइकॉनिक डायलॉग्स थे ‘आदमी के जब बुरे दिन आते हैं तो उसकी अकल मारी जाती है’, ‘जिंदगी में कुछ एहसान ऐसे भी होते हैं जिनकी कीमत असल से ज़्यादा सूद में चुकानी पड़ती है’, ‘आज तो इंसाफ होगा या मामला साफ होगा।’

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