तापसी पन्नू हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों का दर्जा अभिनेताओं के समान करने को लेकर चल रही मुहिम में शामिल हैं और उम्मीद करती हैं कि अभिनेत्रियों की आने वाली पीढ़ी ये बराबरी जरूर हासिल कर लेगी। उनसे पंकज शुक्ल की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात।
Taapsee Pannu Interview: “हमारी तमाम आबादी को तो पता ही नहीं उन्हें खुशी किस बात से मिलती है”
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आपने लीक तोड़कर अभिनय को अपना पेशा चुना, कितना मुश्किल है अब भी युवाओं के लिए अपने सपनों की उड़ान भरना?
हमने लोगों के हिसाब से खुद को ढालने को आदत मान लिया है। बच्चों को शुरू से बताया जाता है कि अच्छे नंबर लाओगे तो समाज में नाम होगा। बच्चा क्या करना चाहता है, उसे किस बात में खुशी मिल रही, वह उससे पूछा भी नहीं जाता। भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों की यही समस्या है, यहां लोग क्या कहेंगे, ये महत्वपूर्ण होता है। देखा जाए तो हम बचपन से लेकर आखिर तक बस दूसरों को खुश करने में लगे रहते हैं। हमारी तमाम आबादी को तो पता ही नहीं उन्हें खुशी किस बात से मिलती है क्योंकि वह तो दूसरों को खुश रखने में ही व्यस्त रहते हैं।
तो आपको भी सलाह मिली होगी कि ये करो, ये न करो?
हां, जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में आई तो यहां भी तरह तरह के लोग होते हैं। ये लोग आपको बताते हैं कि ये करो, वह करो। ऐसे करना चाहिए, इससे ये होगा। इस तरह की पिक्चरें मत करो, उस तरह की करो। इस तरह के रोल मत करो, वैसे करो। इन लोगों के साथ काम करो, इन लोगों के साथ उठो बैठो। तो ये जो लोग हैं, ये तो लगातार आपको कुछ न कुछ बोलते ही रहेंगे। ये तय आपको करना है कि आपका लक्ष्य क्या है, उसे कैसे पाना है?
ये तो निजी बात हो गई लेकिन सोशल मीडया पर आपका नाम लेकर कोई जब सीधे कुछ लिखता है तो आपकी प्रतिक्रिया अब क्या होती है?
बहुत ही साधारण सी बात है, जीवन में आपको बुरा उनकी बातों का ही लगता है जो आपके जीवन में कुछ मायने रखते हैं। सड़क पर शोर मचाने वालों से घरों में बैठे रहने वालों को क्यों बुरा लगेगा भला? हां, सोचने वाली बात ये है कि मेरे बारे में किसी के पास बात करने का कितना समय है, तो मैं उसके जीवन में कितनी अहमियत रखती हूं। जबकि, ऐसे लोगों के लिए मेरे पास न सोचने का समय है और न जवाब देने का।
आप इन दिनों ऐसे किरदार कर रही हैं जिनके बारे में कुछ दशक पहले तक सोचना भी शायद हिंदी सिनेमा में मुश्किल था। कितना सौभाग्यशाली मानती हैं खुद को कि इस दौर में अभिनय करने का मौका मिला?
बहुत! ये बदलाव मैंने अपनी आंखों के सामने होते देखा है। अभी कुछ साल पहले मुझसे लोग मेरे अगले पांच या 10 साल के लक्ष्य के बारे में पूछते थे तो मैं कहती थी कि अभिनय का मौका नहीं मिला तो कुछ और कर लेंगे। अभिनय में भी तो ऐसे ही आ गए थे। ये सोच मेरी इसलिए थी क्योंकि हमे बताया गया अभिनेत्रियों का अभिनय काल पांच या दस साल ही होता है। फिर नई हीरोइन आ जाती है। हां, हीरो बने रहते हैं बरसों तक। लेकिन, जब मं दक्षिण भारतीय सिनेमा से हिंदी सिनेमा में आई तो मैंने चीजें बदलते देखीं। विद्या बालन की फिल्मों ‘डर्टी पिक्चर’ और ‘कहानी’ ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया। अभिनेत्रियों के लिए इसके बाद जो सिनेमा में बदलाव आए, वे मेरे सामने हुए और मैंने इस बहती गंगा में अच्छे से हाथ धोया है।