राजेश खन्ना सही मायने में भारतीय फिल्म उद्योग के पहले सुपर स्टार थे। उनके बालों का स्टाइल हो, या गुरु कॉलर वाली शर्ट पहनने का तरीका हो या पलकों को हल्के से झुकाकर गर्दन टेढ़ी कर निगाहों के तीर छोड़ने की अदा, उन्होंने सिनेमा प्रेमियों की पूरी एक पीढ़ी को सम्मोहित कर रखा था। राजेश खन्ना पर बहुचर्चित किताब 'द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज फर्स्ट सुपरस्टार' लिखने वाले यासिर उस्मान बताते हैं, "बंगाल की एक बुजुर्ग महिला थीं। उनसे मैंने पूछा कि राजेश खन्ना क्या थे आपके लिए? उन्होंने कहा कि आप नहीं समझेंगे। जब हम उनकी फिल्म देखने जाते थे तो हमारी और उनकी बाकायदा डेट हुआ करती थी।"
राजेश खन्ना की गाड़ी की धूल से लड़कियां भरती थीं अपनी मांग, कुछ ऐसा था पहले सुपरस्टार का स्टारडम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हम मेकअप करके, ब्यूटी पार्लर जाकर, अच्छे कपड़े पहनकर जाते थे और हमें लगता था कि वो जो पर्दे की तरफ़ से पलकें झपका रहे हैं या सिर झटक रहे हैं या मुस्करा रहे हैं, वो सिर्फ हमारे लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हॉल में बैठी हर लड़की को ऐसा ही महसूस होता था। जिस मास 'हिस्टीरिया' की लोग बात करते हैं, उसके अनगिनत किस्से मुझे सुनने को मिले कि कैसे उनकी सफेद गाड़ी, लड़कियों के लिपस्टिक के रंग से गुलाबी हो जाती थी और कैसे उनकी गाड़ी की धूल से लड़कियां अपनी मांग भरती थीं। ये सुने-सुनाए नहीं, बल्कि रियल किस्से हैं।
1965 में राजेश खन्ना ने यूनाएटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्मफ़ेयर प्रतिभा खोज अभियान में बाज़ी मारी थी। उसके बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यासिर उस्मान बताते हैं, "यूनाएटेड प्रोड्यूसर्स में बीआर चोपड़ा, जी पी सिप्पी और शक्ति सामंत जैसे निर्देशक हुआ करते थे।" "ये सब मिलकर कुछ अच्छे अभिनेता ढ़ूंढ़ने का काम कर रहे थे। इसमें काफी लोग चुने गए थे जैसे विनोद मेहरा, राजेश खन्ना और फरीदा जलाल। राजेश खन्ना से पूछा गया कि आप क्या सुना सकते हो तो उनका थियेटर का एक मशहूर डायलॉग था, वो उन्होंने सुना दिया और अंतत: उनका चुनाव हो गया।"
"जीपी सिप्पी साहब ने सबसे पहले उन्हें एक फ़िल्म 'राज' दी, जिसमें उनका डबल रोल था. इसके बाद उन्होंने चेतन आनंद की 'आख़िरी खत' साइन की। लेकिन 'आख़िरी ख़त' पहले रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई। राजेश खन्ना के बारे में मशहूर था कि वो अहंकारी थे और सेट पर हमेशा लेट आते थे। "मैंने लोगों से पूछा कि क्या ये 'राज़' के वक्त से ही था तो पता चला कि शुरू से ही ऐसा था। जब पहले दिन इनकी शूटिंग थी तो इन्हें सुबह आठ बजे बुलाया गया था लेकिन ये आदत के मुताबिक 11 बजे पहुंचे। सब लोग देख रहे थे कि ये तो नया लड़का है, उनका पहला शूट है, ऐसा कैसे कर सकता है। कुछ लोगों ने उन्हें घूरकर देखा। थोड़ी डांट भी लगाई सीनियर टेक्नीशियंस ने।
इन्होंने कहा देखिए ऐक्टिंग और करियर की ऐसी की तैसी। मैं किसी भी चीज के लिए अपना लाइफ-स्टाइल नहीं बदलूंगा। तो सब खामोश हो गए। इस तेवर के साथ दो ही चीज़ें होती हैं। या तो आदमी बहुत ऊपर जाता है या बहुत नीचे जाता है। जिस फ़िल्म ने राजेश खन्ना को राष्ट्रीय पहचान दी, वो थी 'आराधना'। यूं तो ये फिल्म बनाई गई थी शर्मिला टैगोर के लिए, लेकिन इसने 'लॉन्च' किया राजेश खन्ना को। 'बॉलीवुड न्यूज सर्विस' के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार दिनेश रहेजा बताते हैं, "मुझे अभी तक याद है कि मेरा बड़ा भाई गोपाल अपनी गर्लफ़्रेंड को 'इंप्रेस' करने के लिए 'मेरे सपनों की रानी' गाना इतनी जोर से बजाया करता था कि सामने की बिल्डिंग में रहने वाली उस लड़की को वो साफ़ सुनाई देता था।"