सागर जिले के देवरी में सदियों पुरानी लोक-आस्था और परंपरा के प्रतीक श्री देव खंडेराव महाराज का अग्नि मेला आज से विधिवत प्रारंभ हो गया। मंदिर प्रांगण में सुबह से ही श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा रहा। पहले दिन ही हजारों भक्तों ने अग्निकुंड और मंदिर में दर्शन कर पूजा-अर्चना की। इस वर्ष अग्नि मेला 26 नवंबर से 5 दिसंबर तक आयोजित होगा। नगर में पिछले कई दिनों से चल रही तैयारियां अब पूर्ण हो चुकी हैं और पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण है।
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सागर अग्नि मेला: अंगारों पर चलने की 400 साल पुरानी परंपरा, राजा के सपने से हुई थी शुरुआत, क्या है पूरी कहानी?
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
Published by: अर्पित याज्ञनिक
Updated Sat, 29 Nov 2025 10:33 AM IST
सार
26 नवंबर से 5 दिसंबर तक चलने वाले इस मेले में प्रतिदिन 100 से अधिक श्रद्धालु और कुल लगभग 1300 भक्त धधकते अग्निकुंड पर नंगे पैर चलकर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने का धन्यवाद अर्पित करेंगे।
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श्री देव खंडेराव महाराज का अग्नि मेला।
- फोटो : अमर उजाला
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देव खंडेराव महाराज।
- फोटो : अमर उजाला
अग्नि मेला में इस वर्ष भी आस्था, विश्वास और साहस का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। 10 दिनों तक चलने वाले इस मेले में लगभग 1300 श्रद्धालु धधकते अग्निकुंड पर निडर होकर आस्था की दौड़ लगाएंगे। लगभग 400 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में भक्त तपते अग्निकुंड से बिना किसी चोट या जलन के सुरक्षित बाहर निकलते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं मानना है “जब आस्था साथ हो, तो धधकते अंगारे भी फूलों सा स्पर्श देते हैं।”
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धधकते अंगारों की पूजा करते श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
सागर से 65 किमी दक्षिण और नरसिंहपुर से 75 किमी उत्तर स्थित देवरी का यह प्राचीन मंदिर मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान है। अगहन माह में लगने वाला यह मेला चंपा षष्ठी से पूर्णिमा तक चलता है। मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त नंगे पैर धधकते अंगारों पर चलकर भगवान खंडेराव महाराज को धन्यवाद अर्पित करते हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार इस वर्ष 135 अग्निभट्टियां तैयार की गई हैं। प्रतिदिन 100–125 श्रद्धालु अग्निकुंड से गुजरेंगे और पूर्णिमा तक यह संख्या 1300 तक पहुंचने की संभावना है।
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धधकते अंगारों की कतार।
- फोटो : अमर उजाला
भगवान शिव का अवतार हैं देव श्री खंडेराव
ऐसा अनुमान है कि ये मंदिर 15-16वीं शताब्दी के दौरान निर्मित हुआ था, जिसमें देव श्री खंडेराव घोड़े पर सवार हैं और आधे रूप में माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भगवान देव श्री खंडेराव को शिव का अवतार मानते हैं। देवरी के मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग भी स्थित है और मंदिर के बाहर नंदी की प्रतिमा भी स्थित है। मंदिर परिसर में एक विशाल बावड़ी और देवी देवताओं की भी प्रतिमाएं विद्यमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में बने शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग बताया जाता है।
ऐसा अनुमान है कि ये मंदिर 15-16वीं शताब्दी के दौरान निर्मित हुआ था, जिसमें देव श्री खंडेराव घोड़े पर सवार हैं और आधे रूप में माता पार्वती के साथ विराजमान हैं। भगवान देव श्री खंडेराव को शिव का अवतार मानते हैं। देवरी के मंदिर के गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग भी स्थित है और मंदिर के बाहर नंदी की प्रतिमा भी स्थित है। मंदिर परिसर में एक विशाल बावड़ी और देवी देवताओं की भी प्रतिमाएं विद्यमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में बने शिवलिंग को स्वयंभू शिवलिंग बताया जाता है।
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अंगारों पर चलकर आए श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला
राजा रसाल ने की थी मेले की शुरुआत
मेले की शुरुआत राजा रसाल जाजोरी ने की थी और उन्होंने ही मंदिर का निर्माण कराया था। किवदंती है कि राजा का पुत्र एक बार बीमार हो गया था। तब उन्होंने देव श्री खंडेराव से मनोकामना मांगी थी। राजा को सपने में देव श्री खंडेराव ने दर्शन दिए और कहा कि मंदिर में अग्निकुंड से नंगे पैर निकलोगे तो उनकी मनोकामना पूरी होगी। राजा रसाल ने सपने में मिली प्रेरणा अनुसार काम किया और उनका बेटा स्वस्थ हो गया। तब से परंपरा लगातार चली आ रही है।
मेले की शुरुआत राजा रसाल जाजोरी ने की थी और उन्होंने ही मंदिर का निर्माण कराया था। किवदंती है कि राजा का पुत्र एक बार बीमार हो गया था। तब उन्होंने देव श्री खंडेराव से मनोकामना मांगी थी। राजा को सपने में देव श्री खंडेराव ने दर्शन दिए और कहा कि मंदिर में अग्निकुंड से नंगे पैर निकलोगे तो उनकी मनोकामना पूरी होगी। राजा रसाल ने सपने में मिली प्रेरणा अनुसार काम किया और उनका बेटा स्वस्थ हो गया। तब से परंपरा लगातार चली आ रही है।

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