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Winter Health Tips: सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है निमोनिया होने का खतरा? ये उपाय रखेंगे आपको सुरक्षित

हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिलाष श्रीवास्तव Updated Sat, 10 Jan 2026 08:55 PM IST
सार

  • निमोनिया फेफड़ों का एक संक्रमण है, जिसमें फेफड़ों की एयर सैक्स में सूजन आ जाती है और उनमें पानी या मवाद भर सकता है। इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। बच्चों और बुजुर्गों में इम्यून सिस्टम कमजोर होने के कारण यह संक्रमण तेजी से फैल सकता है

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ठंड के दिनों में निमोनिया का खतरा - फोटो : Freepik.com

देश के ज्यादातर हिस्से इन दिनों भीषण ठंड और शीतलहर का प्रकोप झेल रहे हैं। कोहरा और लगातार गिरते तापमान के कारण जनजीवन काफी प्रभावित हुआ है। उत्तर भारत में ठंड का असर ज्यादा देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, सर्दियों का ये मौसम आपकी सेहत के लिए कई प्रकार की दिक्कतें बढ़ाने वाला हो सकता है। बढ़ते तापमान के कारण ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल बढ़ने का भी जोखिम रहता है, जिसको लेकर सभी लोगों को सावधान रहने की सलाह दी जाती है।



अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस तरह से सर्दियों में हार्ट अटैक के मामले काफी बढ़ जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, हार्ट के साथ-साथ ये मौसम सांस से संबंधित दिक्कतों को भी बढ़ाने वाला हो सकता है। सर्दियों में थोड़ी सी लापरवाही आपको निमोनिया का शिकार बना सकती है, जिसे लेकर भी सभी लोगों को निरंतर सावधानी बरतते रहना चाहिए।

आइए जानते हैं आप निमोनिया से बचे रहने के लिए क्या तरीके अपना सकते हैं?

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निमोनिया और सांस की समस्याएं - फोटो : Freepik.com

ठंड के दिनों में बढ़ जाती हैं सांस की समस्याएं

श्वसन रोग विशेषज्ञ बताते हैं, ठंड का मौसम आते ही सांस से जुड़ी समस्याएं भी तेजी से बढ़ने लगती हैं। ठंडी हवा, बढ़ता प्रदूषण, बंद कमरों में ज्यादा समय बिताना आपके श्वसन तंत्र और फेफड़ों पर नकारात्मक असर डालने वाला हो सकता है, यही कारण है कि ठंड के दिनों में निमोनिया संक्रमण के मामले बढ़ जाते हैं।

सर्दियों में बैक्टीरिया और वायरस भी ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जो कमजोर इम्युनिटी पाते ही आपके फेफड़ों पर अटैक करके उन्हें संक्रमित कर देते हैं और निमोनिया का कारण बन सकते हैं। निमोनिया पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए और इसका इलाज न हो पाए तो इससे जान जाने का भी खतरा बढ़ जाता है।

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फेफड़ों में संक्रमण का खतरा - फोटो : Freepik.com

निमोनिया के बारे में जान लीजिए

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, निमोनिया फेफड़ों का एक संक्रमण है, जिसमें फेफड़ों की वायु थैलियों (एल्वियोली) में तरल या मवाद भर जाता है। इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलने में कठिनाई होने लगती है। निमोनिया के कारण तेज बुखार, लगातार खांसी आने, सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द, ठंड लगने, कमजोरी जैसे लक्षण दिख सकते हैं। गंभीर मामलों में ऑक्सीजन की कमी के कारण होंठ या नाखून नीले पड़ने लगते हैं।
 

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के बच्चों और 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों में निमोनिया से मृत्यु का खतरा ज्यादा रहता है। 
  • सर्दियों में ठंडी हवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचकर उनकी सुरक्षा परत को कमजोर कर देती है। इससे बैक्टीरिया और वायरस आसानी से फेफड़ों में संक्रमण फैला देते हैं। 
  • इसके अलावा, लोग ठंड से बचने के लिए बंद कमरों में रहते हैं, जहां हवा का संचार कम होता है और संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
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बच्चों में निमोनिया - फोटो : Freepik.com

बच्चों और बुजुर्गों क्यों होते हैं ज्यादा शिकार?

अक्सर देखा गया है कि निमोनिया के ज्यादातर मामले बच्चे और बुजुर्गों में होते हैं। 

  • बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता जिससे कोई भी संक्रमण उन्हें आसानी से अपनी चपेट में ले सकता है।
  • बुजुर्गों में उम्र के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, जिसके चलते उनके बीमार पड़ने का खतरा भी अधिक हो सकता है।
  • इतना ही नहीं पहले से ही कुछ तरह की बीमारियों जैसे डायबिटीज, अस्थमा, हृदय रोग या सीओपीडी के शिकार लोगों में भी निमोनिया का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
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निमोनिया रोग से बचाव कैसे करें? - फोटो : Adobe Stock

निमोनिया से बचाव के लिए क्या करें?

आप कुछ सावधानियां बरतकर आसानी से निमोनिया से बचाव कर सकते हैं। 

  • निमोनिया से बचाव के लिए बच्चों और बुजुर्गों को समय पर निमोनिया और फ्लू का टीका लगवाने की सलाह दी जाती है।
  • ठंड के दिनों में शरीर को गर्म रखें, संतुलित आहार लें और विटामिन-प्रोटीन युक्त भोजन शामिल करें। 
  • हाथों की नियमित सफाई करें। भीड़भाड़ से बचाव और धूम्रपान से दूरी जरूरी है। 
  • सांस से जुड़ी कोई भी समस्या अगर लंबे समय तक बनी रहे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, ताकि समय रहते गंभीर स्थिति से बचा जा सके।



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नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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