आज हम आपको देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं, जिस सुनकर आप आश्चर्य में पड़ जाएंगे। आजादी के बाद देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पद पर रहते हुए भी अपने एक रिश्तेदार को सरकारी नौकरी दिलाने में असमर्थता जता दी थी। जवाबी पत्र में अफसोस जताते हुए उन्होंने यह भी लिखा था कि इतने ऊंचे पद पर रहते हुए भी नौकरी के मामले में न तो खुद कुछ कर सकता हूं और न किसी और से करा सकता हूं।
एक्सक्लूसिव: देश के पहले राष्ट्रपति नहीं लगवा सके थे अपने रिश्तेदार की नौकरी, ऐसे जताया था अफसोस
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हालांकि रेलवे की नौकरी का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी रिश्तेदार को लिखा था कि जिसके पास नियुक्ति का अधिकार है उस विभाग के अधिकारी के नाम दरखास्त भेज दें और उसमें इस बात का जिक्र अवश्य कर दें कि उनके पिता उसी विभाग में कार्यरत थे। वे उस दरखास्त को संबंधित अधिकारी को भेज देंगे।
साथ ही उन्होंने यह बात भी लिखी थी कि इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं कर सकते कि नियुक्ति हो ही जाएगी, लेकिन यह हो सकता है कि राष्ट्रपति भवन से पत्र जाने पर उस अधिकारी का ध्यान उस ओर चला जाए।
पहले राष्ट्रपति की जयंती पर तीन दिसंबर को व्यापार मंडल के पदाधिकारी मनीष सक्सेना ने यह पत्र अमर उजाला को उपलब्ध कराया था। उनको यह पत्र डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एक करीबी रिश्तेदार ने उपलब्ध कराया था।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के प्रपौत्र डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि राजनीति में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आदर्श बहुत उच्च थे। सिफारिश आदि करना उन्हें कभी पसंद नहीं रहा। उन्होंने अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए पैरवी नहीं की। सरकारी नौकरी के दौरान नियम विरुद्ध काम करने के लिए अपने परिवार के एक सदस्य के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी कर दी थी।