वाकया साल 2002 का है। जी नेटवर्क के लिए स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने का मुझे जिम्मा मिला। इसी डॉक्यूमेंट्री की मेकिंग के दौरान संगीतकार आनंदजी ने एक दिलचस्प किस्सा फिल्म सरस्वतीचंद्र का सुनाया। फिल्म का वह गाना तो आपने सुना ही होगा, ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में फूल नहीं मेरा दिल है।‘ इंदीवर के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर और मुकेश ने गाया है। कल्याणजी आनंदजी को जब ये गीत धुन बनाने के लिए मिली तो दिक्कत ये सामने आई कि गाने का पहला अक्षर ‘फ’ और जिनको ध्वनि संयोजन के बारे में जरा भी जानकारी है वे जानते हैं कि फ शब्द माइक पर बोलते समय ब्लास्ट (आवाज का फट जाना) करता है। आनंदजी ने इसका तोड़ ये निकाला कि उन्होंने लता मंगेशकर से फूल शब्द को थोड़ा लहरा के गाने को कहा, ‘फूउउल तुम्हें भेजा है ख़त में….., बस काम बन गया।
बाइस्कोप: जब अमिताभ बच्चन को पड़ा था झन्नाटेदार चांटा और ताउम्र की दोस्ती हुई उनकी विनोद खन्ना से
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एस अली रजा भी सुनील दत्त की शख्सीयत के कायल थे। बतौर निर्देशक सुनील दत्त की पहली फिल्म यादें वह देखकर काफी प्रभावित हुए थे। और, वह यह भी जानते थे कि सुनील दत्त अपने करियर में पहली बार प्रोड्यूसर अपने भाई सोम दत्त के लिए बने थे। सोम दत्त को सुनील दत्त ने फिल्म मन का मीत में लॉन्च किया था। इसके बाद उन्होंने जब अगली फिल्म बनाने की तैयारी की तो एस अली रजा ने पूरी शिद्दत से इसकी कहानी लिखनी शुरू की। राजस्थान के रेतीलों टीलों से उड़ती बहती और हर दूसरे पल में एक नई शक्ल ले लेने वाली मोहब्बत की ये दास्तां भी लैला मजनू, हीर रांझा, शीरी फरहाद और ढोला मारू की कहानी जैसी है, नाम इसका रखा गया रेशमा और शेरा। रेशमा और शेरा के रिलीज होने की तारीख 23 जुलाई 1971 मिलती है और इस लिहाज से फिल्म ने गुरुवार को रिलीज के 51 साल पूरे कर लिए।
एस अली रजा की शादी फिल्म बरसात में राज कपूर की खोज के तौर पर परदे पर पेश हुईं निम्मी से हुई। निम्मी का वास्ता मोहब्बत की सबसे बेहतरीन निशानी ताजमहल के शहर आगरा से रहा है। दोनों की मोहब्बत ताउम्र जितनी बेमिसाल रही, मोहब्बत की वैसी ही तासीर रजा ने अपनी कहानियों की रगों में भी भरी। रेशमा और शेरा की कहानी सुनाने से पहले इस फिल्म के कुछ और नगीनों के बारे में जानना भी जरूरी है। जिनको दुनिया ने बाद में लंबूजी कहकर पुकारा औऱ जिनकी आवाज के करोड़ों दीवाने बने। वह अमिताभ बच्चन इस फिल्म में जिस किरदार में नजर आते हैं, उसका नाम है छोटू और यह शख्स बोल नहीं सकता। अमिताभ बच्चन जब 75 साल के हुए थे तो इस फिल्म की यादें संजोती एक चिट्ठी अभिनेत्री सुलोचना ने अमिताभ बच्चन को लिखी थी। उन्होंने इस पत्र में अमिताभ बच्चन को एक संकोची स्वभाव के युवा के तौर पर याद किया और माना कि उनकी शख्सीयत में जो तब्दीली इतने सालों में आई वह ईश्वर के किसी चमत्कार से कम नहीं है।
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छोटू अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म में विनोद खन्ना भी हैं, अमरीश पुरी भी हैं और राखी भी। सब तब हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत कर रहे थे और अपने प्रोडक्शन हाउस अजंता आर्ट्स में सुनील दत्त ने सबको उगने और लहराने की जगह भी दी और खाद पानी भी दिया। फिल्म की हीरोइन धी सुनील दत्त की फेवरिट अदाकारा वहीदा रहमान। वहीदा रहमान का फिल्म मुझे जीने दो का किस्सा तो आपको पता होगा कि कैसे एक सीन में वहीदा रहमान ने सुनील दत्त को दे दनादन तमाम चांटे असली वाले मारे थे। हुआ ये था कि सीन में पहला चांटा खाने के बाद सीन तो ओके हो गया लेकिन सुनील दत्त को लगा कि चांटा खाते समय उनकी आंखों का मिच जाना उनके किरदार को हल्का करता था। तो परफेक्शन के लिए वह तब तक चांटे खाते रहे जब तक कि गाल पर पड़े चांटे के वक्त उनकी दोनों आंखें खुली नहीं रहीं। ऐसा ही एक वाकया फिल्म रेशमा और शेरा का भी है, यहां चांटा खाने का नंबर लगा था अमिताभ बच्चन का।
भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजी गई फिल्म रेशमा और शेरा को बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी गोल्डन बीयर अवार्ड के लिए नामित किया गया था। इन सम्मानों के अलावा फिल्म रेशमा और शेरा को तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिले। वहीदा रहमान ने इस फिल्म के लिए जीता था सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, संगीतकार जयदेव को मिला सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और रामचंद्र को मिला सर्वश्रेष्ठ छायांकन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार। रामचंद्र ने ही सुनील दत्त की फिल्म यादें में भी फिल्मांकन का जिम्मा संभाला था। सुनील दत्त की फिल्मों में संगीत का खासा योगदान रहता रहा। फिल्म यादें में वह वसंत देसाई का संगीत लेकर आए थे, फिल्म रेशमा और शेरा में ये जिम्मेदारी जयदेव ने उठाई। जयेदव का संगीतबद्ध किया वो गाना अब तो सुनना बनता है जिसकी चर्चा मैंने आज के बाइस्कोप की शुरुआत में की थी।
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आगे बढ़ने से पहले एक किस्सा और, और ये भी अमिताभ बच्चन से जुड़ा है। ये तो आप जानते ही हैं कि निर्माता, निर्देशक और अभिनेता अजय देवगन के पिता वीरू देवगन हिंदी सिनेमा के नामी स्टंट निर्देशक रहे हैं। अमिताभ बच्चन और वीरू देवगन की जान पहचान पहली बार इसी फिल्म रेशमा और शेरा की राजस्थान में आउटडोर शूटिंग के दौरान ही हुई। संयोग ये भी है कि वीरू देवगन जब फिल्म निर्देशक बने तो उसमें अमिताभ बच्चन ने ही अजय देवगन के साथ लीड किरदार किया। हिंदुस्तान की कसम नाम की ये फिल्म भी रेशमा और शेरा की रिलीज वाले दिन ही यानी 23 जुलाई को साल 1999 में रिलीज हुई थी।
लेकिन, किस्सा ये नहीं है जो आपने अभी पढ़ा, असल किस्सा ये है जो अब मैं लिखने जा रहा हूं। हुआ यूं कि जिस दिन अमिताभ बच्चन से मुंबई से जयपुर और जयपुर से सड़क के रास्ते रेगिस्तान में फिल्म की लोकेशन पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां एक शख्स बांस की छुलछुली से मार खा रहा है। पीटने वाले थे फिल्म के स्टंट निर्देशक खन्ना और पिटने वाला शख्स था वीरू देवगन। वीरू देवगन वहां फिल्म के एक कलाकार का बॉडी डबल बनकर खड़े थे। अमिताभ बच्चन ये सीन देखकर और इस सीन में वीरू देवगन की अपनी कला के प्रति निष्ठा और समर्पण देखकर बहुत प्रभावित हुए।
चलिए अब बताते हैं आपको फिल्म रेशमा और शेरा की कहानी। फिल्म में रेशमा का किरदार किया है वहीदा रहमान ने और शेरा बने हैं सुनील दत्त। दोनों के परिवारों के बीच अदावत चल रही है और ये दोनों हैं कि मोहब्बत की पींगे बढ़ा रहे हैं। शेरा का छोटा भाई है छोटू और जिसका निशाना अचूक है। शेरा औऱ छोटू का पिता सगत सिंह पुरानी दुश्मनी के चलते रेशमा के पिता और भाई का खून करवा देता है। रेशमा और शेरा की मोहब्बत खत्म करने के लिए हुए इस खून खराबे में विधवा हुई रेशमा की भाभी का दुख छोटू बौरा जाता है। और बौरा शेरा भी जाता है, वह छोटू को ही खत्म करने की ठान लेता है। फिल्म का क्लाइमेक्स बहुत ही नाटकीय है और शायद फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी भी। कहानी में नवीनता लाने की आखिरी वक्त में की गई कोशिश लोगों को पसंद नहीं आई। कहानी को दूसरी कालजयी प्रेम कहानियों की तरह दुखांत बनाने की जो तरकीब यहां निकाली गई, वह तरकीब फिल्म के लिए नश्तर बन गई।
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फिल्म रेशमा और शेरा के संगीत की बात मैं कर ही चुका हूं। फिल्म की फोटोग्राफी कमाल की थी जिसके लिए इसके सिनेमैटोग्राफ रामचंद्र को नेशनल अवार्ड भी मिला। उन दिनों के काबिल फिल्म एडीटर प्राण मेहरा ने इसे शुरू से लेकर आखिरी तक काफी चुस्त भी रखा लेकिन फिल्म कारोबार के मामले में मात खा ही गई। फिल्म की कॉस्ट्यूम्स की सराहना देश विदेश हर जगह हुई थी। फिल्म की कॉस्ट्यूम डिजाइनर भानु अथैया इसकी रिसर्च के लिए हफ्तों राजस्थान में रही थीं, यही रिसर्च बाद में उनको फिल्म गांधी में भी खूब काम आई, जिसकी कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग के लिए उन्होंने ऑस्कर पुरस्कार जीता।
फिल्म रेशमा और शेरा को उस समय के समीक्षकों की तब खूब सराहना मिली थी और आज भी समालोचना के लिए इस फिल्म को जब मैं देखता हूं तो इसे हिंदी सिनेमा के सफर का एक नायाब मील का पत्थर पाता हूं। अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना की साथ में ये पहली फिल्म रही। विनोद खन्ना इससे पहले सोम दत्त के अपोजिट फिल्म मन का मीत में विलेन का रोल कर चुके थे। चर्चित विलेन रंजीत की फिल्म सावन भादों के बाद ये दूसरी साइन की हुई फिल्म रही। रंजीत का असली नाम है गोपाल बेदी और सुनील दत्त ने ही उनका नाम बदलकर रंजीत कर दिया था। फिल्म में राखी और वहीदा रहमान ने पहली बार साथ काम किया। दोनों ने बाद में अमिताभ बच्चन के साथ तमाम फिल्मों में काम किया, कभी उनकी संगिनी बनकर तो कभी उनकी मां बनकर। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)