Movie Review: खाली पीली
पांच फिल्में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर और पांच फिल्में बतौर फुल टाइम डायरेक्टर करने के बाद अली अब्बास जफर ने ये मान लिया कि उन्हें हिंदी सिनेमा के दर्शकों की नब्ज समझ आ गई है। उन्होंने यशराज फिल्म्स से अपना तंबू समेटा और एक नया तंबू बतौर फिल्म निर्माता लगा दिया जी स्टूडियोज के पड़ोस में। बतौर प्रोड्यूसर अली ने पहली फिल्म ‘खाली पीली’ बनाई है, दूसरी फिल्म जो वह कैटरीना कैफ के साथ बनाना चाहते हैं, उसके लिए पैसा लगाने वाली किसी कंपनी के इंतजार में हैं। ‘खाली पीली’ थिएटर के लिए बनी फिल्म है और आपके डिश टीवी कनेक्शन पर जी सिनेप्लेक्स के जरिए रिलीज हुई है। है तो जी5 पर भी, लेकिन उसके पुराने ग्राहक हैं तो भी इस फिल्म को देखने का पैसा अलग से आपको चुकाना पड़ेगा।
Khaali Peeli Review: ‘खाली पीली’ देखने से पहले पढ़ने का ये रिव्यू, समझ आएंगा फिल्म देखने का कि नहीं
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अली अब्बास जफर के यहा ‘पार्टनर इन क्राइम’ हैं मकबूल खान। मकबूल खान का नाम उतना मकबूल नहीं है जितना उनकी ये फिल्म पिछले साल भर से रही है। उनके बारे में तलाशने पर पता चलता है कि साल 2008 में उन्होंने फिल्म ‘कबूतर’ बनाई, फिर मनोज बाजपेयी की ‘लंका’ लगाई और अब ‘खाली पीली’। फिल्म का नाम वैसे काली पीली रहता तो बेहतर होता। एक रोड मूवी जैसी फील तब उस फिल्म में आ सकती थी। वैसे भी ‘टैक्सी नंबर नौ दो ग्यारह’ के बाद से कोई ढंग की कैबी मूवी आई नहीं है। ‘खाली पीली’ मुंबई की टपोरी भाषा का जुमला है, जो फिल्म के फाइनल रिजल्ट से मैच कर जाता है।
‘खाली पीली’ का जो कैबी है वो बंदा ब्लैकी है। ‘अमर अकबर एंथनी’ के एंथनी का फैन लगता है और वैसे ही बोलने की कोशिश करता है क्योंकि टपोरी वह लगता नहीं है। घर से भागी पूजा उससे टकराती है। स्टाइल उसका भी भंकस करने वाला ही है। यहां से शुरू होती है कहानी जिनके बारे में कह सकते हैं, राम मिलाई जोड़ी…! ‘खाली पीली’ देखने के लिए आपके पास बहुत सारा फालतू टाइम (कम से कम दो घंटे) और बड़ा वाला जिगर चाहिए। फिल्म का नाम अगर आप अपने पड़ोसी से भी पूछेंगे तो उसे शायद पता न हो कि ऐसी कोई फिल्म साल भर से बन भी रही है। फिल्म देखने के लिए दो अक्टूबर से उपलब्ध है, इसकी जानकारी तो आपके घर में भी शायद ही किसी को हो, वजह है जी स्टूडियोज की मार्केटिंग टीम। उनका भारत अंधेरी से मीरा रोड के आगे शायद नहीं जाता।
फिल्म ‘खाली पीली’ एक घिसी पिटी सी कहानी वाली फिल्म है जिसमें दो नए हीरो हीरोइन के लिए ज्यादा कुछ कर दिखाने का स्कोप नहीं है। डायरेक्टर ने भी उनसे कुछ खास करवाने के लिए अलग से मेहनत की हो लगता नहीं। एंथनी वाली बोली में थोड़ा सा ‘तेजाब’ का और थोड़ा सा ‘रंगीला’ का मुन्ना भी मिलाकर ईशान खट्टर ने जो किया है, वह वही कर सकते हैं। इस लड़के में जान है। मेहनत से अभिनय करता है। और, किरदार को जीने में जान लगा देता है। फिल्म में अगर किसी को फुल मार्क्स मिलते हैं तो वह ईशान खट्टर ही हैं।
फिल्म ‘खाली पीली’ के बाकी कलाकारों में अनन्या पांडे से लेकर सतीश कौशिक और बाकी सब बस अपना काम करते नजर आते हैं। कुछ अलग से वैल्यू ऐड करने का किसी का जज्बा नहीं दिखता, जयदीप अहलावत को छोड़कर। जयदीप का नाम वेब सीरीज ‘पाताललोक’ के बाद बहुत बड़ा हो चुका है। लेकिन, इस बड़े नाम का फायदा इस छोटी फिल्म को मिलता दिखता नहीं। फिल्म का हिंदी पट्टी के दर्शकों से बहुत ज्यादा सीधा कनेक्ट भी नहीं है। फिल्म को इसके म्यूजिक का कोई सपोर्ट नहीं है। फोटोग्राफी और एडीटिंग भी बस ओके है। अगर आप अपने स्मार्ट टीवी पर ये फिल्म साउंड बार के साथ देखना चाहते हैं तो साउंड बार ऑफ ही रखिए क्योंकि इसका साउंड डिजाइन ओके नही हैं।
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