शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले... यह कारगिल के रणबांकुरों की अमर गाथा का जीवंत सच है। आज 27 वर्ष के बाद भी कारगिल के वीरों का शौर्य नई पीढ़ी की रगों में देशभक्ति का जोश भर रहा है। कई कारगिल योद्धाओं के बेटे सीमा पर देश के प्रहरी बनकर खड़े हैं, तो गांवों के युवा उनकी राह पर चलकर भारतीय सेना में शामिल हो रहे हैं। कारगिल युद्ध के हीरो परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी राष्ट्रसेवा के अपने संकल्प पर अडिग हैं। वह नई पीढ़ी को न केवल सेना के लिए तैयार कर रहे हैं, बल्कि नशे से दूर रखने के लिए भी अभियान चला रहे हैं।
{"_id":"6a65b7049ebb234e140a0172","slug":"kargil-vijay-diwas-2026-sanjay-kumar-vikram-batra-saurabh-kalia-youth-inspiration-2026-07-26","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल के रणबांकुरों की अमर गाथा, नई पीढ़ी में देशभक्ति की लौ जगा रहे युद्ध के वीर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kargil Vijay Diwas 2026: कारगिल के रणबांकुरों की अमर गाथा, नई पीढ़ी में देशभक्ति की लौ जगा रहे युद्ध के वीर
Sun, 26 Jul 2026 12:58 PM IST
Ankesh Dogra
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला नेटवर्क, शिमला
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 26 Jul 2026 12:58 PM IST
सार
कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर कारगिल के वीरों की अमर गाथा एक बार फिर चर्चा में है। परमवीर चक्र विजेता संजय कुमार युवाओं को सेना और राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कैप्टन विक्रम बतरा की वीरगाथा अब हिमाचल के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी। वहीं शहीद डोला राम की प्रेरणा से क्षेत्र के कई युवा सेना में भर्ती हुए हैं। कारगिल के वीर आज भी नई पीढ़ी में देशभक्ति का जोश भर रहे हैं।
विज्ञापन
कारगिल विजय दिवस
- फोटो : एडोब स्टॉक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कारगिल के हीरो नई पौध में भर रहे देशभक्ति
परमवीर चक्र से अलंकृत ऑनररी कैप्टन संजय कुमार।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
सैनिक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, उसकी रगों में बहता देशभक्ति का जुनून ताउम्र देश के काम आता है। इसे चरितार्थ कर रहे हैं कारगिल युद्ध के वास्तविक नायक एवं देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत ऑनररी कैप्टन संजय कुमार। सरहद पर वर्षों तक देश की सेवा करने के बाद अब वे भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन कर रहे हैं। युद्ध भूमि में दुश्मन के दांत खट्टे करने वाले इस वीर योद्धा का जज्बा आज भी वही है।
वर्तमान में वे देशभर के स्कूल, कॉलेज और सामाजिक मंचों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रसेवा, अनुशासन और नशे खासकर चिट्टे जैसी सामाजिक बुराई से दूर रहने के लिए निरंतर प्रेरित कर रहे हैं। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर विशेष बातचीत में कैप्टन (मानद) संजय कुमार ने बताया कि वह युवाओं के बीच जाकर उनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने का कार्य कर रहे हैं। वह एक माह में औसतन 4 से 5 कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं। इनमें जब वे बच्चों और युवाओं से रूबरू होते हैं, तो उनका मुख्य उद्देश्य भावी पीढ़ी को भारतीय सेना में शामिल होने, देशभक्ति की भावना अपनाने और जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों से निर्भीकता से लड़ने के लिए तैयार करना होता है।
अपने कार्यक्रमों में बच्चों को नशे से दूर रहने के लिए जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने युवाओं को सफलता के मूलमंत्र देते हुए कहा कि जीवन में हमेशा एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें और उसे प्राप्त करने के लिए पूरे समर्पण, अनुशासन, निरंतर अभ्यास और एकाग्रता के साथ प्रयास करें। दृढ़ संकल्प और कठिन परिश्रम से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
वर्तमान में वे देशभर के स्कूल, कॉलेज और सामाजिक मंचों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रसेवा, अनुशासन और नशे खासकर चिट्टे जैसी सामाजिक बुराई से दूर रहने के लिए निरंतर प्रेरित कर रहे हैं। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर विशेष बातचीत में कैप्टन (मानद) संजय कुमार ने बताया कि वह युवाओं के बीच जाकर उनमें देशभक्ति का जज्बा जगाने का कार्य कर रहे हैं। वह एक माह में औसतन 4 से 5 कार्यक्रमों में शिरकत कर रहे हैं। इनमें जब वे बच्चों और युवाओं से रूबरू होते हैं, तो उनका मुख्य उद्देश्य भावी पीढ़ी को भारतीय सेना में शामिल होने, देशभक्ति की भावना अपनाने और जीवन की कठिन से कठिन चुनौतियों से निर्भीकता से लड़ने के लिए तैयार करना होता है।
अपने कार्यक्रमों में बच्चों को नशे से दूर रहने के लिए जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने युवाओं को सफलता के मूलमंत्र देते हुए कहा कि जीवन में हमेशा एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करें और उसे प्राप्त करने के लिए पूरे समर्पण, अनुशासन, निरंतर अभ्यास और एकाग्रता के साथ प्रयास करें। दृढ़ संकल्प और कठिन परिश्रम से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
हिमाचल के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी परमवीर चक्र विजेता कै. विक्रम बतरा की शौर्य गाथा
कैप्टन विक्रम बतरा अपने साथियों के साथ। फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
कारगिल युद्ध में ये दिल मांगे मोर का उद्घोष कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बतरा आज भी नई पीढ़ी के प्रेरणास्रोत हैं। उन्हें देख युवा धड़ाधड़ सेना में भर्ती हुए। उनका ये दिल मांगे मोर का नारा आज भी कारगिल की वादियों समेत पूरे देश में गूंज रहा है।
बलिदानी कैप्टन विक्रम बतरा के पिता जीएल बत्रा ने कहा कि पूर्व में परिजनों को इस बात का मलाल था कि उनके बेटे की वीरगाथा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन अब यह मांग पूरी कर दी गई है। उन्होंने कहा कि अगले सत्र से पाठ्यक्रम में उनकी जीवनी शामिल होगी। इससे आने वाली युवा पीढ़ियां विक्रम के त्याग और पराक्रम से प्रेरणा ले सकेंगी। कैप्टन विक्रम बतरा को उनके रेडियो कॉल साइन शेरशाह के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में इन्हीं दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सेना ने दुश्मन के कब्जे वाली रणनीतिक चौकियों को अदम्य साहस और अद्वितीय वीरता के साथ पाकिस्तानी फौज को धूल चटाते हुए पुनः अपने नियंत्रण में लिया।
इन वीरों में सबसे प्रमुख नाम कैप्टन विक्रम बत्रा का है, जिन्हें उनके रेडियो कॉल साइन शेरशाह के नाम से जाना जाता है। 20 जून 1999 को उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए प्वाइंट 5140 पर कब्जा किया, चार दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और भारतीय सेना को महत्वपूर्ण विजय दिलाई।
इस सफलता के बाद उनका ऐतिहासिक उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ पूरे कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों के साहस, आत्मविश्वास और विजय का प्रतीक बन गया। बाद में प्वाइंट 4875 को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराते समय कैप्टन बत्रा ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र, भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रत्येक कारगिल दिवस पर टाइगर हिल, तोलोलिंग और कारगिल युद्ध स्मारक देश के वीर सैनिकों की अमर गाथा सदियों सुनाते रहेंगे।
बलिदानी कैप्टन विक्रम बतरा के पिता जीएल बत्रा ने कहा कि पूर्व में परिजनों को इस बात का मलाल था कि उनके बेटे की वीरगाथा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन अब यह मांग पूरी कर दी गई है। उन्होंने कहा कि अगले सत्र से पाठ्यक्रम में उनकी जीवनी शामिल होगी। इससे आने वाली युवा पीढ़ियां विक्रम के त्याग और पराक्रम से प्रेरणा ले सकेंगी। कैप्टन विक्रम बतरा को उनके रेडियो कॉल साइन शेरशाह के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में इन्हीं दुर्गम पहाड़ियों पर भारतीय सेना ने दुश्मन के कब्जे वाली रणनीतिक चौकियों को अदम्य साहस और अद्वितीय वीरता के साथ पाकिस्तानी फौज को धूल चटाते हुए पुनः अपने नियंत्रण में लिया।
इन वीरों में सबसे प्रमुख नाम कैप्टन विक्रम बत्रा का है, जिन्हें उनके रेडियो कॉल साइन शेरशाह के नाम से जाना जाता है। 20 जून 1999 को उन्होंने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए प्वाइंट 5140 पर कब्जा किया, चार दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और भारतीय सेना को महत्वपूर्ण विजय दिलाई।
इस सफलता के बाद उनका ऐतिहासिक उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ पूरे कारगिल युद्ध में भारतीय सैनिकों के साहस, आत्मविश्वास और विजय का प्रतीक बन गया। बाद में प्वाइंट 4875 को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराते समय कैप्टन बत्रा ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र, भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रत्येक कारगिल दिवस पर टाइगर हिल, तोलोलिंग और कारगिल युद्ध स्मारक देश के वीर सैनिकों की अमर गाथा सदियों सुनाते रहेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
कारगिल विजय दिवस 2026
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
लहूलुहान होने पर भी दुश्मनों को उन्हीं की मशीनगन से भून डाला
कारगिल युद्ध के दौरान 13वीं बटालियन जम्मू और कश्मीर राइफल्स के जवान संजय कुमार की अदम्य वीरता की कहानी आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। 4 जुलाई 1999 को संजय कुमार जब पॉइंट 4875 (चौकी नंबर 4875) पर हमले के लिए आगे बढ़े, तो एक जगह से दुश्मन की ऑटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी और भारतीय टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। संजय ने यकायक उस जगह हमला करके आमने-सामने की मुठभेड़ में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया। इसमें संजय कुमार स्वयं भी लहूलुहान हो गए थे। दुश्मन बौखलाकर भाग खड़ा हुआ और अपनी यूनिवर्सल मशीनगन वहीं छोड़ गया। संजय कुमार ने तुरंत वह गन हथियाई और उससे भागते हुए दुश्मन का सफाया कर दिया। इसके बाद संजय और साथियों ने पॉइंट फ्लैट टॉप कब्जे में ले लिया।
कारगिल युद्ध के दौरान 13वीं बटालियन जम्मू और कश्मीर राइफल्स के जवान संजय कुमार की अदम्य वीरता की कहानी आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। 4 जुलाई 1999 को संजय कुमार जब पॉइंट 4875 (चौकी नंबर 4875) पर हमले के लिए आगे बढ़े, तो एक जगह से दुश्मन की ऑटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलाबारी शुरू कर दी और भारतीय टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। संजय ने यकायक उस जगह हमला करके आमने-सामने की मुठभेड़ में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया। इसमें संजय कुमार स्वयं भी लहूलुहान हो गए थे। दुश्मन बौखलाकर भाग खड़ा हुआ और अपनी यूनिवर्सल मशीनगन वहीं छोड़ गया। संजय कुमार ने तुरंत वह गन हथियाई और उससे भागते हुए दुश्मन का सफाया कर दिया। इसके बाद संजय और साथियों ने पॉइंट फ्लैट टॉप कब्जे में ले लिया।
विज्ञापन
शहीद डोला राम (फाइल फोटो)।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
डोला राम से प्रेरणा पाकर क्षेत्र के 20 युवा हो गए सेना में भर्ती
नित्थर क्षेत्र के शकरोली गांव के शहीद डोला राम ने 3 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय में अदम्य साहस का परिचय दिया था। उन्होंने सियाचिन की चोटी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेते हुए 17 दुश्मनों को मार गिराया। इस वीरतापूर्ण कार्रवाई में उन्हें पांच गोलियां लगीं और देश के लिए बलिदान पाया।
बलिदानी डोला राम आज भी युवाओं के लिए हीरो हैं। उनके बलिदानी होने के बाद अब तक क्षेत्र से 20 युवा में सेना में जा चुके हैं। बलिदानी डोला राम की पत्नी प्रेमा देवी बताती हैं कि देश प्रेम उनकी नस-नस में भरा था और बलिदान होकर देश के लिए अपना कर्ज भी चुका गए। डोला राम तीन अन्य सैनिकों के साथ सियाचिन की चोटी पर दुश्मनों की टोह लेने भेजा गया था। दुश्मन की जानकारी सेना तक पहुंचानी थी। 3 जुलाई, 1999 को डोला राम ने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर 17 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया।
नित्थर क्षेत्र के शकरोली गांव के शहीद डोला राम ने 3 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के ऑपरेशन विजय में अदम्य साहस का परिचय दिया था। उन्होंने सियाचिन की चोटी पर पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेते हुए 17 दुश्मनों को मार गिराया। इस वीरतापूर्ण कार्रवाई में उन्हें पांच गोलियां लगीं और देश के लिए बलिदान पाया।
बलिदानी डोला राम आज भी युवाओं के लिए हीरो हैं। उनके बलिदानी होने के बाद अब तक क्षेत्र से 20 युवा में सेना में जा चुके हैं। बलिदानी डोला राम की पत्नी प्रेमा देवी बताती हैं कि देश प्रेम उनकी नस-नस में भरा था और बलिदान होकर देश के लिए अपना कर्ज भी चुका गए। डोला राम तीन अन्य सैनिकों के साथ सियाचिन की चोटी पर दुश्मनों की टोह लेने भेजा गया था। दुश्मन की जानकारी सेना तक पहुंचानी थी। 3 जुलाई, 1999 को डोला राम ने अपने तीन साथियों के साथ मिलकर 17 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया।