Web Series Review: क्रैकडाउन
देश को बाहरी खतरों से बचाने के लिए काम करने वाली खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) के डिप्टी की जो छवि निर्देशक अपूर्व लखिया ने अपनी इस पहली वेब सीरीज ‘क्रैकडाउन’ में बनाई है, उसे देखने के बाद एक सर्कुलर इस एजेंसी की तरफ से भी जारी हो जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के काम में लगे लोग साधु नहीं होते इतना तक तो ठीक है, लेकिन इतने घटिया लोग भी वह नहीं ही होते हैं, नहीं तो फिर इनके सैन्य दलों और खुफिया एजेंसियों में होने का कोई नैतिक कारण नहीं दिखता। वूट सेलेक्ट पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘क्रैकडाउन’ की गालियां भी जबर्दस्ती की लगती हैं, शो तो खैर जबर्दस्ती का लगता ही है। आठ एपीसोड बैक टू बैक देखने के बाद पता ही नहीं चलता कि आखिर इसका हासिल क्या है?
Crackdown Review: आतंकवादियों पर निशाना साधने वाली सीरीज में अपूर्व ने रॉ पर ही लगा दिया दाग
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कहते हैं कि अपूर्व लखिया को अपने करियर का पहला काम फिल्म ‘लगान’ में इस वजह से मिला कि आमिर खान को कोई हॉलीवुड रिटर्न बंदा चाहिए था। अपूर्व ने आगे भी अपनी इसी छवि के हिसाब से काम पाया। लेकिन, अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन तक को निर्देशित कर चुके अपूर्व के निर्देशन में बीते 17 साल में कोई तरक्की होती नहीं दिखती। ड्रोन को एक एसयूवी से उड़ाकर दूसरी एसयूवी तक ले जाने में कोई खास क्रिएटिविटी निर्देशक की होती नहीं है। कहानी घिसी पिटी है, निर्देशन दोयम दर्जे का है और साकिब सलीम को और झेलने की अब हिम्मत दर्शकों में बची नहीं है।
वेब सीरीज ‘क्रैकडाउन’ की कहानी एक रॉ एजेंट की कहानी है। नाम रियाज पठान, दफ्तर में सब लोग उसे आरपी कहकर बुलाते हैं, क्यों? शायद नाम में ही सब कुछ रखा है। फैमिली मैन और स्पेशल ऑप्स जैसी सीरीज देख चुके दर्शकों को ये सीरीज अगर आखिर तक देखनी है, तो ऐसे तमाम सारे सवालों को इग्नोर करते रहना होगा क्योंकि ये सीरीज बनाते समय जो सवाल इसके मेकर्स ने खुद से नहीं किए, वे सब अब दर्शकों के सामने बेताल के सवालों की तरह कंधे पर आ बैठे हैं। जवाब उनको नहीं, दर्शकों को देना है, चुप रहे तो क्या होगा, ये बेताल सौ दफे पहले भी बता चुका है।
तो आरपी रॉ की एक ऐसी यूनिट में काम करता है जिसके वजूद का किसी को पता नहीं है। वह और उसकी टीम सीधे अपने चीफ अश्विनी को रिपोर्ट करती है जिसे अपने होने वाले दामाद का नाम महक होने से दिक्कत है। जवान बेटी है। साल भर बाद होने वाली शादी की अभी से फिक्र करने वाली बीवी है और है उसका अपना कम करने का तरीका। आठ एपीसोड तक चलने वाली कहानी में एक ट्रेक पाकिस्तानी आतंकवादी और आरपी का ऐसा भी है जहां वतन की खातिर दिल में बहने वाले जज्बे पर सवाल मंडराता दिख सकता था लेकिन रियाज को तो राइटर पहले ही आरपी बना चुके होते हैं। हां, रॉ के एजेंट कैसे आम लोगों में घुलमिलकर रहते हैं और सिक्स पैक एब्स तो वह किसी लड़की के सामने कतई नहीं दिखाते, ये बात राइटर्स को समझनी जरूरी थी।
वेब सीरीज ‘क्रैकडाउन’ की कास्टिंग इसकी सबसे कमजोर कड़ी है, न तो साकिब सलीम और न ही श्रिया पिलगांवकर अपने अपने किरदारों में सहज नजर आते हैं। इकबाल खान का किरदार कहानी में सिर्फ इसलिए ठूंसा लगता है कि कोई तो विलेन चाहिए यहां, नहीं तो कोई हीरो कैसे बनेगा। राजेश तेलंग जरूर जब भी स्क्रीन पर आते हैं, थोड़ा सुकून दे जाते हैं। लेकिन, दिक्कत यहां ये है कि पहला सीजन खत्म होने के बाद भी ये तय नहीं हो पाता कि डायरेक्टर आखिर कहना क्या चाहता है। एक ही बार में 10 एपीसोड की शूटिंग करके एडिट करते समय उनके 16 एपीसोड बनाकर आठ पहले सीजन के लिए और आठ दूसरे सीजन के लिए बचा लिए गए दिखते हैं। यही गलती इससे पहले नेटफ्लिक्स अपनी सीरीज ‘शी’ में दोहरा चुका है। मिड वीक की इस रिलीज को इग्नोर ही करें तो बेहतर नहीं तो बाकी का हफ्ता डिस्टर्ब हो सकता है।