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क्यों किए जाते हैं श्राद्ध, क्या है पिंडदान का महत्व, जानिए सबकुछ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
Published by: Krishan Singh
Updated Fri, 27 Sep 2019 03:58 PM IST
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हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक की अवधि को पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार 13 सितंबर से शुरू हुए श्राद्ध पक्ष 28 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होंगे।
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श्राद्ध पक्ष को पितृपक्ष के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में जो जीव मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं उनकी पवित्र आत्माएं पितृपक्ष के दौरान धरती पर किसी न किसी रूप में अपने जीवित परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए आती हैं।
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डॉ. मस्त राम शर्मा
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वैदिक ज्योतिष अनुसंधान संस्थान शिमला के प्रमुख डॉ. मस्त राम शर्मा के अनुसार वंश परंपरा का विच्छेद न हो, इसलिए श्राद्ध करना आवश्यक माना गया है। पंच तत्व का शरीर स्वर्गारोहण के समय कारण रूप में रह जाता है। क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म और कारण नाम से शरीर तीन प्रकार का होता है। प्रत्यक्ष शरीर जड़ और स्थूल है। अगोचर अभिमानी जीव चेतन और सूक्ष्म है जो अन्न, प्राण, मानस, विज्ञान और आनंदमय इन पांच कोषों से बना होता है।
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25 तत्वों में से 17 सूक्ष्म तत्व शरीर में रहते हैं। मान्यता है कि हमारे शरीर से मरते समय क्रमश: प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान आदि पांच तरह की वायु निकल जाती हैं। बचे हुए स्थूल शरीर को अग्नि में जला दिया जाता है और सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा परलोक चली जाती है जिसे हम पितर कहते हैं। इसलिए वेद-शास्त्रों में मृतक का श्राद्ध में पिंडदान आदि का विधान है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से लेकर अमावस्य तक जिस भी तिथि को मृत्यु हुई हो उस दिन श्राद्ध करने का विधान है।
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डॉ. मस्त राम शर्मा के अनुसार श्राद्ध रूप में दिया गया भोजन पितरों को स्वधा रूप में मिलता है। पितरों को अर्पित भोजन उस रूप में परिवर्तित हो जाता है जिस रूप में उनका जन्म हुआ हो। यह भी माना जाता है कि जिसे श्राद्ध का भोजन खिलाया जाता है वह भोजन पितर को उसी रूप में मिल जाता है। यदि पितर पशु है तो घास के रूप में और यदि वह हिंसक जानवर है तो मास के रूप में भोजन परिवर्तित हो जाता है। देव बन जाने पर वह भोजन उसे अमृत रूप में मिलता है। श्राद्धों में पूजन के समय तिल,चावल, हल्दी आदि का विधान है। वंश परंपरा रूपी धागे का विच्छेद नहीं होना चाहिए, वह निरंतर बढ़ता रहना चाहिए। इसलिए श्राद्ध के दिनों में पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है। विच्छेद होने पर वंश नष्ट हो जाते हैं।
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