भारत सरकार की तरफ से हर साल दिए जाने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में शामिल सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के नाम से मिलते जुलते पुरस्कारों के बांटे जाने पर अभिनेता सचिन पिलगांवकर को आपत्ति नहीं है। वह कहते हैं कि दादा साहब फाल्के सिनेमा की बड़ी शख्सीयत रहे हैं और उनके नाम के सम्मान में भारत सरकार के अलावा कोई दूसरी संस्था भी पुरस्कार बांटती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। हालांकि, ये पूछे जाने पर कि क्या ऐसी परंपराएं शुरू होने से आने वाले दिनों में पद्मश्री और पद्मभूषण पुरस्कारों से मिलते जुलते नाम वाले पुरस्कार नहीं शुरू हो जाएंगे, सचिन का कहना था कि अगर सरकार को लगता है कि ये गलत है तो उसे इनको कॉपीराइट के तहत पंजीकृत कराना चाहिए और इन पर रोक लगानी चाहिए।
सचिन पिलगांवकर को चुभा दादा साहब फाल्के पुरस्कार पर पूछा गया सवाल, यहां समझिए पूरा मामला विस्तार से
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दादा साहब फाल्के एकेडमी अवार्ड में सचिन
सचिन पिलगांवकर स्वयं भी अतीत में ऐसे ही एक पुरस्कार दादा साहब फाल्के अकेडमी अवार्ड्स में शामिल हो चुके हैं। ये साल 2010 की बात है। उन पुरस्कारों में इनके आयोजक सलमा आगा, प्राण, गजेंद्र चौहान और जगदीप आदि कलाकारों को भी बुलाने में सफल रहे थे। पुरस्कार पाने वाले तमाम कलाकारों को अक्सर ये पता भी नहीं होता कि दादा साहेब फाल्के एकेडमी अवार्ड या फिर द लेजेंड दादा साहब फाल्के पुरस्कार का भारत सरकार के दादा साहब फाल्के पुरस्कार से कोई लेना देना नहीं है। तमाम कलाकार तो इसके बाद अपने परिचय में लिखना भी शुरू कर देते हैं, दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता।
क्या है दादा साहब फाल्के पुरस्कार?
देश में सिनेमा का ये सर्वोच्च सम्मान दिए जाने की परंपरा भारत सरकार ने 1969 से शुरू की थी और पहला दादा साहब फाल्के पुरस्कार देविका रानी को दिया गया था। उसके बाद से अब तक ये पुरस्कार 52 लोगों को दिया जा चुका है। अब तक साल 2019 तक के दादा साहब फाल्के पुरस्कार घोषित हो चुके हैं। आखिरी पुरस्कार अभिनेता रजनीकांत को उनके सिनेमा के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान के लिए घोषित किया गया। इस पुरस्कार में एक शॉल, एक स्वर्ण कमल, एक प्रमाण पत्र और दस लाख रुपये मिलते हैं। इन पुरस्कार विजेताओं की पूरी सूची आप यहां भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय की वेबसाइट पर देख सकते हैं।
https://dff.nic.in/PhalkeAward.aspx
दादा साहेब फाल्के एकेडमी अवार्ड
यह पुरस्कार मुंबई में स्थापित दादा साहेब फाल्के एकेडमी ने देना शुरू किया था। इसकी शुरूआत सिनेप्रेमी रामगोपाल गुप्ता ने की थी। लेकिन अब इन पुरस्कारों से उनका कोई लेना देना नहीं बचा है। फिल्म कलाकारों में इन पुरस्कारों को लेकर कभी जागरुकता नहीं आई और सबने इसे देश का सर्वोच्च सिनेमा सम्मान सरीखा ही समझ लिया। मुंबई के तमाम कलाकारों व फिल्मकारों के दफ्तरों में वैसी ही ट्रॉफियां देखने को मिल जाती हैं, जैसी यहां शिल्पा शेट्टी ने थाम रखी है। यह ट्रॉफी भारत सरकार से मिलने वाला सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं है।
द लेजेंड दादा साहब फाल्के अवार्ड
भारत सरकार की तरफ से दिए जाने वाले सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार के नाम से मिलते जुलते पुरस्कार द लेजेंड दादा साहब फाल्के अवार्ड अभी कुछ दिनों पहले मुंबई में और बांटे गए। भारतीय फिल्म एंड टीवी प्रशिक्षण संस्थान, पुणे के अध्यक्ष रह चुके चर्चित अभिनेता गजेंद्र चौहान इस पुरस्कार को पाने के बाद सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हुए। इन मुंबइया फाल्के पुरस्कारों का विरोध इसी के बाद और मुखर हुआ है। गजेंद्र चौहान ने यहां जो ट्रॉफी थाम रखी है, वह भी भारत सरकार से मिलने वाला सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार नहीं है।