सुरिंदर कौर पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री की एक ऐसी लोक गायिका और संगीतकार थीं, जिनकी ख्याति देश में ही नहीं बल्कि विदेशों भी फैली हुई थी। उनकी सुरीली आवाज का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुरिंदर को 'पंजाब दी कोयल' और 'पंजाब दी आवाज' कहकर भी बुलाया जाता था। कई देशों में अपनी आवाज का जादू बिखरने वाली सुरिंदर को लोगों ने उन्हें उनके संगीत के कारण सिर-आंखों पर बैठा लिया था। पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री की दुनिया में उनकी गायकी का कद इतना ऊंचा है कि हर सम्मान उसके आगे छोटा लगता है। आज यानी 25 नवंबर को इसी प्रसिद्ध गायिका की 93वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इसी खास मौके पर चलिए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों के बारे में...
Surinder Kaur: ऐसे 'पंजाब दी आवाज' बनी लोक गायिका सुरिंदर कौर, छह दशक के करियर में गाए 2000 से ज्यादा गाने
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परिवार का कोसो तक म्यूजिक से नहीं था वास्ता
सुरिंदर कौर का जन्म 25 नवंबर, 1929 को भारत-पाकिस्तान के विभाजन से पहले पंजाब के लाहौर में हुआ था। गायिका का जन्म एक सिख परिवार में हुआ था। सुरिंदर के सात भाई-बहन थे। कमाल की बात यह है कि सुरिंदर के घर का कभी भी म्यूजिक से कोई वास्ता नहीं रहा था, ऐसे में उन्हें गाने-बजाने की इजाजत नहीं थी। लेकिन सुरिंदर का संगीत के तरफ झुकाव देखते हुए उनके बड़े भाई ने उनका समर्थन किया और बड़े मुश्किल से अपने घरवालों को सुरिंदर और उनकी बड़ी बहन प्रकाश कौर की संगीत शिक्षा के लिए मनाया। इसका नतीजा यह हुआ कि 12 साल की उम्र से सुरिंदर और उनकी बहन प्रकाश कौर ने मास्टर इनायत हुसैन और मास्टर पंडित मणि प्रसाद से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने शुरु कर दी थी।
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सबसे पहले यहां बिखेरा अपनी आवाज का जादू
12 साल की उम्र से संगीत की शिक्षा लेने वाली सुरिंदर कौर ने पहली बार साल 1943 में लाहौर रेडियो के लिए ऑडिशन दिया था। इस ऑडिशन में वह बच्चों के म्यूजिक प्रोग्राम के लिए सिलेक्ट हो गई थी। यहीं से उनके एक नए जीवन की शुरुआत हुई थी। इसके बाद सुरिंदर और प्रकाश कौर ने अपनी पहली एल्बम में ड्यूएट गाया, जिसका एक गाना 'मावां ते धीयां रल बैठियां' काफी पॉपुलर हुआ था। इस गाने ने दोनों सुरिंदर और उनकी बहन को रातों-रात स्टार बना दिया था। साल 1947 में विभाजन के बाद सुरिंदर का परिवार दिल्ली आकर रहने लगा था और बाद में वे लोग मुंबई जाकर बस गए थे। यहां सुरिंदर कौर ने फिल्म इंडस्ट्री में बतौर प्लेबैक सिंगर काम करना शुरू किया।
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पति ने बनाया स्टार
फिल्मों में अपना सफर शुरू करने के बाद सुरिंदर ने सरदार जोगिंदर सिंह सोढ़ी से शादी कर ली थी। वह दिल्ली यूनिवर्सिटी में साहित्य के प्रोफेसर थे। सुरिंदर कौर के पति ने उनके करियर को उड़ान देने में एक अहम भूमिका निभाई थी। सुरिंदर ने खुद एक बार बताया था कि उनके पति ने ही उन्हें स्टार बनाया था। पति जोगिंदर सिंह सोढ़ी और सुरिंदर कौर ने साथ में कई सुपरहिट गाने लिखे थे, जिनमें ‘चन कित्था गुजारी एई रात वे’, ‘लठ्ठे दी चादर’, ‘शौंकण मेले दी’ ‘गोरी दिया झांझरां’ और ‘सड़के-सड़के जांदिये मुटियारे नी’ जैसे गाने शामिल हैं। ये सभी गाने सुपरहिट रहे थे। सुरिंदर कौर का करियर छह दशक से ज्यादा का रहा है, जिसमें उन्होंने 2000 से ज्यादा गाने गाए हैं।
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पद्मश्री से हुईं सम्मानित
सुरिंदर कौर ने पंजाबी लोक गीतों के साथ-साथ साल 1948 से 1952 में कई हिंदी फिल्मों में भी अपनी आवाज का जादू चलाया था। पाक-साफ आवाज की मालकिन सुरिंदर कौर के गायन और अंदाज का हर कोई मुरीद हो जाता था। इसी को ध्यान में रखते हुए साल 2006 में भारत सरकार ने सुरिंदर को के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्मश्री‘ से सम्मानित किया था। सुरिंदर के लिए इस पुरस्कार की सिफारिश हरियाणा सरकार के द्वारा की गई थी। लेकिन इसी साल बीमारी के कारण सुरिंदर को यूएस के न्यू जर्सी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, जिसके बाद 77 साल की उम्र में निधन हो गया था।
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