27 साल कम नहीं होते और उस देश में जहां की 65 फीसदी आबादी 35 साल की उम्र से कम की हो तो वैसे में बाइस्कोप जैसे कॉलम संबंधित विधा का दस्तावेज भी बनते चलते हैं। वैसे तो 2 जुलाई के दिन रिलीज हुई फिल्मों की बात करें तो इस दिन रिलीज होने वाली फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती, रंजीता और रामेश्वरी की 1982 में रिलीज हुई फिल्म आदत से मजबूर, अक्षय कुमार और श्रीदेवी की 2004 में रिलीज हुई फिल्म मेरी बीवी का जवाब नहीं और 2010 में रिलीज हुई सोनम कपूर व इमरान खान की फिल्म आई हेट लव स्टोरीज के नाम सामने आते हैं। लेकिन, हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म इनमें से कोई नहीं है। मैं आज चर्चा करने जा रहा हूं शाहरुख खान की 1993 में रिलीज हुई फिल्म माया मेमसाब की। यह वही फिल्म है जिसके बारे में छपे एक आलेख पर हुए झगड़े के बाद शाहरुख खान को हवालात की हवा खानी पड़ी। शाहरुख और इस मामले में उनके निशाने पर आए पत्रकार के बीच बाद में मामला सुलझ तो गया लेकिन शाहरुख के दामन पर लगा ये दाग उनके तमाम माफी मांगने के बाद भी छूट नहीं पाया।
बाइस्कोप: जब फिल्मी मैगजीन के संपादक से शाहरुख खान ने लिया पंगा और पहुंचे मुंबई पुलिस की हवालात में
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शाहरुख दरअसल आदत से मजबूर इंसान शुरू से रहे हैं। उनको गुस्सा बहुत जल्दी आता है। वानखेड़े स्टेडियम में वह आईपीएल के दौरान वहां के कर्मचारियों से भिड़ चुके हैं। कटरीना कैफ की पार्टी में सलमान खान से उनकी हाथापाई होते होते बची और शिरीष कुंदर वाला चर्चित किस्सा तो सबको पता है ही। शाहरुख को जो करीब से जानते हैं, वह ये भी जानते हैं कि शाहरुख आमतौर पर बहुत ठंडे दिमाग से काम करने वाले इंसान है। दुलार उनको भाता है। डायरेक्टर उनको खान साब कहकर बुलाए तो उनका लाड सातवें आसमान पर होता है। लेकिन, उनके अहं को जरा भी ठेस बर्दाश्त नहीं है। और, इसके बाद अगर उनकी सटक जाए तो फिर भगवान ही मालिक। ऐसा ही कुछ हुआ था फिल्म माया मेम साब की शूटिंग को लेकर एक अंग्रेजी फिल्मी पत्रिका में छपे आलेख पर।
हुआ यूं कि इस पत्रिका ने शाहरूख और फिल्म की हीरोइन दीपा मेहता को लेकर एक आलेख छाप दिया। इसके मुताबिक फिल्म के निर्देशक और दीपा मेहता के पति केतन मेहता ने फिल्म में एक बेहद रूमानी बेडरूम सीन रखा। इसकी शूटिंग के लिए न तो शाहरुख मन बना पा रहे थे और न दीपा। तो मैगजीन के मुताबिक केतन ने दोनों को एक रात साथ गुजारने को कहा ताकि वे दोनों एक दूसरे को ठीक से जान सकें और फिर अगले दिन ये सीन केतन ने सिर्फ अपने सिनेमैटोग्राफर अनूप जोटवानी के साथ शूट कर लिया। फिल्म पत्रिका ने ये सारी बातें किसके हवाले से लिखीं ये तो साफ नहीं ही था, आलेख लिखने वाले रिपोर्टर का नाम भी इसके साथ नहीं छपा था। शाहरुख ने इसे पढ़ा तो वह आग बबूला हो गए। अगले ही दिन किसी फिल्मी पार्टी में उन्हें इस पत्रिका का एक बंदा मिला जिसे शाहरुख ने इस पूरे गॉसिप का राइटर समझ लिया और उसकी ऐसी की तैसी कर दी। यही नहीं पुलिस में दर्ज शिकायत के मुताबिक शाहरुख ने इसके बाद इस शख्स के घर जाकर भी ऊधम मचाया। पुलिस ने इस मामले में शाहरुख को घंटों थाने में बिठाए रखा।
इस किस्से को लेकर शाहरुख को बाद में तब बहुत अफसोस हुआ जब उन्हें पता चला कि जिस शख्स पर वह बिगड़े और जिसके घर पर जाकर उन्होंने हल्ला काटा, उसका इस पूरी रिपोर्ट से कोई लेना देना नहीं था। नेताओं के बारे में भी कुछ तीखी टिप्पणी एक बार शाहरुख खान ने की थी तो अमर सिंह ने उन्हें इसका सबक सिखाने का एलान किया था और कहा था कि शाहरुख बेइज्जती सार्वजनिक करते हैं और माफी अकेले में मांगते हैं। खैर, हम लौटते हैं अपनी आज के बाइस्कोप की फिल्म माया मेमसाब की तरफ। फिल्म के जिस सीन को लेकर इतना बखेड़ा हुआ, उसे देखने के लिए स्कूल कॉलेजों के छात्र भर भरकर ये फिल्म देखने पहुंचे लेकिन फिल्म से ये सीन सेंसर बोर्ड ने ऐन मौके पर निकाल दिया। तब यूट्यूब, व्हाट्सएप या दूसरे सोशल मीडिया थे नहीं लेकिन फिल्म में से सीन काटे जाने की खबर शनिवार तक ही जमाने को हो चुकी थी और रिलीज डेट के बाद आए संडे को कानपुर की सुंदर टॉकीज में इसे देखने गिनती के लोग ही पहुंचे थे। हां, बहुत बाद में यानी कि साल 2008 में फिल्म से कटा ये सीन यूट्यूब पर अवतरित हुआ और ईमेल के जरिए ये कॉरपोरेट जगत में खूब वायरल हुआ था।
अगर आपने नेटफ्लिक्स पर अमेरिका के लोकप्रिय टीवी होस्ट डेविड लेटरमैन का शो देखा है तो उसमें भी शाहरुख के हवालात खाने वाले किस्से का जिक्र है। इस शो में शाहरुख ने माना है कि करियर के शुरुआती दिनों में उन्हें कुछ घंटे हवालात में गुजारने पड़े थे। शो में शाहरुख कहते हैं, 'मैं तब नया नया आया था और हर खबर पर जो कुछ भी उसमें लिखा हो, उस पर रीएक्ट तुरंत कर जाता था। शुक्र है कि तब सोशल मीडिया नहीं था। कल्पना कीजिए कि जिस तरह का तब लिखा जाता था। मुझे बहुत गुस्सा आया तो मैंने मैगजीन के संपादक को फोन किया। मैंने उनसे पूछा कि क्या ये उन्होंने लिखा है। तो उनका जवाब था कि ये सिर्फ एक मजाक है और मुझे इसे इतना गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। मैं इसके बाद उनके ऑफिस गया और बहुत बवाल किया।'
इसके बाद एक दिन शाहरुख किसी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे तो वहां पुलिस पहुंची। उन लोगों ने जब शाहरुख से सवाल पूछने चाहे तो शाहरुख ने पुलिस वालों को अपनी कार में बैठने के लिए कहा और ये भी कहा कि रास्ते में हम गाड़ी में ही बात कर लेंगे। लेकिन, मुंबई की पुलिस ग्लैमर की चकाचौंध में कम ही आती है। पुलिस वालों ने शाहरुख को अपने साथ पुलिस की गाड़ी में बिठाया और लाकर हवालात में डाल दिया। जिसमें शाहरुख के मुताबिक इतनी गंदगी थी कि वह उन्हें छोड़ देने के लिए विनती करने लगे।
इसके बाद फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों को ऐसी लगी कि वे फिल्म जल्दी खत्म कर देने की विनती करने लगे। फिल्म में दीपा मेहता का किरदार माया का है। माया अपने पिता के साथ एक आलीशान हवेली में रहती है। पिता को दिल का दौरा पड़ता है तो डॉ. चारु दास उन्हें देखने आते हैं। चारु का आना जाना मेलजोल में बदलता है और दोनों की शादी हो जाती है। लेकिन डॉ. चारु दास को अपने काम से मोहब्बत है और माया को खुद से। वह अपना एक नया ख्वाहिशमंद रुद्र में तलाश लेती है। कहानी ये बताती है कि माया को प्रेम की नहीं संतुष्टि की तलाश है और इस बार उसकी नजर चढ़ता है उससे उम्र में कहीं छोटा ललित। ललित और माया के जिस्मानी रिश्तों में ऊष्मा तो बहुत होती है लेकिन आत्माओं के मिलन जैसी बात यहां भी नहीं बनती।
माया फिर भटकने लगती है। उसकी भूख क्या है, खुद उसे पता नहीं। वह खूब सामान खरीदती है। महंगे सामान खरीदती है। कर्ज पर पैसे लेकर सामान खरीदती है और एक दिन हर तरह से कंगाल हो जाती है। न उसके हिस्से सम्मान आता है, न प्यार आता है और न ही सुख। असलियत सामने आती है तो सब पीछे छूट जाते हैं।
फ्रांसीसी साहित्यकार गुस्ताव फ्लॉबर्ट के उपन्यास मैडम बॉवरी पर ये फिल्म केतन मेहता ने क्यों बनाई इसे लेकर भी तमाम किस्से प्रचलित रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि केतन मेहता के जीवन में ऐसी कोई महिला रहीं। लेकिन न कभी गुस्ताव ने किसी बॉवरी की जानकारी का इकरार किया और न ही कभी केतन मेहता ने किसी माया के अपने जीवन में होने की बात मानी। केतन प्रयोगधर्मी सिनेकार रहे हैं। माया मेमसाब से पहले हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने उन्हें भवनी भवाई और मिर्च मसाला में वातावरण को कहानी का हिस्सा बना देने वाले चितेरे के रूप में जाना। होली में आमिर खान को मौका देने वाले केतन को बाद में आमिर ने मंगल पांडे में मौका दिया। केतन मेहता के सिनेमा को टिकट खिड़की की कामयाबी के पैमाने पर कम ही नापा गया। उनकी बनाई फिल्में रंग रसिया और मांझी: द माउंटेनमैन भी लोगों ने खूब सराही, बस ये लोग जो इन फिल्मों को देखने गए वे काफी कम संख्या में गए। केतन को माया मेमसाब बनाने के फ्रांस से भी मदद मिली बताई जाती है। वह कुमार गंधर्व पर भी एक फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन चर्चाओं से आगे इस पर काम कभी आगे बढ़ा नहीं।
फिल्म माया मेमसाब में डॉक्टर बने फारुख शेख, रुद्र के रोल में राज बब्बर और ललित के किरदार में शाहरुख खान से केतन ने बढ़िया काम लिया। दीपा और शाहरुख की जोड़ी केतन ने बाद में एक और फिल्म ओ डार्लिंग ये है इंडिया में भी बनाने की नाकाम कोशिश की। माया मेमसाब में शाहरुख और दीपा के जितने सीन हैं, वे भी दोनों के बीच फेल होती केमिस्ट्री के नमूने हैं। ऐसा ही एक ट्रैक अरसे बाद फरहान अख्तर ने अपनी फिल्म दिल चाहता है में अक्षय खन्ना और डिंपल कपाड़िया के बीच गढ़ा और दोनों ने उम्र के फासले वाले इस रिश्ते को अपनी अदाकारी से यादगार भी बना दिया। उम्र में फासला हो तो रिश्ते की बुनियाद जिस्मानी रिश्ते कम ही होते हैं। आंखों से बोलती बातें और चेहरे पर मिलने से आती चमक ही ऐसे रिश्तों की बुनियाद होती है जहां दोनों वह सब कुछ कहना सुनना चाहते हैं जिसे सुनने कहने वाला उन्हें पहले कोई मिला नहीं होता। और, इस बारीक लकीर को बाद में रामगोपाल वर्मा भी निशब्द में समझने से चूक गए।