महाकुंभ में अमृत स्नान करके अभिनेत्री शहाना गोस्वामी घर लौट आई हैं। अपनी अगली फिल्म ‘महाकुंभ’ की शूटिंग करने प्रयागराज गईं शहाना की इससे पहले खूब चर्चा हुई ऑस्कर की प्राथमिक सूची तक पहुंची फिल्म ‘संतोष’ के चलते। शहाना गोस्वानी से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने की ये खास बातचीत।
Shahana Goswami Exclusive: बेटियों को उनके हिसाब से जीने देना ही असली सशक्तिकरण, शहाना गोस्वामी की खरी खरी
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जब भी आपको किसी फिल्म का केंद्रीय किरदार मिलता है, तो आपकी सोच उसे लेकर क्या रहती है?
मेरे लिए किसी भी फिल्म की पटकथा बहुत जरूरी होती है। किसी पटकथा को पढ़ना शुरू करें और उसे पढ़ते ही जाएं, तो समझ आ जाता है कि फिल्म कितनी अच्छी बनने वाली है। इससे फिल्म को लेकर कलाकार का एक नजरिया अपने भीतर भी बनता है। फिर सोच ये शुरू होती है कि कैसे मुझे इस फिल्म की रीढ़ की हड्डी बनना है। फिल्म का प्रस्ताव आने से लेकर फिल्म के परदे पर दिखने तक हर कलाकार एक सपना जी रहा होता है। ये सपना आंख खुलने पर वैसा ही दिखता रहे तो एक फिल्म सफल फिल्म बनती है।
आपकी पिछली फिल्म ‘संतोष’ को ऑस्कर नामांकन मिला, ये कितना गर्व का पल रहा होगा आपके लिए?
मैं इन चीजों के बारे में इतना नहीं सोचती। मेरे लिए ये वैसे ही होता है जैसे कि एक बच्चे को बस खेल खेलने में दिलचस्पी होती है। मेरा खेल फिल्मों में उस प्रक्रिया से है, जिसमें हम साथ मिलकर टीम के तौर पर खेलते हैं और एक फिल्म बनाते हैं। किसी ने मेहनत से एक कहानी लिखी है, निर्देशक उस पर उतनी ही मेहनत से एक संसार रच रहा है। मुझे उन दोनों की सोच के किरदार में ढल जाना है। ये मेरे लिए खेल की तरह है और इसमें मुझे मजा आता है। परिणाम की तरफ इस दौरान ध्यान कम ही जाता है।
महिला सशक्तिकरण को लेकर बनने वाली फिल्मों में महिलाओं को आत्मनिर्भर महिलाओं की तरह दिखाना एक बड़ा बदलाव नये दौर का है, आप इन किरदारों को कैसे देखती हैं?
बिल्कुल ठीक कहा आपने। महिला सशक्तिकरण वही है जिसमें महिला आर्थिक रूप से सशक्त हो रही है। अपने निर्णय खुद ले पा रही है। अपने बूते जी पाने की हिम्मत जुटा पा रही है, लेकिन अपने खर्चे पर। ऐसे किरदार बहुत कम नायिकाओं को मिलते हैं। ‘संतोष’ का मेरा किरदार ऐसा ही था। ‘महासंगम’ में महिला सशक्तीकरण का एक अलग रूप देखने को मिलेगा। महिला सशक्तिकरण मेरे अनुसार सिर्फ कहने की नहीं बल्कि करके दिखाने की बात है। बेटियों को शिक्षित करना और उन्हें अपने हिसाब से जिंदगी जीने देना ही उनका असली सशक्तिकरण है।
किसी किरदार को निभाने के लिए आप किसी खास अभिनय प्रक्रिया का पालन करती हैं, या किरदार को हिस्सों में विभाजित (ब्रेक डाउन) करके उसकी तैयारी करती हैं?
मैं अपने निर्देशक का अनुसरण करने वाली अभिनेत्री हूं। पटकथा को मैं बहुत गंभीरता से पढ़ती हूं और कई-कई बार पढ़ती हूं। इतना पढ़ती हूं कि किरदार खुद मेरे सामने दिखने लगता है। फिर बाकी अभिनय साथी कलाकारों के अभिनय की प्रतिक्रिया के रूप में भी शूटिंग के दौरान जाग्रत होता रहता है। हर किरदार की एक विशिष्ट देह भाषा होती है, मेरे हिसाब से अगर कलाकार ने उसे समझ लिया तो बाकी आगे का काम आसान होता जाता है। इससे किरदार हकीकत के करीब भी दिखने लगता है।