सिनेमा के शौकीनों के लिए किसी मनपसंद फिल्म को बार बार देखना या फिर किसी खास एक सीन को ही रिवाइंड कर करके देखना सामान्य बात है। और सिनेमा का ये शौकीन वीएचएस के दिनों में फिल्म लाइब्रेरी ही चलाता रहा हो तो फिर बात ही क्या है। कभी मुंबई के अंधेरी में वर्सोवा टेलीफोन एक्सचेंज के पास इस शख्स का विशाल दफ्तर हुआ करता था, फैक्ट्री। संघर्षशील कलाकार इस दफ्तर की देहरी लांघकर ही खुद को धन्य समझते थे। अंदर होता था एक विशालकाय हॉलनुमा इस शख्स का ऑफिस जिसमें दीवार पर लटकी दिखती थीं आदमकद मूर्तियां जो ज्यादातर निर्वसन होती थीं। उसके आसपास ऐसे लोगों का हुजूम होता था जो उसके होंठ हिलने से पहले ही ‘यस सर’ बोल देने को ही अपना सौभाग्य समझता था। इस शख्स ने हिंदी सिनेमा की बहती धारा में विक्षोभ पैदा किया। और, ये विक्षोभ इस शख्स ने पैदा किया उस दौर में जिस दौर में आमिर खान, सलमान खान और शाहरुख खान हिंदी सिनेमा में मोहब्बत की चाशनी घोल रहे थे। इस शख्स ने तब सिनेमा में अपराध घोल दिया। इस शख्स का नाम है, राम गोपाल वर्मा जिन्हें लोग प्यार से रामू भी कहते हैं। रामू की 3 जुलाई 1998 को रिलीज हुई फिल्म सत्या हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
बाइस्कोप: इस फिल्म से मनोज बाजपेयी ने बताया कि मुंबई का किंग कौन, पढ़िए कहानी का असल किस्सा
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सत्या रिलीज हुई तो उन दिनों अमर उजाला के ही एक सहयोगी अनिल सिंह जो बिहार से थे, मेरे पास आए बोले फिल्म में अपने यहां का एक लड़का है, मनोज बाजपेयी। रिव्यू लिखते समय थोड़ा ध्यान रखना उसका। मैंने उन्हें सिर्फ इतना कहा कि आप रविवार को रिव्यू पढ़ लेना आपको अच्छा लगेगा और जिस लड़के की बात आप कर रहे हैं, उसे अब किसी की सिफारिश की जरूरत रहेगी नहीं। सत्या को तमाम लोगों ने कालजयी फिल्म कहा। हिंदी सिनेमा की मस्ट वॉच फिल्म बताया। बीबीसी से लेकर तमाम दूसरे विदेशी चैनलों ने इसकी तारीफ के पुल बांधे और इसे हिंदी सिनेमा का एक टर्निंग प्वाइंट भी कहा। सत्या को मैं भी एक क्लासिक अपराध फिल्म मानता हूं लेकिन ये फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ के बाद की फिल्म है और हिंदी सिनेमा में मुंबई के गली कूंचों में सांस लेने वाले अंडरवर्ल्ड की सच्ची दिखने वाली असल कहानी की इस तथाकथित कैटेगरी की मां निर्देशक सुधीर मिश्रा की यही फिल्म है। राम गोपाल वर्मा से लेकर अनुराग कश्यप तक सबका सिनेमा इसी एक फिल्म से पानी पाता है।
राम गोपाल वर्मा सत्या से पहले भी अपनी फिल्मों शिवा, रंगीला और दौड़ से हिंदी सिनेमा के तब युवा हो रहे दर्शकों में अपनी अलग पहचान बना चुके थे। रंगीला खासतौर से लोगों को खूब पसंद आई और जैसा कि रामू खुद कहते हैं कि वह अपने भीतर के ही बदलावों का ही सबसे ज्यादा अध्ययन करते हैं, तो रंगीला के बाद सत्या का आना उनके प्रशंसकों के लिए किसी विक्षोम से कम नहीं था। इसके बीच आई फिल्म दौड़ फ्लॉप रही थी। रामू को उनके घर के लोग नकारा कहते थे। वह खुद बताते हैं, “ये काफी हद तक सही भी था। मेरे पास करने को कुछ था ही नहीं। मुझे बस लोगों में दिलचस्पी होती जो दबंग होते। स्कूल के बदमाश लड़के मुझे वैसे ही नजर आते जैसे लो एंगल कैमरे के सामने चलता हीरो। मुझे ऐसे ही लोग पसंद आते थे और धीरे धीरे मैं ऐसे लोगों का प्रशंसक बनता गया। मेरी फिल्में भी इसी का विस्तार बनती रहीं।”
राम गोपाल वर्मा निर्देशित सत्या को और गहराई से समझना हो तो उनका वह बयान जरूर पढ़ना चाहिए जो उन्होंने फिल्म दिल से के बाद दिया था। मणिरत्नम की शाहरुख खान और मनीषा कोइराला स्टारर फिल्म दिल से बनाने के लिए भारतीय सिनेमा के तीन दिग्गजों मणिरत्नम, शेखर कपूर और रामगोपाल वर्मा ने एक कंपनी बनाई थी इंडिया टॉकीज। इरादा था भाषा और प्रांत की सरहदों को मिटाकर अच्छा भारतीय सिनेमा बनाना जिसमें हर भाषा के कलाकार हों और कहानी ऐसी हो जो विदेश में भारतीय सिनेमा का समेकित प्रतिनिधित्व कर सके। पर पहली फिल्म के बाद ही तीनों की आपस में पटरी नहीं बैठ सकी। ऐसा क्यों हुआ और दोबारा तीनों एक साथ क्यों नहीं आए, इस सवाल पर रामगोपाल वर्मा ने 16 साल पहले कहा था, “शेखर एक काबिल फिल्म निर्देशक हैं और मणि को सिनेमा के सौंदर्य शास्त्र का बढ़िया ज्ञान है। लेकिन मणि को मेरी फिल्मों से नफरत है और उन्हें लगता है कि मैं बिगड़ चुका हूं। और, शेखर को लगता है कि मैं ठग हूं। तो ये मेल फिर होने से रहा।”
सत्या की कहानी कहते कहते रामू की कहानी कहना इसलिए यहां जरूरी है क्योंकि के सेरा सेरा और सहारा के गठजोड़ में उन्हें 10 फिल्में बनाने का ठेका मिला था, वह चाहते तो हिंदी सिनेमा को एक नई राह पर ले जा सकते थे। लेकिन, उन्होंने न सिर्फ सारा पैसा बर्बाद किया बल्कि एक से बढ़कर एक इतनी खराब फिल्में बनाईं कि रामगोपाल वर्मा की आग के आने तक उनके कट्टर प्रशंसकों ने भी उनकी फिल्में न देखने की कसम खा ली। राम गोपाल वर्मा ने अपनी और अपनी फिल्मों की मार्केटिंग करना आमिर खान से सीखा था। उन्हें पता था कि किसी हिंदी फिल्म के बारे में विदेश से कोई तारीफ करे तो भारत के लोगों को वह फिल्मकार या कलाकार महान लगने लगता है। उन्होंने कभी ये नहीं बताया कि ऐन रैंड से लेकर नीत्शे तक की अपनी पढ़ाई के बीच वह दरअसल जेम्स हेडली चेईज के उपन्यासों से कभी आगे नहीं बढ़ सके। सत्या इसी लीक का एक गिमिक है। ये इसकी लेखक टीम और इसके कलाकारों की जी तोड़ मेहनत है जिसने इस फिल्म को महान बनाया क्योंकि अगर निर्देशक ही महान होता तो फिर फिल्म रामगोपाल वर्मा की आग को तो अमिताभ बच्चन और अजय देवगन के साथ फिल्म खाकी से भी बड़ी हिट फिल्म होना चाहिए था।
सत्या की कहानी बहुत फैली हुई है। जाने पहचाने से कुछ देखे और कुछ अनदेखे से कलाकारों की पूरी बरात है फिल्म में। और, ये कलाकार अपने छोटे छोटे रोल में कमाल कर जाते हैं। सत्या और विद्या की कहानी में भीखू म्हात्रे कलावा का वो धागा बनकर आता है जो कलाई में बंधकर दुष्टों से रक्षा तो करता है लेकिन वह ये भूल जाता है कि कलावा का असर बस एक पखवाड़े भर का होता है। साधारण सी गली मोहल्ले की दिखने वाली मारपीट कैसे अंडरवर्ल्ड तक होती हुई सूबे की सियासत को अपनी आगोश में ले लेती है, यही फिल्म का असल प्रवाह है। इस रात की सुबह नहीं और सत्या दोनों का ये सूत्र एक जैसा है कि कैसे एक आम सी जिंदगी में यूं हीं आवेश में हुई एक छोटी सी घटना कैसे एक आम आदमी के जीवन को बदलकर रख देती है। सौरभ शुक्ला ने सुधीर मिश्रा के साथ इस रात की सुबह नहीं में काम किया। उनको साथी मिले अनुराग कश्यप और दोनों ने लिख डाला इसी कहानी का असली सत्य यानी सत्या।
फिल्म सत्या में जे डी चक्रवर्ती और उर्मिला मातोंडकर हीरो हीरोइन हैं। उर्मिला ने रंगीला के बाद यहां भी दर्शकों को खूब प्रभावित किया। पुलिस कमिश्नर आमोद शुक्ला के रूप में परेश रावल लोगों को याद रहे। कल्लू मामा का कमाल सौरभ शुक्ला के खाते में गया। इंस्पेक्टर खांडिलकर के किरदार ने आदित्य श्रीवास्तव को हिंदी सिनेमा का नया जगदीश राज बना दिया। पक्या के किरदार ने सुशांत सिंह और बापू के किरदार ने मनोज जोशी का करियर पटरी पर ला दिया। वकील चंद्रकांत मुले के किरदार में मकरंद देशपांडे ने अपनी अलग छाप छोड़ी लेकिन जिस एक कलाकार ने अपने अभिनय से इस फिल्म में अपने सारे आलोचकों का मुंह बंद कर दिया, वह था मनोज बाजपेयी। मनोज बाजपेयी ने इस फिल्म की रिलीज से पहले बहुत कुछ सुना और सहा। लेकिन भीकू म्हात्रे ने आखिर बता ही दिया कि मुंबई का किंग कौन? और एक नेशनल फिल्म अवार्ड भी झटक लिया।
फिल्म इस रात की सुबह नहीं का हक मारकर फिल्म सत्या वैसे तो मुंबई अपराध की एक नई श्रेणी की जनक मान ली गई लेकिन इस फिल्म ने सुधीर मिश्रा की फिल्म का एक और सूत्र भी इस फिल्म में दोहराया और वह है फिल्म का संगीत। सुधीर की फिल्म में चुप तुम रहो चुप हम रहें था तो यहां है बादलों से काट काट के कागजों पे नाम जोड़ना। वहां था पहली बार मिले जब हम तुम तो सत्या में था सपने में मिलती है ओ कुड़ी मेरी सपने में मिलती है। अगर आप दोबारा इस रात की सुबह नहीं और सत्या देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि दोनों फिल्मों का ग्राफ एक जैसा है। दोनों फिल्मों के प्लॉट प्वाइंट एक जैसे हैं। दोनों फिल्मों में गानों की प्लेसिंग एक जैसी है और दोनों फिल्मों के किरदारों का मनोविज्ञान व उनके संवादों की भाषा एक जैसी है। दोनों फिल्मों में एक सा कुछ नहीं है तो बस ये कि सुधीर मिश्रा का पीआर मुंबई के अंग्रेजीदा फिल्म समीक्षकों की लल्लो चप्पो नहीं कर पाया और न ही उनके पास कोई आमिर खान जैसा सलाहकार ही रहा जो उनकी फिल्म की तारीफ बीबीसी से या दूसरे लोगों से करा पाता। तो अगली बार जब सत्या देखने का मन करे तो उसके पहले एक बार इस रात की सुबह नहीं जरूर देख लें। फिल्म सत्या भी अपने समय की क्लासिक फिल्म है लेकिन इसे महान फिल्म कहने से पहले आपको इस रात की सुबह नहीं को इससे बेहतर फिल्म कहना ही चाहिए। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
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