‘कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मांस, दो नैना मत खाइयो, मोहे पिया मिलन की आस’
‘दर पर आया दीवाना…’ लैला-मजनू का रूहानी इश्क, हीर-रांझा की पाक मोहब्बत; बड़े पर्दे पर उतरीं अमर प्रेम कहानियां
Valentine Day Special: हिंदी सिनेमा ने जब फलना-फूलना शुरू किया तो बड़े पर्दे पर मोहब्बत की कहानियों को सबसे ज्यादा बयां किया। मजनू ने कैसे लैला के इश्क में जान दी? हीर और रांझा का प्यार क्यों मुकम्मल नहीं हुआ? इस दर्द को हिंदी सिनेमा ने वक्त-वक्त पर बखूबी दिखाया। वैलेंटाइन-डे के मौके पर जानिए, ऐसी ही कुछ चर्चित फिल्मों के बारे में जिनमें अमर प्रेम कहानियां दर्शकों की आंखों को नम कर गईं।
रांझा रांझा करते-करते हीर दीवानी हुई
प्यार का जिक्र हो और हीर-रांझा की बात ना ऐसा कैसे हो सकता है। 16वीं शताब्दी में पंजाब प्रांत में यह प्रेम कहानी पनपी। दोनों के बीच प्यार हुआ लेकिन परिवार और दुनिया ही दुश्मन बन बैठी। हीर की शादी जबरन कराई जाने लगी। लेकिन हीर ने जहर खा लिया। हीर की मौत रांझा को बर्दाश्त ना हुई, उसने भी मौत को गले लगाया। इस दर्द भरी कहानी को हिंदी सिनेमा में कई बार दिखाया गया।
साल 1970 में चेतन आनंद निर्देशित फिल्म ‘हीर रांझा’ में राज कुमार और प्रिया राजवंश पर यह प्रेम कहानी फिल्माई गई। फिल्म में हीर से दूर होकर रांझा का दिल दर्द से भर उठता है। इस दर्द को एक गाने ‘ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं…’ में बखूबी बयां किया जाता है। इसी तरह हीर भी अपना दुख बयां करती है, जिस पर फिल्म में गीत है, ‘दो दिल टूटे दो दिल हारे दुनिया वालों सदके तुम्हारे।’ यह फिल्म, गीत आज भी दर्शकों की जुबान पर हैं और हीर-रांझा का प्यार भी प्रेमियों के मन में जिंदा है।
इसी तरह साल 1992 में ‘हीर रांझा’ नाम से एक फिल्म बनी, जिसमें अनिल कपूर और श्रीदेवी ने मुख्य भूमिका अदा की। पंजाबी भाषा में भी इसी नाम से कई फिल्में बनी। इन्हें दर्शकों ने खूब सराहा।
सोहनी ने चेनाब किनारे पुकारा महिवाल का नाम
18वीं सदी में पंजाब में ही फली-फूली थी सोहनी और महिवाल की प्रेम कहानी। कुम्हार की बेटी सोहनी के प्यार में व्यापारी का बेटा महिवाल चरवाहा बन गया। दोनों को बेइंतहा मोहब्बत हुई लेकिन समाज को, परिवार को इनका प्यार बर्दाश्त नहीं हुआ। सोहनी ने महिवाल को पाने की खातिर चेनाब नदी को पार करने की हिमाकत की लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। सोहनी डूब गईं, महिवाल भी नदी में कूद पड़ा। इस प्रेम का कहानी का अंत भी दर्दनाक हुआ। इस प्यार, दर्द को बॉलीवुड ने बड़े शिद्दत से बड़े पर्दे पर उतारा। ‘सोहनी महिवाल’ नाम से कई बालीवुड फिल्में बनीं।
साल 1933 और 1946 में दो हिंदी फिल्में बनीं लेकिन साल 1958 में रिलीज हुई ‘सोहनी महिवाल’ सबसे चर्चित रही। इसमें भारत भूषण और निम्मी ने मुख्य भूमिका कीं। वहीं साल 1984 में सनी देओल और पूनम ढिल्लों अभिनीत फिल्म ‘सोहनी महिवाल’ को भी खूब प्यार मिला। सनी देओल स्टारर फिल्म के कई गानों में सोहनी और महिवाल के रूहानी इश्क की दांस्तां को बयां किया गया। फिल्म का एक गाना ‘लोगों ने सर पे लगाए हैं हजारों इल्जाम आजा, सोहनी चेनाब दे किनारे से पुकारे तेरा नाम आजा…।’ यह गाना साेहनी और महिवाल की मजबूरी और इश्क में कुछ भी कर गुजरने की चाहत को बखूबी जता देता है।
मजनू की मोहब्बत में सजा पाने को हाजिर हुआ लैला का इश्क
‘हुस्न हाजिर है मोहब्बत में सजा पाने को’ जब यह गाना ऋषि कपूर और रंजीता कौर अभिनीत फिल्म ‘लैला मजनू(1976)’ में सुनाई देता है, तब इस गाने को सुनकर दर्शकों के जेहन में 11वीं सदी की अरब देश की अधूरी प्रेम कहानी की यादें ताजा हो जाती हैं। इसी नाम से साल 1953 में नूतन और शम्मी कपूर ने भी एक फिल्म की। वहीं साल 2018 में इम्तियाज अली की लिखी कहानी पर बनी ‘लैला मजनू’ भी एक कल्ट मूवी बन चुकी है। इन सभी फिल्मों में लैला से मिलने की चाहत लिए भटकता मजनू आखिरी में मौत के आगोश में सो जाता है।
साहिबान की मोहब्बत में टूटा मिर्जा का दिल
हीर और रांझा, सोनी महिवाल की तरह ही साहिबान और मिर्जा की कहानी भी पंजाब में 16वी शताब्दी में पनपी थी। साहिबान को मिर्जा से बेइंतहा मोहब्बत थी वह कभी उससे बेवफाई नहीं कर सकती थी लेकिन वक्त आने पर वफा भी नहीं कर पाई। उसने मिर्जा के तीर तोड़ दिए, जिससे वह उसके भाइयों को ना मारे। लेकिन साहिबान के भाइयों ने मिर्जा को मौत के घाट उतार दिया। यह देखकर साहिबान ने भी मौत को चुन लिया और अपने मिर्जा के साथ ही दुनिया से रूखसत हो गई। इसी कहानी को साल 2016 में फिल्म ‘मिर्जियां’ में नए जमाने के हिसाब से दिखाया गया, फिल्म को ओमप्रकाश मेहरा ने निर्देशित किया था। इसी तरह एक पंजाबी फिल्म 2012 में भी इसी प्रेम कहानी पर बनी, जिसमें ग्रिप्पी ग्रेवाल मिर्जा के रोल में दिखे।