साल 1958 में फिल्म ‘सोने की चिड़िया’ में बाल कलाकार के तौर पर काम शुरू करने वाली मुमताज ने मशहूर पहलवान दारा सिंह के साथ बड़े परदे पर बड़े कारनामे किए हैं। राजेश खन्ना के साथ उनकी आठ हिट फिल्मों का जिक्र तो खूब होता है लेकिन दारा सिंह के साथ बनी उनकी 16 चर्चित एक्शन फिल्मों की चर्चा कम ही होती है। और, वह भी तब जब वह अपने जमाने में अमिताभ बच्चन वगैरह से कहीं ज्यादा फीस लिया करती थीं। इसके बावजूद शशि कपूर जैसे सितारे उनके साथ काम करने से इसलिए मना कर दिया करते थे कि ये तो स्टंट फिल्मों की हीरोइन है। राजेश खन्ना की फिल्म ‘दो रास्ते’ से उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली कतार में जगह मिलनी शुरू हुई और देव आनंद के साथ फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ उनकी शोहरत का सबसे ऊंचा मुकाम मानी गई। इससे पहले मुमताज दिलीप कुमार की फिल्म ‘राम और श्याम’ में भी काम कर चुकी थीं, लेकिन ‘तेरे मेरे सपने’ और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ को मुमताज भी अपने करियर का टर्निंग प्वाइंट मानती हैं। इन दोनों फिल्मों में मुमताज थीं तो मेन लीड हीरोइन लेकिन उनसे ज्यादा शोहरत इन फिल्मों में बटोर ले गईं हेमा मालिनी और जीनत अमान। ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की बात तो किसी और दिन करेंगे, आज बात करते हैं फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ की जिसकी रिलीज को 50 साल पूरे हो रहे हैं।
Bioscope S2: देव आनंद और मुमताज की पहली फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ के 50 साल पूरे, नीरज ने लिखे कालजयी गीत
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देव आनंद की बेहतरीन फिल्मों में गिनती
देव आनंद की 10 बेहतरीन फिल्मों में शुमार फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ में हेमा मालिनी मेहमान कलाकार के तौर पर हैं लेकिन उनकी इस खास भूमिका ने फिल्म को एक अलग ही लुक दे दिया। फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ गांवों में मौजूद स्वास्थ्य सेवाओं की हालत पर करारा प्रहार करती है। निर्देशक विजय आनंद की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ शुरू होती है मेडिसिन की दुनिया का सबसे उत्तम पेशा बताकर उसको ये फिल्म समर्पित करने से। विजय आनंद ने इस फिल्म के साल भर पहले ही टिपिकल मसाला फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’ बनाई थी। और, 13 मई 1971 को रिलीज हुई उनकी ये बेहतरीन फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’। फिल्म ग्रामीण भारत में चिकित्सकों की हालत और उनको लेकर बनी धारणाओं पर करारी चोट करती है। और, ये हालात 50 साल बाद भी देश में ज्यादा बदले नहीं हैं।
विजय आनंद का पहला लिटमस टेस्ट
चेतन आनंद, देव आनंद और विजय आनंद के बारे में दुनिया जानती है। चेतन से आठ साल छोटे थे देव आनंद और देव आनंद से 11 साल छोटे थे विजय आनंद उर्फ गोल्डी। मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज में पढ़ाई के दिनों से ही विजय आनंद को थिएटर में मजा आने लगा था। लिखते वह कमाल का थे। कॉलेज से निकलते ही चेतन आनंद की पत्नी उमा ने उनको फिल्में लिखने के लिए खूब प्रेरित किया। अपनी उमा भाभी के साथ मिलकर ही विजय आनंद ने लिखी पहली फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’। फिल्म हिट रही। उमा भाभी को भी अपने देवर जिसे प्यार से सब लोग गोल्डी बुलाते थे, पर नाज हुआ। लेकिन गोल्डी बहुत शर्मीले किस्म के इंसान थे। उन्होंने अगली कहानी लिखी, ‘नौ दो ग्यारह’। वह इसे निर्देशित भी करना चाहते थे, पर चेतन से तो खैर वह नजर ही नहीं मिला पाते थे, देव आनंद से भी कहने में उनकी जान निकलती थी। एक दिन देव आनंद कुछ दिनों की छुट्टियों के लिए महाबलेश्वर वाले अपने बंगले पर जा रहे थे। उन्होंने गोल्डी से फिल्म की स्क्रिप्ट मांगी कि रास्ते में पढ़ते चले जाएंगे। पता नहीं उस दिन छोटे भाई को क्या सूझा कि वह बोल बैठा, “भैया, मैं चलूं साथ में। रास्ते में स्टोरी मैं खुद सुनाता हूं ना आपको।”
एमपी के गाडरवारा में फिल्माई गई फिल्म
देव आनंद वैसे ही अपने इस छोटे भाई से बहुत प्यार करते थे। दोनों भाई साथ चल पड़े मुंबई से महाबलेश्वर। कोई पांच घंटे के रास्ते में विजय आनंद ने जिस तरह से फिल्म की कहानी देव आनंद को सुनाई, उनको यकीन ही नहीं हुआ कि उनका छोटा भाई इतना सब कुछ जानता है फिल्ममेकिंग के बारे में। विजय ने न सिर्फ फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई बल्कि यहां तक बता दिया कि किस सीन की ओपनिंग क्या होगी, क्लोजिंग क्या होगी, शॉट डिवीजन क्या होगा और कैमरा कहां से कहां तक घूमेगा। कैमरे के एंगल और उसके मूवमेंट पर विजय आनंद की कमाल की पकड़ रही है। अगर आपने फिल्म ‘ज्वैल थीफ’ का गाना ‘होठों में ऐसी बात में दबाके चली आई’ या फिर गाइड का गाना ‘कांटो से खींच के ये आंचल’ देखा होगा, तो आपको अंदाजा होगा कि गाने को परदे पर जीवंत कर देने का कैसा खास कौशल था विजय आनंद की शॉट टेकिंग में। ये कौशल मध्य प्रदेश के गाडरवारा में फिल्माई गई फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ में भी आपको खूब दिखेगा।
भाइयों के बीच भरोसे की डोरी
खैर, देव आनंद महाबलेश्वर पहुंचे। रास्ते में विजय आनंद से उन्होंने कुछ कहा नहीं। गोल्डी परेशान कि पता नहीं भैया को स्क्रिप्ट पसंद आई कि नहीं। कहीं बड़े भैया से क्लास न लगवा दें। हाथ मुंह धोकर फारिग होने के बाद देव आनंद ने छोटे भाई से कहा कि नवकेतन फिल्म्स को फोन लगाओ। नवकेतन की स्थापना देव आनंद और बड़े भाई चेतन आनंद ने मिलकर की थी और फैसले तब सबकी सहमति से ही होते थे। गोल्डी परेशान थे कि पता नहीं क्या होगा। फोन मिला। उधर घंटी बजी। नवकेतन के प्रचारक अमरजीत ने फोन उठाया। अमरजीत और गोल्डी तब साथ रहा करते थे। देव आनंद ने फोन पर कहा, अमरजीत, प्रेस में एनाउंस कर दो। नवकेतन की अगली फिल्म गोल्डी डायरेक्ट करेगा। नवकेतन फिल्म्स प्रेजेंट्स फिल्म नौ दो ग्यारह डायरेक्टेड बाई विजय आनंद’। उस रात विजय आनंद को नींद नहीं आई। लौट के विजय आनंद बंबई आए तो अमरजीत के साथ जश्न मनाया।