कैमरे के सामने आने का मौका भर मिल पाना मुंबई आने वाले संघर्षशील कलाकारों के लिए एक बड़ी उपलब्धि रहती है। हर साल देश दुनिया के तमाम स्कूलों, विद्यालयों और महंगे इंस्टीट्यूशनों से एक्टिंग सीखकर हजारों युवा हिंदी सिनेमा में किस्मत आजमाने मुंबई आते हैं। कंपटीशन आईआईटी और सीपीएमटी से भी तगड़ा होता है लेकिन सपनों की दुनिया ऐसी ही है कि एक बार जो यहां आ गया तो जल्दी जल्दी घर लौटता नहीं है। और, जब जिद ऐसी हो तो फिर सफलता भी झक मारकर पास आती ही है। ऐसी ही कहानी है पीलीभीत से निकले रंगमंच के बेहतरीन कलाकार नलनीश नील की। मुंबई में अपनी पहचान बना रहे नए कलाकारों की सफलता की कहानियां उनके गांव, गली, चौबारे तक पहुंचाने की बैठकी ‘अपना अड्डा’ में आए नलनीश नील के पास किस्से बहुत हैं, ‘अमर उजाला’ के पाठकों के लिए उन्हीं में से चंद यहां पेश हैं..
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सत्यजीत रे आइकन अवार्ड 2024 की आपको बहुत बधाई, नलनीश! ये बताएं कि अभिनय की तरफ झुकाव कब और कैसे हुआ?
शायद टेलीविजन ने ये शौक मेरे भीतर डाला। दूसरों के घरों पर जाकर टीवी पर आने वाली फिल्में देखते थे और कई बार वहां से भी भगा दिए जाते थे। पिताजी रीतराम बीसलपुर (पीलीभीत) की एक फैक्ट्री में चौकीदार थे, लेकिन मुझे रोते देखा तो एक दिन टेलीविजन खरीदकर ले आए। घर पर टीवी आया तो फिल्में देखने का शौक भी बढ़ा। ननिहाल जाने पर वीसीआर पर फिल्में देखने का मौका मिलता और शायद इसी सब के बीच लगा कि एक्टर बन जाना चाहिए।
फिर..?
छोटे शहरों और कस्बों के बच्चों को कोई ये बताने वाला नहीं होता कि जो सपना देखा है, उसे पूरा करने का सही रास्ता क्या है। 18-19 साल का था और उन दिनों अखबारों में फिल्मों और सीरियल में काम करने के लिए इच्छुक लोगों के लिए विज्ञापन निकला करते थे। ऐसे ही एक विज्ञापन में मेरा भी सेलेक्शन हुआ तो मैं बहुत खुश हुआ। तब दिल्ली में रहने वाले चाचा जी ने समझाया कि ये सब फ्रॉड लोग होते हैं, मेरा तो दिल ही टूट गया था।
लेकिन, आपने अभिनय की जिद नहीं छोड़ी...?
हां, मेरा मानना है कि जिद करने से वाकई आपकी दुनिया बदल सकती है। हमारे गांव उगनपुर मरोरी से पीलीभीत नजदीक है लेकिन वहां रंगमंच के नाम पर कुछ होता नहीं है। शाहजहांपुर वहां से 50 किलोमीटर दूर है, पर वहां थियेटर होता है। राजपाल यादव का वहां रुतबा रहा है। बीसलपुर से स्नातक होने के बाद मैं शाहजहांपुर आया तो लोग तंज कसने लगे कि हर कोई राजपाल यादव नहीं बन सकता। दिलीप आनंद से वहीं मुलाकात हुई। राजपाल यादव ने भी उनके साथ काफी वक्त गुजारा है। दिलीप के साथ ही पहला नाटक 'झलक दिखला जा' किया, फिर नुक्कड़ नाटकों का सिलसिला चल निकला। शादियों में वीडियोग्राफी भी करता था। साथ ही नाचना और मारधाड़ करना भी सीखता रहा।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चयन के लिए जो शर्तें हैं, उसका अनुभव कैसा रहा?
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में चयन की पहली शर्त है, 10- 12 नाटकों में काम करने का अनुभव। मैंने नाटक तमाम कर लिए थे, लेकिन प्रमाण पत्र कोई देता नहीं था। थियेटर में भी राजनीति चलती रहती है। फिर मेरा चयन लखनऊ की भारतेंदु नाट्य अकादमी में हो गया। इसके लिए जिस दिन मेरा इंटरव्यू होना था, मुझे याद है मैं वहां अकादमी के पास गणेशजी की एक प्रतिमा के पास खड़े होकर रो रहा था। गणेशजी की कृपा से ही मेरा वहां एडमीशन हुआ और वहां से निकलकर 2010 में मुंबई आने से लेकर अब तक उनकी कृपा बहुत रही है। आगे भी वह जिधर ले जाएंगे, सही रास्ता ही होगा।