Movie Review: दिल बेचारा (Dil Bechara)
प्रिय सुशांत,
जहां कहींं भी हो, सुखी रहो। तुम्हारी आखिरी फिल्म दिल बेचारा देखनी ही थी, सो देख ली। चेतन भगत ने धमकी दी है कि अगर फिल्म का रिव्यू किसी ने खराब लिखा तो देख लेना, ‘हम’ देख रहे हैं। ये ‘हम’ में कौन कौन शामिल हैं, मैंने पूछा भी पर उन्होंने बताया नहीं है। अनुपमा चोपड़ा समझदार निकलीं, अपनी मोहब्बत दिखाकर रिव्यू लिखने से छुट्टी ले ली। हम ऐसा नहीं कर सकते। हिंदी के पत्रकार हैं ना। इमोशनल ज्यादा होते हैं, दिखाते कम हैं। तो समझ नहीं आता कि शुरू कहां से करें और देखो ना, जब कुछ समझ ही नहीं आ रहा तो भी रिव्यू का पहला पैरा इतनी जल्दी लिख गया।
Dil Bechara Review: मिट गया रील और रियल का फर्क, मजबूत कलेजा करके देखिएगा सुशांत सिंह राजपूत की ये आखिरी फिल्म
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मैंने राजेश खन्ना को ‘आनंद’ में देखा है, शाहरुख खान को ‘कल हो ना हो’ में देखा है, ऋतिक रोशन को ‘गुजारिश’ में देखा है और अनुष्का शर्मा को ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में देखा है। हो सकता है तुमने भी देखा हो ये फिल्म ‘दिल बेचारा’ करने से पहले। तुम अभिनेता बहुत अच्छे हो। इंसान अच्छे नहीं निकले। ऐसे कोई जाता है भला कि पता ही नहीं चले कि फिल्म रिलीज होने से पहले तक जो हो रहा था, वह भी ‘दिल बेचारा’ का ही एक्सटेंडेड वर्जन ही था। तुमने ‘दिल बेचारा’ को इतना दिल से लगा लिया कि फिल्म और जिंदगी का फर्क ही मिट गया। लगता है कि तुम्हारी मौत भी जैसे इस फिल्म जैसी नकली है।
तुम्हारे असल जिंदगी में चले जाने का गम बहुतों को है। तुम्हारे दोस्त संदीप सिंह का स्टाफ गिनती कर बताता है कि अब तक तुम्हारे सात चाहने वाले भी ये सदमा बर्दाश्त न कर तुम्हारे पास पहुंच चुके हैं। ये फिल्म ‘दिल बेचारा’ इतनी अवसाद से भरी है कि तुम्हारे फैंस को तो अकेले में बिल्कुल ही नहीं देखनी चाहिए। मैं तो दुनिया भर के माता पिता से ये कहना चाहता हूं कि ‘दिल बेचारा’ अपने उस बच्चे को कतई न देखने दें, जो तुम्हारा रत्ती भर भी फैन रहा हो।
सारे मां बाप किजी के मां बाप की तरह हिम्मतवाले नहीं होते। मौत की दहलीज पर खड़ी अपनी बेटी की जिंदगी में वह इमैनुअल राजकुमार जूनियर को आने देते हैं। वह इमैनुअल जो अपने सामने अपने दोस्तों से अपनी ही यूलजी पढ़वाने का शौक रखता है। यूलजी का हिंदी में मतलब शब्दकोष प्रशस्ति गान बताता है, कोई मरने के बाद अपनी यूलजी क्यों सुनना चाहता है भला? और मरने से पहले खुद के मरने का तमाशा कर अपने सामने यूलजी पढ़वाना? खुद को चुटकी काटकर ये बताना पड़ा है जो परदे पर चल रहा है वह फिल्म है, जो 14 जून के बाद से होता रहा है वह हकीकत है।
अनुराग कश्यप कहते हैं कि मुकेश छाबड़ा के लाख समझाने पर भी तुमने उनकी फिल्में करने की बजाय आदित्य चोपड़ा और करण जौहर की फिल्में करके खुद पर बड़ा स्टार होने का बिल्ला चिपकाना चाहा। उन्हीं मुकेश छाबड़ा ने तुम्हारे साथ बतौर डायरेक्टर करियर की ऐसी फिल्म बनाई है जिसके फ्रेम फिल्म स्कूल में बरसों तक पढ़ाए जाएंगे। अनुराग कश्यप खुलेआम कहते हैं कि वह क्षेत्रवाद मानते हैं। देश की पहली सिने एंथॉलॉजी ‘शॉर्ट्स’ में वह दूसरे वाद भी दिखा चुके हैं, प्रतियोगिया से बनने वाली फिल्मों में नीरज घेवन और दूसरों के नाम बिना प्रतियोगिता में शामिल हुए शामिल करके। तुम क्यों उनसे छिटके, ये फिल्म ‘दिल बेचारा’ देखकर समझा जा सकता है।
खैर, ‘दिल बेचारा’ ओटीटी पर देखे जाने का रिकॉर्ड तुम्हारी वजह से ही तोड़ेगी। तुम भी ये फिल्म आज कहीं बैठकर देख रहे होते तो शायद ये रिकॉर्ड नहीं बनता। फिल्म कथ्य के तौर पर और मेकिंग के तौर पर भी औसत से कमतर फिल्म है। स्मार्ट टीवी पर देखते समय फिल्म की साउंड (प्रीतम दास) बहुत खराब सुनाई देती है। हां, फिल्म के लुक्स कमाल के हैं तो इसलिए कि फिल्म का हर फ्रेम सत्यजीत पांडे की सिनेमैटोग्राफी से कोना कोना रोशन है। ए आर रहमान ने ‘गुजारिश’ जैसा ही कुछ रचने की कोशिश तुम्हारी इस फिल्म में की है लेकिन गाना कोई भी उनका अरसे से हिट हो नहीं पा रहा है। वह जीनियस हैं और जीनियस लोगों के साथ इन दिनों मुंबई के लोग क्या रहे हैं, तुमसे अच्छा कौन जानता है?
खैर, फिल्म हमने देख ली है। शुक्र है डिजनी प्लस हॉटस्टार का कि फिल्म शाम के वक्त रिलीज की और साल के पहले दिन जैसा नेटफ्लिक्स ने मूड खराब किया वैसा कुछ नहीं हुआ। संजना सांघी तुम्हारे साथ अच्छा काम कर ले गईं हैं, तुम्हारे होते होते रह गए सास ससुर (फिल्म में) स्वास्तिका मुखर्जी और शाश्वत चटर्जी ने मामला जमाने की पूरी कोशिश की है। फिल्म देखते समय कई बार लगता है कि यार, तुमने ये जो सुसाइड की ये कहीं फिल्म का पब्लिसिटी स्टंट तो नहीं था। कहीं तो लाइन छोड़ी होती रील और रियल लाइफ में फर्क की। आंखों के कोने गीले हो गए हैं, काश, ये पब्लिसिटी स्टंट ही होता और फिल्म खत्म होने के बाद दिखे स्टिल्स में तुम मुस्कुराते और फिल्म में सैफ अली खान के घटिया डायलॉग की तरह ही बोल देते, जस्ट जोकिंग।
इसकी ओरीजनल फिल्म ‘फॉल्ट इन अवर स्टार्स’ भी इसी प्लेटफॉर्म पर मौजूद है, तुम्हारे चाहने वालों को ‘दिल बेचारा’ देखने के बाद उसे भी देखना चाहिए ताकि समझ आए ‘धड़क’ वाले शशांक खेतान ने कौन सा कलंक यहां तुम्हारे माथे मढ़ दिया है
चलो रात बहुत हो चली है, जहां तुम हो, वहां रात और दिन का फर्क समझ आता होगा क्या? और, ये भी समझ आता होगा क्या कि दुनिया में सब इतना काला और सफेद भी नहीं है, कुछ धूसर सा भी है, जिसका नाम जिंदगी है, खैर तुम नहीं समझोगे।
जै जै..!
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