काकोरी कांड के महानायक पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की आज 124वीं जयंती मनाई जा रही है। आज हम इनकी खास कहानी बताने जा रहे हैं। गोरखपुर में बिस्मिल की एक अलग पहचान है। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी चार महीने और दस दिन गोरखपुर जिला जेल में बिताए थे। चौरीचौरा कांड के बाद कांग्रेस ने अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। इसके कारण बिस्मिल का इनसे मोहभंग हो गया था। इसके बाद उन्होंने चंद्रशेखर 'आजाद' के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ गोरों के सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर आरंभ किया लेकिन सवाल था कि इस प्रतिरोध के लिए शस्त्र खरीदने को धन कहां से आए? इसी का जवाब देते हुए उन्होंने नौ अगस्त 1925 को अपने साथियों के साथ एक ऑपरेशन को अंजाम दिया। उन्होंने काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाने को लूट लिया। आगे की स्लाइड्स में देखें गोरखपुर जेल की तस्वीरें...
जयंती विशेष: फांसी से पहले भावुक हो गए थे बिस्मिल, मां ने ऐसे दिया था दिलासा
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इसके थोड़े ही दिनों बाद 26 सितंबर, 1925 को पकड़ लिए गए और लखनऊ की सेंट्रल जेल की 11 नंबर की बैरक में रखे गए। मुकदमे के नाटक के बाद अशफाक उल्लाह खान, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रौशन सिंह के साथ उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई।
मौत के डर से नहीं मां, तुमसे बिछड़ने के शोक में आए हैं आंसू
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की माता मूलरानी ऐसी वीरमाता थीं जिनसे वे हमेशा प्रेरणा लेते थे। शहादत से पहले वह रामप्रसाद बिस्मिल से मिलने गोरखपुर जेल पहुंचीं तो पंडित बिस्मिल की आंखें डबडबाई गईं और वह मां से लिपटकर भावुक हो गए।