हिंदी सिनेमा में जितनी फिल्में हर साल बनती हैं, उसके कहीं ज्यादा किस्से यहां बनते हैं। इन किस्सों से ही सिनेमा सांसें लेता है और इसके दर्शक पाते हैं अपने मनोरंजन की वो सामग्री जो सिनेमाघरों के बाहर आने के बाद भी उनका रिश्ता उनके चहीते सितारों से जोड़े रखती है। अब तो खैर तमाम सर्च इंजन आ गए हैं इंटरनेट पर और आप जब चाहें जो चाहें अपनी तबीयत के हिसाब से और अपने वक्त के हिसाब से आराम से अपने मोबाइल, लैपटॉप या टैबलेट पर पढ़ सकते हैं। लेकिन, हिंदी सिनेमा पर हिंदी में उतना लिखा नहीं गया है जितना आपको हिंदी सिनेमा पर अंग्रेजी में लिखा मिल जाएगा। बाइस्कोप नाम की ये सीरीज इसी फासले को थोड़ा कम करने की एक कोशिश है। पिछली सदी के आठवें, नौवें और आखिरी दशक की चर्चित फिल्मों की इस सीरीज में आज बात होनी है प्रकाश मेहरा की फिल्म घुंघरू की।
बाइस्कोप: नमक हलाल के बाद इस फिल्म में बननी थी अमिताभ-शशि-स्मिता की तिकड़ी और एंट्री हुई ओबेरॉय की
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अमिताभ बच्चन और स्मिता पाटिल के साथ प्रकाश मेहरा की बनाई फिल्म नमक हलाल रिलीज हुई 1982 में और 1984 में आई थी प्रकाश मेहरा की अमिताभ बच्चन और जया प्रदा स्टारर फिल्म शराबी। इन दो सुपरहिट फिल्मों के बीच प्रकाश मेहरा ने बतौर प्रोड्यूसर एक फिल्म अपनी कंपनी प्रकाश मेहरा कंबाइन्स के बैनर तले बनाई थी, घुंघरू। फिल्म का निर्देशन प्रकाश मेहरा ने अपने सहायक राम सेठी को सौंपा जिन्हें परदे पर आप प्रकाश मेहरा की तमाम फिल्मों मे कॉमेडी करते देख चुके हैं। प्रकाश मेहरा के इस बड़प्पन की सिनेमा हमेशा दाद देता रहेगा कि उन्होंने अपने सहायकों को निर्देशक बनाने के लिए खुद फिल्में बनाईं।
फिल्म घुंघरू बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। ये फिल्म नमक हलाल के तुरंत बाद अमिताभ बच्चन और स्मिता पाटिल के साथ ही बननी थी लेकिन इसी बीच अमिताभ बच्चन के साथ कुली के सेट पर हादसा हो गया और वह लंबे समय तक किसी फिल्म की शूटिंग करने लायक नहीं रहे। प्रकाश मेहरा तमाम सितारों की तारीखें ले चुके थे। शशि कपूर और स्मिता पाटिल से प्रकाश मेहरा ने अपनी दिक्कत का जिक्र किया तो उन्होंने अमिताभ बच्चन की जगह किसी दूसरे सितारे के लेने पर भी फिल्म में बने रहने पर रजामंदी जता दी। प्रकाश मेहरा ने यहां दांव चला उस समय के उभरते सितारे सुरेश ओबेरॉय पर। सुरेश ओबेरॉय फिल्म नमक हलाल में अर्जुन सिंह यानी अमिताभ बच्चन के पिता का किरदार निभा चुके थे। प्रकाश मेहरा ने उन्हें ही अमिताभ बच्चन वाला रोल फिल्म घुंघरू में सौंप दिया। सुरेश ओबेरॉय को इतना बड़ा मौका मिला तो उन्होंने अपनी मूंछें तक इस रोल के लिए कुर्बान कर दीं। सुरेश ओबेरॉय से गलती यहां बस इतनी हो गई कि वह ये उपलब्धि पचा नहीं पाए और फिल्म रिलीज होने से पहले ही वह खुद को अगला अमिताभ बच्चन समझ बैठे।
फिल्म में सुरेश ओबेरॉय, स्मिता पाटिल और शशि कपूर का प्रेम त्रिकोण है। वहीदा रहमान नमक हलाल में भी थी, यहां भी हैं। नमक हलाल में वह शशि कपूर की देखरेख करती हैं। यहां शशि कपूर उनके गोद लिए बेटे विक्रम बने हैं, जिन्हें एक तवायफ केसर से प्यार हो जाता है। रानी मां के खुद मां बनने क बाद विक्रम को रियासत की देखरेख की जिम्मेदार मिलती है। केसर और विक्रम का ब्याह नहीं हो पाता। केसर चली जाती है सूरज के साथ और वहां विक्रम की बेटी को जन्म देती है। रानी मां का असली बेटा कॉलेज में जिस खूबसूरत सी लड़की के प्यार में गिरफ्तार होता है, वह केसर और विक्रम की बेटी है। वफादार विक्रम तो रानी मां का कहना मान गया था लेकिन बेटा नहीं मानता। फिर साजिशें रची जाती हैं। फिर मोहब्बत का कत्ल करने का षडयंत्र बुना जाता है। लेकिन, इस बार सूरज सिर पर चढ़ आता है।
फिल्म घुंघरू का नमक हलाल और शराबी के बीच में रिलीज होना ही इस फिल्म की इकलौती कमजोर कड़ी रही। जैसे प्रकाश मेहरा के काबिल असिस्टेंट राकेश कुमार ने फिल्म खून पसीना में प्रकाश मेहरा का नाम रोशन किया था, वैसा कारनामा राम सेठी तो नहीं दिखा पाए लेकिन फिल्म उन्होंने भी ठीक ठाक सी और काफी मनोरंजक बनाई। फिल्म की जान हैं स्मिता पाटिल और फिल्म मुकद्दर का सिकंदर में रेखा वाला रूप दोहराकर स्मिता पाटिल ने केसर के रूप में अपनी खुशबू जमाने भर में महकाने में कामयाबी पाई। फिल्म की एक कमजोर कड़ी ये भी है कि इसकी पटकथा बिल्कुल जाने पहचाने ढर्रे पर चलती है और एक आम दर्शक भी बता सकता है कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन, फिल्म को अब भी देखो तो ये बोर नहीं करती। इसकी स्पीड ऐसी है कि एक के बाद एक कुछ न कुछ होते रहता है और कहानी भागती रहती है।
फिल्म घुंघरू का म्यूजिक यादगार रहा तो इसलिए कि इसमें कल्याणजी आनंदजी ने फिल्म का निर्देशक नया होते हुए भी प्रकाश मेहरा की वजह से पूरी मेहनत की और कहीं कोई कोर कसर नहीं रख छोड़ी। प्रभा ठाकुर का लिखा गीत ‘तोहफा कुबुल है हमें सरकार आपका’ आपको फिल्म मुकद्दर का सिकंदर के गाने ‘सलाम ए इश्क मेरी जां जरा कुबूल कर लो’ की याद दिला सकता है। इसके अलावा फिल्म में ‘प्यार के धागे’, ‘जो सफर प्यार से कट जाए वो प्यारा है सफर’ आदि बेहद खूबसूरत बन पड़े। प्रभा ठाकुर के इस फिल्म के लिए गाना लिखने की भी दिलचस्प कहानी प्रकाश मेहरा ने एक बार सुनाई थी, वो फिर कभी। अभी के लिए इतना काफी है कि प्रभा ठाकुर का राजस्थान की राजनीति में काफी दबदबा रहा है, और वह कांग्रेस की बड़ी नेता रही हैं।
फिल्म घुंघरू में स्मिता पाटिल ने फिर एक बार ये साबित किया कि कमर्शियल सिनेमा के लिए भी वह उतनी ही फिट हैं जितनी तारीफ उनकी उन दिनों आर्ट फिल्मों के लिए होती रहती थी। स्मिता पाटिल की ख्वाहिश थी कि फिल्म घुंघरू में जो किरदार पहले अमिताभ बच्चन करने वाले थे, वह उनके मना करने पर राज बब्बर करें। लेकिन, राज बब्बर और प्रकाश मेहरा के बीच तारीखों को लेकर शायद सहमति नहीं बन सकीं और वह यह फिल्म नहीं कर सके।
दिलचस्प तथ्य यहां ये भी है कि राज बब्बर ने ही फिल्म नमक हलाल के लिए स्मिता पाटिल के नाम की सिफारिश की थी। स्मिता पाटिल के बारे में यही कहा जा सकता है कि कमर्शियल सिनेमा में जब वह तेजी से नंबर वन की कुर्सी की तरफ आगे बढ़ रही थीं तभी वह एक बच्चे की मां बनने का फैसला ले बैठीं और इस बच्चे की जान बचाते बचाते अपनी जान देकर दुनिया छोड़ गईं। फिल्म में शशि कपूर, स्मिता पाटिल के अलावा जिस शख्स ने सबसे ज्यादा तालियां बटोरीं वह रहे अभिनेता सुरेश ओबेरॉय। फिल्म में सुपरस्टार मनोज कुमार के बेटे कुणाल गोस्वामी, उनकी प्रेमिका बनीं कोमल महुवाकर, पद्मिनी कपिला, रंजीत और पूनम सिन्हा भी हैं। कुणाल गोस्वामी उन दिनों नीरा मेहरा के खास हुआ करते थे और नीरा मेहरा को कुणाल काफी पसंद भी थे।
फिल्म घुंघरू ने प्रकाश मेहरा का नाम जुड़ा होने के चलते भी बॉक्स ऑफिस पर ठीक ठाक कमाई करने में कामयाबी हासिल कर ली थी। ये फिल्म जब बननी शुरू हुई तो इसका नाम प्रकाश मेहरा ने प्यार के धागे रखा था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर उन्होंने रख दिया, घुंघरू। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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