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विशेषज्ञों की सलाह: हवा में घुले वायरस बच्चों को कर रहे बीमार, बदलते मौसम में बढ़ा बीमारियों का खतरा, ऐसे करें बचाव
अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
Published by: vivek shukla
Updated Mon, 13 Sep 2021 11:51 AM IST
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सीएमओ डॉ. सुधाकर पांडेय, डॉ. भूपेंद्र शर्मा, डॉ. जेएसपी सिंह।
- फोटो : अमर उजाला।
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बदलते मौसम में बच्चे वायरल फीवर, इंसेफेलाइटिस, निमोनिया, डायरिया और उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। बीआरडी मेडिकल कॉलेज से लेकर जिला अस्पताल तक में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जेएसपी सिंह का कहना है कि कई वायरस हवा में घुलकर बच्चों को बीमार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में इस मौसम में बच्चों को बचाने के साथ उनका नियमित टीकाकरण जरूर कराएं। टीका कई वायरस को खत्म कर रहा है। राहत की बात यह है कि इंसेफेलाइटिस को छोड़कर अब तक अन्य किसी बीमारी से किसी बच्चे की मौत नहीं हुई है। वायरल फीवर से पीड़ित बच्चे सप्ताह भर के अंदर ठीक हो जा रहे हैं। पेश है वायरस और उनसे बचाव के लिए टीकाकरण की पूरी रिपोर्ट...
प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला।
आरएसी वायरस
यह कॉमन रेसिपेरेटरी वायरस है। इससे संक्रमित होने पर ठंड जैसे लक्षण नजर आते हैं। इससे ठीक होने में एक से दो सप्ताह का समय लगता है। यह नवजात से लेकर बड़ों तक सभी को संक्रमण की चपेट में लेता है। यह वायरस ब्रॉकोलाइटिस का मुख्य कारण है। इससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है। समय से इलाज न होने पर निमोनिया का रूप ले लेता है, जो जानलेवा साबित होता है।
यह कॉमन रेसिपेरेटरी वायरस है। इससे संक्रमित होने पर ठंड जैसे लक्षण नजर आते हैं। इससे ठीक होने में एक से दो सप्ताह का समय लगता है। यह नवजात से लेकर बड़ों तक सभी को संक्रमण की चपेट में लेता है। यह वायरस ब्रॉकोलाइटिस का मुख्य कारण है। इससे फेफड़ों में सूजन आ जाती है। समय से इलाज न होने पर निमोनिया का रूप ले लेता है, जो जानलेवा साबित होता है।
प्रतीकात्मक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला।
रोटा वायरस
यह डायरिया का वायरस है और नवजात और छोटे बच्चों में ज्यादा फैलता है। इसकी चपेट में आने के बाद बच्चे उल्टी-दस्त, बुखार और पेट दर्द के शिकार हो जाते हैं। यह गदंगी, हाथ और मल के जरिए फैलता है। समय से इलाज न होने पर मरीज की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। यह वायरस बड़ों को भी बीमार बना देता है।
यह डायरिया का वायरस है और नवजात और छोटे बच्चों में ज्यादा फैलता है। इसकी चपेट में आने के बाद बच्चे उल्टी-दस्त, बुखार और पेट दर्द के शिकार हो जाते हैं। यह गदंगी, हाथ और मल के जरिए फैलता है। समय से इलाज न होने पर मरीज की स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। यह वायरस बड़ों को भी बीमार बना देता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला।
खसरा
इसे विज्ञान की भाषा में मिजिल्स भी कहा जाता है। यह वायरस जनित रोग है। इसके वायरस की चपेट में आने से बच्चों में बुखार, आंखें लाल होना, मुंह के अंदर सफेद धब्बे होना, शरीर पर लाल दाने आने की समस्या होती है। इस वायरस का टीका महिला अस्पताल से लेकर एम्स तक में उपलब्ध है। अब इसके दो डोज बच्चों को लगाई जाती है।
इसे विज्ञान की भाषा में मिजिल्स भी कहा जाता है। यह वायरस जनित रोग है। इसके वायरस की चपेट में आने से बच्चों में बुखार, आंखें लाल होना, मुंह के अंदर सफेद धब्बे होना, शरीर पर लाल दाने आने की समस्या होती है। इस वायरस का टीका महिला अस्पताल से लेकर एम्स तक में उपलब्ध है। अब इसके दो डोज बच्चों को लगाई जाती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला।
एईएस
इसका पूरा नाम एक्टयू इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम है। इसे दिमागी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। यह जापानी इंसेफेलाइटिस नामक वायरस से होने वाली बीमारी है, जो मच्छरों के काटने से होती है। यह वायरस सूअरों और जलपक्षियों से भी पैदा होता है। पूर्वांचल में यह बीमारी पालतू जानवरों से भी फैल रही है। पालतू जानवरों में जू (किलनी) इसका मुख्य कारण है। इसकी वजह से बच्चे स्क्रब टाइफस की चपेट में आ रहे हैं। इस साल अब तक 123 मरीज इंसेफेलाइटिस के आ चुके हैं। इनमें नौ मरीजों की मौत भी हो चुकी है।
इसका पूरा नाम एक्टयू इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम है। इसे दिमागी बुखार के नाम से भी जाना जाता है। यह जापानी इंसेफेलाइटिस नामक वायरस से होने वाली बीमारी है, जो मच्छरों के काटने से होती है। यह वायरस सूअरों और जलपक्षियों से भी पैदा होता है। पूर्वांचल में यह बीमारी पालतू जानवरों से भी फैल रही है। पालतू जानवरों में जू (किलनी) इसका मुख्य कारण है। इसकी वजह से बच्चे स्क्रब टाइफस की चपेट में आ रहे हैं। इस साल अब तक 123 मरीज इंसेफेलाइटिस के आ चुके हैं। इनमें नौ मरीजों की मौत भी हो चुकी है।