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Nadira Babbar Interview: फिल्मों में काम करने को लेकर कभी गंभीर नहीं रही, हां, इन दिनों ओटीटी के प्रस्ताव...
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Published by: आकांक्षा गुप्ता
Updated Tue, 23 Jan 2024 12:02 PM IST
सार
मैं तो बहुत संतुष्ट हूं। मैं समझती हूं कि मुझे ऐसा लगता है कि सभी लोग मेरे साथ जो काम करते हैं वह खुश हैं। मैं भी बहुत खुश हूं, रंगमंच मुझे अपनी जान से भी बहुत ज्यादा प्यारा है।
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नादिरा बब्बर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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मशहूर रंगकर्मी नादिरा बब्बर ने अपना पूरा जीवन रंगमंच को समर्पित कर दिया। नादिरा बब्बर का मानना है कि रंगमंच उनका पहला प्यार है और यह अनवरत जारी रहेगा। नादिरा बब्बर ने फिल्मों में कभी भी अपना करियर बनाने के बारे में नहीं सोचा। वह हैरानी जताती हैं कि ओटीटी के इस दौर में इस प्लेटफॉर्म पर काम करने के प्रस्ताव उनके पास नहीं आ रहे हैं। नादिरा बब्बर से अमर उजाला की खास बातचीत।
दूर दराज के शहरों, कस्बों, गांवों से लोग जब मुंबई अभिनय करने आते हैं और रंगमंच की तरफ आकर्षित होते हैं, तो आपका नाम उनके जेहन में सबसे पहले आने वाले नामों में होता है? अब तक की अभिनय यात्रा से कितनी संतुष्ट हैं आप?
मैं तो बहुत संतुष्ट हूं। मैं समझती हूं कि मुझे ऐसा लगता है कि सभी लोग मेरे साथ जो काम करते हैं वह खुश हैं। मैं भी बहुत खुश हूं, रंगमंच मुझे अपनी जान से भी बहुत ज्यादा प्यारा है। जितनी खुशी मुझे रंगमंच पर मिलती है, इतनी खुशी मुझे किसी और काम में नहीं होती है। रंगमंच ही मेरा पहला प्यार है और यह अनवरत जारी रहेगा।
वैसे तो पूरा जीवन ही रंगमंच है और आपने भी जीवन में कई बार अभिनय किया ही होगा, दूसरों के सुख के लिए, अपने सुख के लिए रंगमंच में आपको किसी बात की तलाश रहती है?
तलाशना शब्द मुझे बहुत गलत लगता है। मैं कुछ न कुछ नई चीज ढूंढती रहती हूं, यह मुझे बहुत अच्छा लगता है। 19 वर्ष की उम्र से ही रंगमंच पर काम कर रही हूं। रंगमंच करते -करते कब इतना इतना लंबा समय बीत गया पता ही नहीं चला। रंगमंच पर जो सुकून मिलता है, वह किसी काम में नहीं मिलता है।
आमतौर पर रंगमंच की उतनी बात मीडिया में होती नहीं है जितना रंगमंच देश की अलग अलग भाषाओं में इन दिनों हो रहा है। थियेटर और दर्शकों के बीच का पुल कहां मिसिंग है?
ऐसी बात नहीं है। थियेटर और दर्शकों के बीच कहीं कुछ भी मिसिंग नहीं है। आज भी थियेटर बहुत हो रहा है। और, थियेटर को देखने वाले दर्शक भी बहुत हैं। बल्कि पहले की अपेक्षा दर्शकों का रुझान रंगमंच की तरफ ज्यादा हुआ है। पहले की अपेक्षा रंगमंच पर काम करने वाले कलाकारों को पैसे भी अच्छे मिल रहे हैं।
'यहूदी की लड़की' से आपने पारसी थियेटर को पुनर्जीवित किया, अब तक भी इसके बहुत सारे शोज होते रहते है। पहली बार जब आपने इस नाटक का मंचन किया, कैसे अनुभव रहे?
इससे पहले मैंने 'इकबाल की शायरी' से रंगमंच की शुरुआत की। वह नाटक बहुत ही ज्यादा कामयाब था। जब मैंने पहली बार 'यहूदी की लड़की' का मंचन किया तो उसके बहुत ही अच्छे अनुभव रहे हैं। मेरे लिए वह नया नाटक था, पहली बार किया जा रहा था। हमारे जमाने में उस नाटक को कोई नहीं करता था। वह नाटक भी बहुत कामयाब हुआ। पारसी थियेटर के बारे में ज्यादा माहिर नहीं थी। उस पर मैंने शोध किया, फिर उस नाटक को पारसी थियेटर स्टाइल में किया।
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