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C Ramchandra: इस संगीतकार का गीत 69 साल बाद भी हुआ हिट, जब धुनों को सुनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू भी रो पड़े
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: सुवेश शुक्ला
Updated Sun, 05 Jan 2025 10:19 AM IST
सार
C Ramchandra Death Anniversary: आज ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’, ‘भोली सूरत दिल के खोटे', 'शोला जो भड़के', 'किस्मत की हवा कभी नरम-कभी गरम', 'आना मेरी जान संडे के संडे', 'कदम कदम बढ़ाये जा', 'दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम' जैसे गीतों को धुन देने वाले संगीतकार की पुण्यतिथि है। आइए उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं।
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धुनों के जादूगर सी रामचंद्र
- फोटो : अमर उजाला
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‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ वह गीत है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब लता मंगेशकर की आवाज में सुना तो उनके आंसू छलक पड़े। आज भी इस गीत का जादू ऐसा है कि जब इसे कोई सुनता है, तो देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत होकर उसकी आंखें नम हो जाती हैं। यह सबको मालूम है कि इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया है, लेकिन शायद ही बहुत कम लोगों को मालूम हो कि इस गीत को कंपोज किया है सी रामचंद्र ने। संगीतकार सी रामचंद्र ने ‘भोली सूरत दिल के खोटे', 'शोला जो भड़के', 'किस्मत की हवा कभी नरम-कभी गरम', 'आना मेरी जान संडे के संडे', 'कदम कदम बढ़ाये जा', 'दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम' जैसे सुपरहिट गानों को कंपोज किया है। यह गीत आज भी लोगों को सुकून पहुंचाते हैं। आज लगभग 50 वर्षों बाद भी इन गीतों का कोई विकल्प नहीं है। इन कालजयी गीतों की धुन सी रामचंद्र की पोटली से ही हुआ है। आइए आज उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन से जुड़ी कुछ बातों को जानते हैं।
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सी रामचंद्र
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
संगीत से पहले अभिनय में आजमाई किस्मत
सी रामचंद्र का जन्म 12 जनवरी 1918 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक छोटे से कस्बे पुणतांबा में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम रामचंद्र नरहर चितलकर था। संगीतकार ने ‘गंधर्व महाविद्यालय’ में विनायकबुआ पटवर्धन और नागपुर के शंकर राव सप्रे से संगीत के गुर सीखे। संगीत का जादू बिखेरने से पहले उन्होंने फिल्मों में भी किस्मत आजमाई। वह वाईवी राव की फिल्म ‘नागानंद’ में मुख्य भूमिका निभाकर फिल्म उद्योग में शामिल हुए। उन्होंने ‘सैद-ए-हवस’ (1936) और ‘आत्मा तरंग’ (1937) में कुछ छोटी भूमिकाएं भी निभाईं। हालांकि, उनकी सभी फिल्में फ्लॉप रही, जिसके बाद उनका अभिनेता बनने का सपना टूट गया और उन्होंने संगीत का दामन पकड़ लिया।
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सी रामचंद्र
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
कंपोजिशन में किए नए-नए प्रयोग
फिल्मों से निराशा हाथ लगने के बाद संगीतकार ने जयाकोड़ी और वन मोहिनी के साथ तमिल फिल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में शुरुआत की। सी रामचंद्र को भगवान दादा की फिल्म ‘सुखी जीवन’ (1942) से काफी पहचान मिली। एक अच्छे संगीतकार की उनकी छवि बन गई। भगवान दादा के साथ उन्होंने लंबे समय तक काम किया, जो संगीतमय बॉक्स ऑफिस हिट अलबेला (1951) के साथ खत्म हुआ।
सी रामचंद्रन को वेस्टर्न धुनों में महारत हासिल थी। वह अपने कंपोजिशन में नए-नए प्रयोग भी किया करते थे, जो उनकी धुनों को सबसे अलग बनाता था और लोगों को पसंद भी आता था। बेनी गुडमैन से प्रभावित होकर , रामचंद्र ने अपनी रचनाओं में गिटार और हारमोनिका के कंपोजिशन में ऑल्टो सैक्स का इस्तेमाल किया। उन्होंने शहनाई (1947) के मशहूर गाने ‘आना मेरी जान संडे के संडे’ में ‘सीटी’ भी शामिल की। फिल्म ‘अलबेला’ में ‘शोला जो भड़के’ गाने के लिए बोंगो, ओबो, ट्रम्पेट, शहनाई और सैक्स कंपोजिशन बनाया।
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सी रामचंद्र
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
इस फिल्म ने दिलाई बड़ी सफलता
साल 1953 में आई फिल्म ‘अनारकली’ ने उन्हें बड़ी सफलता दिलाई। इस फिल्म में बीना रॉय और प्रदीप कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। इस फिल्म के गाने आज भी मशहूर है। ‘ये जिंदगी उसकी है’, ‘मुझसे मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है’, ‘मोहब्बत ऐसी धड़कन है’, ‘जाग दर्द-ए-इश्क जाग, गीत हिट के साथ बहुत मशहूर हुए और सराहे गए।
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सी रामचंद्र
- फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
69 साल बाद जब गाने का रीमेक भी रहा हिट
सी रामचंद्र एक कालजयी संगीतकार हैं, इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि उनकी फिल्म ‘अलबेला’ के गीत “ओ बेटा जी, ओ बाबू जी, किस्मत की हवा” का रीमेक भी सुपरहिट रहा। उनका यह गीत अनुराग बसु की फिल्म ‘लूडो’ (2020) में दोबारा से रीमेक किया गया, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया।
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