गोरखपुर सदर तहसील क्षेत्र के जंगल डुमरी नंबर दो की करीब 26 एकड़ जमीन के मामले में नया मोड़ आ गया है। जिस जमीन को तहसील प्रशासन ने लावारिस घोषित कर उसे ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया, उसके एक मूल खातेदार स्वर्गीय केदारनाथ मुखर्जी को पद्म भूषण सम्मान मिल चुका है। उन्हें यह सम्मान पांच अक्तूबर 1971 को पूर्व राष्ट्रपति वराहगिरि वेंकट गिरि ने उद्योग एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए दिया था। सात साल पहले ही केदारनाथ का निधन हुआ। उनके इकलौते वारिस आलोक कृष्ण मुखर्जी जिंदा हैं। पूर्व में हुई कार्रवाई और शिकायत करने वाले रिटायर्ड पीसीएस अधिकारी, दोनों की अपनी-अपनी दलीलों के बीच अब इस मामले में का सच उच्चस्तरीय जांच के बाद ही सामने आएगा।
गोरखपुर: जिन्हें राष्ट्रपति ने पद्म भूषण से किया सम्मानित, तहसील ने उनकी जमीन बता दी लावारिस
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सोशल मीडिया पर इस भवन की फोटो और वीडियो भी मौजूद है। इस पूरे मामले को लेकर वर्ष 2018 में राजस्व परिषद के उप भूमि व्यवस्था आयुक्त पद से सेवानिवृत्त हुए पीसीएस अधिकारी पुनीत शुक्ला ने मुख्यमंत्री से शिकायत भी की है। 22 सितंबर 2022 को भेजे गए अपने शिकायती पत्र में उन्होंने सदर तहसील प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए जांच कर कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि तहसील प्रशासन ने राजस्व नियमों की अनदेखी कर ऐसे लोगों की जमीन ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दी जिनके वारिस न केवल जीवित हैं बल्कि, गोरखपुर तहसील पहुंचकर वरासत के लिए आवेदन भी कर चुके हैं। अभिलेखों को ध्यान में रखकर पूर्व तहसीलदार ने वरासत भी कर दी थी लेकिन, जिला प्रशासन ने फिर वरासत संबंधी आदेश को खारिज कर दिया।
पलटते रहे आदेश, जमीन की वरासत भी हुई, पर बाद में खारिज कर दी गई
कोलकाता के रहने वाले अतुल कृष्ण बनर्जी व अन्य के नाम से राजस्व अभिलेखों में दर्ज जंगल डुमरी नंबर-दो की करीब 26 एकड़ जमीन को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट/एसडीएम सदर ने फरवरी 2020 में लावारिस घोषित करते हुए इसे ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दिया। दलील दी गई कि संबंधित नाम का कोई भी व्यक्ति यहां या कोलकाता में बताए पते पर रहता ही नहीं। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ने एक साल के लिए इस जमीन को पट्टे पर नगर-निगम को दे दिया। नगर-निगम उस जमीन पर कुछ करता कि आठ महीने बाद सितंबर 2020 में ही जमीन को वेटरेनरी कॉलेज के नाम आवंटित कर दिया गया। जमीन तो वेटरेनरी कॉलेज के नाम आवंटित हो गई लेकिन, क्षेत्रफल कम होने की वजह से इस पर अंतिम मुहर नहीं लग सकी।
दो साल नहीं बीते कि 2022 में मूल खातेदारों स्व. केदारनाथ मुखर्जी और शैलेंद्र नाथ बनर्जी के वारिस सामने आ गए। इसके बाद सदर तहसील के तहसीलदार न्यायिक कोर्ट ने पूर्व के आदेश को खारिज कर मई 2022 में मूल खातेदार केदारनाथ मुखर्जी के वारिस आलोक कुमार मुखर्जी, कोलकाता और शैलेंद्र नाथ बनर्जी के पौत्र गौतम बनर्जी के नाम मई 2022 में जमीन वरासत कर दी।
जिन वारिसों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हुए अभी वे कुछ कर पाते, इससे पहले फिर डीएम के आदेश के क्रम में जमीन का दोबारा अधिग्रहण कर लिया गया और राजस्व अभिलेखों में जमीन उद्यान विभाग के नाम दर्ज कर दी गई। शिकायत पर जांच शुरू हुई तो वरासत संबंधी आदेश को भी खारिज कर दिया गया और ग्राम सभा के नाम दर्ज जमीन की वरासत करने के मामले में न्यायिक तहसीलदार वीरेंद्र प्रसाद गुप्ता का पहले चौरीचौरा तबादला किया गया और फिर बाद में उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया।
सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी व शिकायतकर्ता पुनीत शुक्ला ने कहा कि मामले में राजस्व अधिनियमों की अनदेखी की गई। एक ऐसे व्यक्ति की जमीन को लावारिस घोषित कर दिया गया जिसे पद्म भूषण सम्मान मिल चुका है। उनके वारिस भी जिंदा हैं। वरासत के लिए उन्होंने आवेदन भी किया था। सारे जरूरी दस्तावेज भी जमा किए। मगर मामले में सिर्फ मनमानी की गई। पहले जमीन ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दी गई, फिर वरासत हुई तो उस आदेश को ही खारिज कर दिया गया। सोशल मीडिया के जरिए मुझे मामले की जानकारी हुई। जब मामले की तह तक गया तो सारी गड़बड़ी सामने आई। नियम क्या कहते हैं, समेत सभी जरूरी साक्ष्यों के साथ मामले की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की है। जरूरत पड़ी तो लोकायुक्त के पास भी शिकायत करूंगा। पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए।
डीएम कृष्णा करुणेश ने कहा कि मामला पहले का है। न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ा है। शिकायत के संबंध में जानकारी नहीं है। मूल खातेदार के वारिस ने भी इस संबंध में कभी मुझसे मुलाकात या शिकायत नहीं की। वे जरूरी अभिलेखों के साथ अपना पक्ष रखें या शिकायत करें, जांच कराई जाएगी। करीब डेढ़ महीने पूर्व गलत तरीके से वरासत होने का मामला सामने आया था। इसके लिए जांच कमेटी बनाई गई थी। कमेटी की जांच रिपोर्ट में पूर्व न्यायिक तहसीलदार की लापरवाही सामने आई थी। राजस्व परिषद के निर्देश पर उन्हें परिषद से संबद्ध किया जा चुका है।
स्व. केदानाथ मुखर्जी के पौत्र राज मुखर्जी ने बताया कि वरासत के लिए हम लोगों ने पहले ऑनलाइन आवेदन किया था। फिर सभी दस्तावेजों के साथ गोरखपुर सदर तहसील में गए भी थे। इसके सभी प्रमाण हैं। एयर टिकट भी पास है। प्रशासनिक अधिकारियों से इसलिए नहीं मिले क्योंकि मामला न्यायिक है। तहसीलदार कोर्ट को हम लोगों ने सभी जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए। मेरे पिता आलोक मुखर्जी भी उस दौरान वहां मौजूद रहे। हमारे नाम वरासत भी हुई लेकिन, बाद में उसे निरस्त कर दिया गया। कोलकाता लौटने पर हमें इसकी जानकारी हुई। यह पूरी कार्रवाई सदमा देने वाली है। मेरे बाबा और मेरे बुजुर्ग पिता की सामाजिक पहचान, प्रतिष्ठा और उम्र का भी ख्याल नहीं किया गया और नियमों की अनदेखी कर न केवल जमीन ग्राम सभा के नाम दर्ज कर दी गई बल्कि वरासत भी खारिज कर दी गई।