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बाइस्कोप: जब सत्यजीत रे से बोले अटनबरो, मैं आपकी फिल्म में टेलीफोन डायरेक्टरी का वाचन भी कर लूंगा!

Sun, 04 Oct 2020 02:57 AM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 04 Oct 2020 02:57 AM IST
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Shatranj Ke Khilari This Day That Year Series By Pankaj Shukla 3 october 1977 Bioscope Satyajit Ray
शतरंज के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

‘बाइस्कोप’ पिछले छह महीने में मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। एक कहानी खतम तो दूजी शुरू हो गई यारों, की तर्ज पर दिमाग चलता ही रहता है। कल सलमान खान और जैकी श्रॉफ की संगीता बिजलानी को लेकर हुई कहासुनी का किस्सा था तो आज किस्सा हिंदी के दो दिग्गज साहित्यकारों का। पहले प्रेमचंद तो दूसरे शरद जोशी। दोनों अपने अपने हुनर के उस्ताद। प्रेमचंद का तमाम साहित्य मैंने अपनी मां की कोर्स की किताबों से निकालकर सातवीं तक आते आते पढ़ डाला था। शरद जोशी को पढ़ना थोड़ा शहर आने के बाद शुरू हुआ। प्रेमचंद अपनी कहन में दुनिया को दुलराते हैं। शरद जोशी चांदनी रात में आसमान में टंगे चांद की तरह हमारी दुनिया में झांकते हैं। 3 अक्टूबर को दोनों की ही फिल्में रिलीज हुईं। सन 77 में प्रेमचंद की लिखी कहानी पर बनी निर्देशक सत्यजीत रे की फिल्म रिलीज हुई ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और इसी तारीख को इसके बीस साल बाद यानी सन 97 में रिलीज हुई शरद जोशी की लिखी फिल्म ‘उड़ान’, रेखा और सैफ अली खान वाली। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ याद दिलाने के लिए इसी तर्ज पर किसी सितारे का नाम लेने की जरूरत नहीं पड़ती, इस कहानी का नाम ही काफी है। प्रेमचंद आखिर प्रेमचंद जो ठहरे।

Shatranj Ke Khilari This Day That Year Series By Pankaj Shukla 3 october 1977 Bioscope Satyajit Ray
शतरंज के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

गदर से साल भर पहले की कहानी
सत्यजीत रे ने भी जब बंगाल के भद्रलोक से बाहर आकर और दुनिया भर में अपने नाम का डंका बजते देख हिंदी सिनेमा में पैर रखने की कोशिश की तो कहानी तलाशी ऐसी जो उनके भद्रलोक की सी तो लगे पर हो गोपालकों (कैटल क्लास) के देस की। अवध में एक कहावत बहुत प्रचलित है, ‘अंग्रेज चले गए अपनी औलादें यहीं छोड़ गए..!’ सत्यजीत रे को भी कहानी वही भाई जिसमें अंग्रेजों की घोड़े जैसी तिरछी चालें हैं, रानियों के अपने जनवासे हैं, मंत्रियों की अपनी मस्तियां हैं और प्यादे सब मतवाले हैं। ये कहानी प्रेमचंद ने लिखी है एक ऐतिहासिक काल में जाकर बसाए अपने कल्पना लोक में। जैसे ‘बाहुबली’ देखते समय लगता है कि ये एक पौराणिक गाथा है लेकिन है ये एक काल्पनिक कहानी, वैसे ही ‘शतरंज के खिलाड़ी’ देखकर आपको लग सकता है कि ये एक ऐतिहासिक गाथा है पर है ये भी एक काल्पनिक कहानी।

Shatranj Ke Khilari This Day That Year Series By Pankaj Shukla 3 october 1977 Bioscope Satyajit Ray
शतरंज के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सत्यजीत ने ली सिनेमाई स्वतंत्रता
फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ की कहानी प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर आधारित है, ये हू ब हू वही कहानी नहीं है। इसमें सत्यजीत रे ने अपनी तरफ से भी सिनेमाई स्वतंत्रता ली है। कुछ किरदार अलहदा जोड़े हैं। कुछ किस्सों के रास्ते अपनी मर्जी से मोड़े हैं। कहानी अंग्रेजों के खिलाफ देश में हुए पहले गदर यानी 1857 की लड़ाई से ठीक साल भर पहले की कहानी है। अवध पर अभी नवाब वाजिद अली शाह का राज है। उसके दो अमीर (मंत्री) दुनिया से बेपरवाह हैं। दोनों शतरंज के खिलाड़ी हैं। शतरंज उनके लिए नशा है। उनको न अपनी फिक्र है, न वतन की फिक्र है और न ही इस बात की फिक्र है कि उनके जनानखाने में क्या हो रहा है? अंग्रेज रेजीडेंट सीने तक चढ़ आया है। वह नवाब के कला प्रेम को उसकी विलासिता बताकर उसका राजपाट कंपनी में शामिल करने को बेचैन है। लेकिन, वक्त उधर नवाब के दोनों अमीरों की बाजी पर ठहरा हुआ है...!

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Shatranj Ke Khilari This Day That Year Series By Pankaj Shukla 3 october 1977 Bioscope Satyajit Ray
शतरंज के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

शबाना आजमी का ये जवाब भूलेगा नहीं
फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ अपने समय की बेहतरीन फिल्म है। संजीव कुमार को दिल का दौरा पड़ने और अमजद खान के सड़क दुर्घटना में घायल होने के चलते फिल्म कई बार रुकी रही लेकिन मजाल जो किसी कलाकार ने उफ तक की हो। ऐसा था सत्यजीत रे के साथ काम करने का जादू। और, सत्यजीत रे? उन्हें अपने साथ काम करने वालों की इज्जत करना आता था। छोटे से छोटा कलाकार भी उनसे वही इज्जत पाता था जैसा कि फिल्म का बड़े से बड़ा सुपरस्टार। तभी तो हर कलाकार उनके साथ काम करने को हमेशा तैयार मिलता था। शबाना आजमी से जब फिल्म के निर्माता सुरेश जिंदल ने कहा कि आपका रोल बहुत बड़ा नहीं है फिल्म में। तो उनके बोल थे, ‘मुझे सत्यजीत रे की फिल्म में झाड़ू लेकर भी खड़ा रहना पड़े तो कुबूल है।’ सत्यजीत रे ने ये रुतबा खुद हासिल किया था, अपने काम से और अपनी लगन से। फिल्म की शूटिंग शुरू होने से महीनों पहले से वह अपने कलाकारों को चिट्ठियां लिखनी शुरू कर देते। हर सीन का डिटेल समझाते। हर किरदार की बोली समझाते और ये भी बताते कि फलां कलाकार की कैमरे के सामने चाल कैसी होनी है? सत्यजीत रे अपनी फिल्म के लिए कलाकारों का चयन करते समय सिर्फ दो बातें देखते थे, एक कलाकार की आंखें और दूसरा उसके चलने का अंदाज। इन दो कसौटियों पर जो खरा उतरा, वो सत्यजीत रे के सिनेमा का हिस्सा हो गया।

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Shatranj Ke Khilari This Day That Year Series By Pankaj Shukla 3 october 1977 Bioscope Satyajit Ray
शतरंज के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

अमृत लाल नागर के घर पर लंबी बैठक
सत्यजीत रे के साथ काम करने के अनुभवों पर फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के निर्माता सुरेश जिंदल ने एक किताब लिखी है, ‘माई एडवेंचर्स विद सत्यजीत रे – द मेकिंग ऑफ शतरंज के खिलाड़ी’। इस किताब में सुरेश ने विस्तार से इस पूरी फिल्म के बनने का सिलसिला बताया है। सत्यजीत रे की ये पहली हिंदी फिल्म थी, लेकिन इसके लिए उन्होंने कोई अलग तरकीब नहीं अपनाई। उनकी तरकीब वही रही। फिल्म शुरू होने से पहले महीनों की रिसर्च। शूटिंग शुरू होने के महीनों पहले से उनकी मेज पर किताबों का ढेर लगने लगा था। नेशनल लाइब्रेरी से किताबें आ रही थीं। कंपनी स्कूल की पेटिंग्स की प्रतिकृतियां बनकर आ रही थीं। यात्रा वृतांत खंगाले जा रहे थे। हर तरह की जो भी सूचना सन 1856 की मिल सकती थी, सब सत्यजीत रे जुटा रहे थे। यहां तक कि उस वक्त के लोगों का खाना कैसा था. उठना बैठना कैसा था, गाने वे कौन से सुनते थे। सब सत्यजीत रे ने पहले से जुटा लिया था। और इस सबकी तलाश में निर्माता और निर्देशक ने उत्तरी कलकत्ता (अब कोलकाता) की ठाकुर बाड़ियों से लेकर लखनऊ की गलियों तक की खा छानी। हैदराबाद के फलकनुमा पैलेस से लेकर जयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम तक वे गए। लखनऊ में अमृत लाल नागर के घर पर उनकी और सत्यजीत रे की लंबी मुलाकात की भी सुरेश जिंदल ने अपनी किताब में विस्तार से चर्चा की है। इस रिसर्च का ही नतीजा रही खुद बिरजू महाराज की आवाज में फिल्म की ये पेशकश, ‘कान्हा मैं तोसे हारी....’


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