Movie Review: चमन बहार
द शो मस्ट गो ऑन, ये बात अक्सर कही और सुनी जाती है। लेकिन, जितनी बार ये मनोरंजन की दुनिया में कही और सुनी गई, शायद और किसी धंधे में नहीं। पिछले इतवार की दोपहर ही सुशांत सिंह राजपूत के अपने घर में पंखे से लटक जाने की खबर आई। जैसा रुदन और शोक ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया पर अगले तीन चार दिन दिखा, यूं लगा कि अब शायद हफ्ते 10 दिन कोई काम ही न हो मनोरंजन जगत में। लेकिन, सितारे अपने अपने घर बैठे अपनी अगली सीरीज या फिल्म के लिए धड़ाधड़ इंटरव्यू देते रहे, एक के बाद एक अपनी कहानियों ओटीटी पर रिलीज करते रहे। इतना कंटेंट ओटीटी पर तो सामान्य दिनों में भी नहीं परोसा गया। अकेले बीते शुक्रवार को भारत में अलग अलग भाषाओं की 24 वेबसीरीज/फिल्में ओटीटी पर रिलीज हुईं।
Chaman Bahar Review: जितेंद्र कुमार के अमोल पालेकर बनने के सपनों के बीच आई फिल्म चमन बहार
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जी हां, दो दर्जन वेब सीरीज और फिल्में। दर्शक तो क्या समीक्षक भी चाहे तो सब देख न पाए। ऐसी भीड़ और कौतुहल भरे माहौल में रिलीज हुई डिजिटल के हीरो नंबर वन जितेंद्र कुमार उर्फ जीतू की फिल्म चमन बहार। 19 जून की रात 12 बजे फिल्म नेटफ्लिक्स पर आई। और, 12 घंटे के भीतर इसके हीरो ने ये मान लिया कि फिल्म को सारे हिंदुस्तानियों ने पास कर दिया है। तमाम समीक्षकों के कोट्स के साथ प्रेस रिलीज भी जारी हो गई। किसी हिंदी फिल्म समीक्षक का नाम तो इसमें नहीं दिखा। हां, एक अंग्रेजी समीक्षक का नाम बताकर उनके हवाले से ये जरूर जताने की कोशिश की गई कि जितेंद्र कुमार अब अमोल पालेकर का थोड़ा नमक मिर्च लगा संस्करण हो गए हैं।
तो पहले जितेंद्र कुमार के इस किरदार बिल्लू को ही समझ लेते हैं। जंगल की पुश्तैनी चौकीदारी करने वाले परिवार का इकलौता वारिस बिल्लू लाल रंग की चे ग्वेरा की फोटो वाली टी शर्ट पहनता है। और, उनकी सबसे बड़ी क्रांति ये है कि उन्होंने चौकीदारी का पुश्तैनी पेशा छोड़ा आत्मनिर्भर होने की ठानी है। कहानी वह अपने पिता को ये सुनाता है कि जंगल में उस भालू से उसे डर लगता है जो लेडीज लोग का शीलभंग कर देता है। तो चौखाने वाली लुंगी छोड़ वह पैंट पहनता है और खोल लेता है एक पान की दुकान जिसका नाम है चमन बहार। ये जो दोनों पेशे बिल्लू अपनाता है वही उसे अमोल पालेकर के आभामंडल से दूर कर देते हैं क्योंकि इसमें से कोई भी आज के मिडिल क्लास की पसंद का पेशा तो नहीं है, हां मजबूरी का हो तो अलग बात है। जिनको बिल्लू का ये किरदार रजनीगंधा, छोटी सी बात और चितचोर के संजय, अरुण और विनोद का साल्टी और प्रिकली वर्जन लगा हो, उन्हें ये फिल्में फिर से देखनी चाहिए।
बेरोजगार बिल्लू अपने पिता की इज्जत नहीं करता। वह उनसे बात बात में भिड़ता है। लेकिन, जब कमाने लगता है तो उसे पिता पर प्यार आता है। वह उनके लिए गोश्त और अंग्रेजी शराब भी लाता है। उनके कहने पर रिश्ते की बातचीत पर भी चला जाता है। लेकिन, उसका सबसे प्रिय शगल है, लड़की ताड़ना। छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के दुकानदारों पर ये तंज भी है और उनका अपमान भी। और, यही नहीं लड़की ताड़ते ताड़ते बिल्लू उस पर अपना अधिकार भी समझने लगता है। डीएफओ के लड़के को लाइन से हटाने के लिए वह दुकान बंद रखता है। लफंडरों के झुंड की नजरों से दूर रखने के लिए वह कैरम में उनको बिजी करता है। स्कूल का मास्टर भी इस लड़की पर फिदा दिखाया गया है तो वह उसको भी लानत भेजता है। कुल मिलाकर चमन बहार का गिल्लू बड़े बजट की फिल्म कबीर सिंह का छत्तीसगढ़ी संस्करण निकलता है।
सड़क के इस पार बिल्लू पनवाड़ी है। उसके जानने वाले हैं जो एक दूसरे को डैडी डैडी कहकर बातें करते हैं। पैदा होते ही जवान हो गए कुछ लुच्चे टाइप के दबंग हैं। इनमें से एक की स्पोर्ट्स की दुकान है, दूसरा नेतागिरी में अपना करियर तय कर चुका है। और, इन सबके बीच एक दरोगा भी है जो लड़की के पिता की शिकायत पर एक दिन आकर सबकी ठुकाई कर देता है। बिल्लू पनवाड़ी समेत। बिल्लू के चेहरे से लेकर पिछवाड़े तक की जमकर सुताई होती है और बस एक इसी सीन से पूरी फिल्म में बना बिल्लू का आभामंडल तार तार हो जाता है। बिल्कुल, गुरुजी की गोद में जा बैठे गायतोंडे की तरह।
फिल्म चमन बहार एक पान वाले की प्रेम कहानी है जिसमें प्रेमिका नाम का कोई किरदार तो नहीं है, हां इकतरफा प्रेमी के आकर्षण की वस्तु जरूर है। पहली बार फिल्म बना रहे अपूर्व धर बड़गैंया ने एक किशोरी को वस्तु ही बनाकर पेश किया है फिल्म में, जिसे देखने शहर भर के लफंगे जुटते रहते हैं। और, वह शाम को एक तय समय पर अपने डॉगी को घुमाने निकल पड़ती है। चमन बहार जैसी फिल्मों का रिव्यू लिखा जाए या न लिखा जाए, पहला सवाल तो किसी समीक्षक के लिए ये भी होता है। लेकिन, फिर ये भी होता है कि कुछ चुनिंदा फिल्म समीक्षकों को ही अपनी कलाकारी का पैमाना समझ लेने वाले फिल्मकारों का हश्र रामगोपाल वर्मा जैसा होता है।
फिल्म में कुछ चीजें अच्छी है। पहली तो इसके ओपनिंग क्रेडिट्स में की गई कलाकारी। दीवारों, संदूकों और टीन शेड्स पर लिखे कलाकारों और तकनीशियनों के नाम ही फिल्म के लिए उत्सुकता जगाते हैं। फिल्म में सोनू निगम की आवाज भी चलती रहती है, जो सुनने में तो अच्छी लगती है। मैपल लीव्स की जगह यूकेलिप्टस की पत्तियों के बीच से साइकिल पर निकलते हीरो हीरोइन वाला सीन भी अच्छा है। चापलूसी करके दिन गुजारने वाली धीरेंद्र और भुवन की जोड़ी बढ़िया। शिला के किरदार में आलम खान जमते हैं और आशु के किरादर में अश्वनी कुमार। सिनेमैटोग्राफी में अर्को देव मुखर्जी ने बढ़िया काम किया है। अगर आपके पास नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन पहले से ही है तो फिल्म देख डालने में बुराई नहीं है, बस इससे पंचायत जैसा मनोरंजन मिलने की उम्मीद मत रखिएगा।
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