फैशन की दुनिया में राजधानी के युवा डिजाइनरों की धाक लगातार बढ़ती जा रही है। खास बात है कि इनकी सोच में, इनके काम में लखनऊ झलकता है। माता-पिता चाहते थे कि ये सरकारी नौकरी में जाएं। अपने लिए कॅरिअर का एक निश्चित विकल्प चुनें, लेकिन इन्होंने पैशन को कॅरिअर बनाया। माता-पिता के संशय को समझा, उन्हें बेहतर रिजल्ट दिया और यकीन दिला दिया कि सिर्फ नौकरी ही विकल्प नहीं। जुनून और शौक को यदि एक सही दिशा मिल जाए तो वो भी मंजिल पा सकता है। आइए मिलते हैं शहर के युवा, जुनूनी डिजाइनरों से।
ये हैं शहर के यूथ आइकॉन, फैशन डिजाइनिंग की दुनिया में जमाई लखनऊ की धाक
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राहुल शास्त्री
मैं लखनवी हूं और यहीं रहकर काम करता हूं। यह बात मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाती है। एनआईएफटी करने के बाद दिल्ली चला गया नौकरी करने। सब्यसाची मुखर्जी एसेसरीज ब्रांड लॉन्च कर रहे थे, उसे शुरू करने का मौका मिला। 3.5 साल तक उनके साथ काम करने के बाद मैं लौट आया, क्योंकि मुझे खुद कुछ करना था। पापा अश्विनी कुमार शास्त्री और मां शशिबाला को जब बताया कि मैं जूते डिजाइन करूंगा तो सबको आश्चर्य हुआ। लोगों ने तो यहां तक कहा कि मोची बनोगे क्या? खैर मैंने उस बात को सच करने की ठानी थी कि ‘जूते इतने चमकने चाहिए कि उसमें चेहरा नजर आए।’ मैंने अपना ब्रांड लॉन्च किया और मैं गर्व से कह सकता हूं कि मेरे जूते की चमक में चेहरा दिखता है।
मेरा फोकस : इंडियन शू डिजाइनर के चाहने वाले विदेशों में भी हैं। हां, फिलहाल मेरी ब्रांड की पहुंच सेलीब्रेटी तक है। मैं जूतों में भी एक अनूठापन विकसित कर पाया हूं। सैफ अली खान भी मेरे जूतों के मुरीद हैं और एडवर्ड लम्पूरिया भी हमारे क्लाइंट हैं।
अनन्या रस्तोगी
बनना तो फैशन डिजाइनर ही चाहती थी, लेकिन कुछ हालात ऐसे थे कि मुझे इतिहास और राजनीतिक विज्ञान में पढ़ाई करनी पड़ी। दिल्ली में जब पढ़ रही थी तभी रिश्तेदारों, दोस्तों के लिए शौकिया ड्रेस डिजाइन कर दिया करती थी। पापा आजाद रस्तोगी और मां कुमकुम रस्तोगी ने फैशन डिजाइनर बनने के मेरे कॅरिअर को लेकर मुझसे विचार करने को कहा था, लेकिन मेरी राहें तय थीं। कुछ समय तक दिल्ली में फैशन डिजाइनरों के साथ काम कर लखनऊ लौट आई और अपना ब्रांड लॉन्च कर दिया महज छह महीने के भीतर क्लाइंट के रिस्पॉन्स ने मेरे आत्मविश्वास को बढ़ा दिया है।
मेरा काम : मेरा फोकस यंग क्राउड पर है। मैं लखनऊ के युवाओं की पर्सनालिटी को एक नया शेप देना चाहती हूं, खासकर महिलाओं को। मेरा कलेक्शन कॉकटेल और इंडोवेस्टर्न कलेक्शन है। मेरे ड्रेस की खासियत है कि इसमें महिलाओं की आजादी, उनका आत्मविश्वास नजर आता है।
- मनीष त्रिपाठी
तय था कि मुझे फैशन डिजाइनर बनना है, क्योंकि मैं मशहूर होना चाहता था। दूसरी ओर मेरे कॅरिअर को लेकर पापा का संशय और उनकी चिंता मुझे लगातार खुद को साबित करने की प्रेरणा दे रही थी। पापा हरिओम त्रिपाठी सरकारी नौकरी से रिटायर हैं और मां प्रेम त्रिपाठी गृहिणी हैं। हर अभिभावक की तरह वे भी चाहते थे कि सरकारी नौकरी करूं, शांत और स्थिर जीवन व्यतीत करूं। इसी बीच पढ़ाई करते-करते मैंने काम करना शुरू कर दिया। मुझे क्लाइंट मिलने लगे और उन्होंने मेरे अच्छे-बुरे काम को अपनाया इसलिए मेरे गुरु, मेरी प्रेरणा मेरे क्लाइंट ही हैं। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य, मुझे काम खुद के नाम पर ही मिला और आज क्रिकेटर, राजनेता और बॉलीवुड स्टार मेरे क्लाइंट हैं।
खासियत
हम कपड़े इसलिए नहीं बनाते कि उसे बेचना है। हम स्टाइल स्टेटमेंट बनाते हैं। हम ट्रेंड सेट करते हैं क्लाइंट की पर्सनालिटी के हिसाब से। जो उस पर फबेगा हम वही बनाएंगे। सिर्फ बनाने के लिए परिधान हम नहीं बनाते हैं। हमारा कलेक्शन महिला और पुरुष दोनों के लिए है।
ब्राइडल कलेक्शन के महारथी
- अभिषेक कुमार
सोचा तो नहीं था कि फैशन डिजाइनर बनूंगा। हां, मेरी क्रिएटिविटी की तारीफ हर कोई करता था। मेरी मेंटर फैशन डिजाइनर शिप्रा आनंद ने इसे पहचाना। उन तक पहुंचने की राह दिखाई दोस्त मनीष त्रिपाठी ने। पापा बीडी भास्कर बैंक अफसर हैं मां विजय लक्ष्मी हाउस वाइफ हैं। जब मैंने कहा कि मुझे फैशन डिजाइनर बनना है तो उन्होंने कुछ कहा तो नहीं पर ये भी सच है कि हर माता-पिता के लिए इसे एक कॅरिअर के विकल्प के रूप में स्वीकार करना मुश्किल होता है। कोर्स पूरा करने के बाद मैं मुंबई चला गया, वहां नीता लूला को मेरा काम पसंद आया। विक्रम भट्ट की फिल्म से जुड़ा और फिर चंद्रगुप्त मौर्या धारावाहिक से कुछ समय तक जुड़ा रहा। मुझे लखनऊ आना था, लौट आया और अपना ब्रांड शुरू कर दिया।
मेरा फोकस
मेरा पूरा कलेक्शन यंग ब्राइड कलेक्शन है। मैं उनके लिए काम करता हूं जो दुल्हनें ड्रेस में एक्सपेरीमेंट पसंद करती हैं। लखनऊ आने से पहले मुझे पता चला कि यहां के लोग दिल्ली जाकर खरीदारी करते हैं। मैं चाहता हूं कि यहां के लोगों के बजट के हिसाब से मैं हर कि सी क्लाइंट को डिजाइनर ड्रेस उपलब्ध करा सकूं।