दक्षिण भारतीय फिल्मों के रिलीज के साथ ही अब हिंदी में भी रिलीज होने की परंपरा के पहले से कुछ हिंदी फिल्में ऐसी बनती रही हैं, जिनके मूल भाषाई संस्करण ओटीटी या यूट्यूब पर उपलब्ध हैं। ऐसी ही एक फिल्म है राजकुमार राव की अगली फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’। शाहिद कपूर की फिल्म ‘जर्सी’ और शिल्पा शेट्टी की फिल्म ‘निकम्मा’ के न चलने की वजह यही बताई गई कि इन रीमेक की मूल फिल्में लोगों ने अपने मोबाइल पर पहले ही देख लीं। राजकुमार राव के लिए उनकी नई फिल्म ‘हिट द फर्स्ट केस’ बॉक्स ऑफिस पर उनका अपना ‘टेस्ट केस’ भी है। हालांकि राजकुमार कहते हैं कि वह पिछली फ्लॉप फिल्मों का ‘प्रेशर’ लेने की बजाय नई फिल्म की ओपनिंग पर ज्यादा फोकस करते हैं। राजकुमार राव से ‘अमर उजाला’ की एक खास बातचीत।
Rajkumar Rao Exclusive: ‘सिनेमा के चलने के लिए अच्छी नीयत का होना बहुत जरूरी है’
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फिल्म 'हिट द फर्स्ट केस' जब पहले से ओटीटी पर उपलब्ध है तो इसकी हिंदी रीमेक को करने की वजह?
हां, मैंने भी अमेजन प्राइम वीडियो पर पर दो साल पहले ये फिल्म देखी थी। मुझे इसकी कहानी बहुत अच्छी लगी। शैलेश ने बताया कि वह इसको हिंदी में बनाकर अधिक दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं। उनके मुताबिक उन्होंने कहानी में काफी बदलाव किए हैं और कहानी को एक नई ताजगी के साथ पेश किया है। मैंने भी फिल्म की कहानी देखने के साल भर से ज्यादा वक्त बाद इसकी शूटिंग शुरू की तो मैं भी कहानी भूल चुका था और मेरे लिए ये फिल्म एकदम नई कहानी है।
लेकिन, रीमेक फिल्में अब ज्यादा आकर्षित नहीं करतीं हिंदी सिनेमा के दर्शकों को..
मुझे लगता है कि हर फिल्म की अपनी किस्मत होती है। आपको सिर्फ एक अच्छी फिल्म बनाने की जिम्मेदारी मिली है तो हमने इस फिल्म में बखूबी वह जिम्मेदारी निभाई है। हमारी कोशिश यही है कि हम एक बहुत अच्छी फिल्म बहुत ही ईमानदारी से बनाएं। सबने बहुत ही मेहनत से काम किया है। अब रिलीज के बाद थियेटर में क्या होगा? बाक्स ऑफिस रिपोर्ट क्या होगी, यह बात न तो आपको पता है और न ही मुझे।
जब आपकी कोई नई फिल्म रिलीज होती है तो कितना ‘प्रेशर’ होता है?
‘प्रेशर’ तो नहीं होता बस थोड़ी जिज्ञासा होती है कि शुक्रवार को कैसी ओपनिंग मिलेगी? मेरा मानना है कि ‘प्रेशर’ उस चीज का लो जो आपके हाथ में हो। फिल्म चलेगी कि नहीं चलेगी यह आपके हाथ में नही होता है। यह दर्शकों के हाथ में होता है इसलिए ‘प्रेशर’ लेकर कोई फायदा नहीं होता है।
और, इतनी सारी मेहनत के बाद भी जब फिल्म का नतीजा अच्छा नहीं होता तो कभी जानने की कोशिश करते हैं कि चूक कहां हुई?
फिल्म को बनाने के दौरान अगर किसी एक की भी नीयत खराब हो जाए तो गड़बड़ हो जाती है और वह स्क्रीन पर दिखता है। सिनेमा के चलने के लिए अच्छी नीयत का होना बहुत जरूरी है। ‘न्यूटन’ में हम सबकी ऐसी नीयत थी कि एक अच्छी कहानी कहनी है। लेकिन उसमे अगर कोई आकार कहता कि इसमें एक डांस नंबर बढ़ा देते हैं तो फिल्म खराब हो जाती। अगर आपने 'बधाई दो' देखी है तो वहां फिल्म ऐसे मोड़ पर एंड कर रहे हैं, जहां सभी इमोशनल है और फिल्म खत्म होने के बाद एक ढिंचैक सॉन्ग चला दें तो सब खराब हो जाएगा। जहां मुझे लगता है कि मेरी बात सुनी जाएगी वहां ऐसे मौकों पर मैं सुझाव दे देता हूं लेकिन जहां लगता है कि मेरी बात नहीं सुनी जाएगी, वहां कुछ नहीं बोलता।