‘आने वाली नस्लें तुम पर फख्र करेंगी हम-असरों, जब भी उनको ध्यान आएगा तुमने फिराक को देखा है।’ मशहूर शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी की कलम से लिखीं ये पंक्तियां आज काफी कुछ हकीकत सी बयां करती हैं। उर्दू अदब की दुनिया में जिन नामों ने गोरखपुर को राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, उनमें फिराक साहब का नाम सबसे पहले और पूरे अदब के साथ लिया जाता है।
फिराक गोरखपुरी की जयंती पर विशेष: 'ऐ मौत आके खामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अंदर गूंजते रहेंगे हम'
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उन्होंने अपने नाम के आगे गोरखपुरी जोड़कर गोरखपुर को अदब की दुनिया में अमर कर दिया। फिराक साहब बागी तेवर के साथ ही जिंदादिली व नेकदिली के भी मिसाल रहे। इन्हीं वजहों से वह उर्दू शायरी के अजीम शायर के रूप में न केवल मशहूर हुए बल्कि एक ऐसे मुकाम पर पहुंचे जहां हर शायर को पहुंचने की ख्वाहिश होती है। अदब की दुनिया के फनकार कहे जाने वाले फिराक गोरखपुरी का नाम देश-दुनिया में भले ही सम्मान से लिया जाता हो, लेकिन हुक्मरानों और अफसरानों की उदासीनता के चलते उनके पैतृक आवास व उनसे जुड़ी यादें धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
यह विडंबना ही है कि गोरखपुर का नाम देश-दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर फिराक साहब की जयंती हो या पुण्यतिथि सिर्फ बातों में ही गुजर जाती है। हुक्मरान से लेकर अफसरान तक किसी को फुरसत नहीं कि उनकी याद में कोई ऐसा आयोजन करें जो उनको सच्ची श्रद्धांजलि देने के साथ ही नई पीढ़ी को फिराक साहब के जीवन से जुड़ी यादों व साहित्य की दुनिया से रूबरू करा सके। गोला तहसील क्षेत्र के बनवारपार निवासी पेशे से वकील मुंशी गोरख प्रसाद इबरत के पुत्र के रूप में 28 अगस्त 1896 में रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी का जन्म हुआ था। फिराक साहब के पिता पेशे से वकील भले ही थे, लेकिन शायरी में उनका अच्छा दखल था। या यूं कहें कि फिराक साहब को शायरी विरासत में मिली थी।
बचपन का बड़ा हिस्सा बनवारपार में गुजारने के बाद फिराक साहब ने प्रयागराज विश्वविद्यालय से पढ़ाई मुकम्मल की। वर्ष 1930 में अंग्रेजी साहित्य से एमए करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही उन्होंने ने 1930 से 1959 तक अंग्रेजी शिक्षक की जिम्मेदारी संभाली। अंग्रेजी पढ़ने व पढ़ाने वाले फिराक साहब ने न सिर्फ कालजयी रचनाओं के लिए ज्ञानपीठ, पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान हासिल किए बल्कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की भूमिका निभाते हुए आने वाली नस्लों को मनन करने के लिए बहुत कुछ छोड़ गए। फिराक साहब 3 मार्च 1982 को अंतिम सांस लेकर दुनिया को अलविदा कह गए।
बनवारपार वालों को उपेक्षित हाल में नजर आने वाले फिराक गोरखपुरी का पैतृक आवास देखकर बेहद मलाल होता है। उनकी पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब जयंती या पुण्यतिथि पर भी इस स्थान पर फिराक की याद में कोई आयोजन नहीं होता। फिराक लाइब्रेरी के पास लगी उनकी प्रतिमा पर फिराक साहब सेवा संस्थान के अध्यक्ष डॉ. छोटेलाल यादव सरीखे कुछ चंद लोगों के अलावा कोई भी जिम्मेदार श्रद्धा के दो फूल तक चढ़ाने के लिए नहीं पहुंचता। हालांकि उनकी अजीम शख्सियत ऐसी किसी पहचान की मोहताज नहीं है। जबकि फिराक साहब ने लिखा है, ‘ऐ मौत आके खामोश कर गई तू, सदियों दिलों के अंदर गूंजते रहेंगे हम।’