पाग दस्तूर में बदली सोच: जहां कभी गोद लिया जाता था वारिस, वहां अब बेटियों को मिली विरासत की बागडोर; तस्वीरें
Rajasthan: एक ओर सदियों पुरानी राजपूती परंपराएं, तो दूसरी ओर बदलते समाज की नई सोच। राजस्थान के पाली और नागौर जिलों से ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने वर्षों से चली आ रही रूढ़ियों को नई दिशा दी है। यहां 12 साल की तेजस्वी और 10 साल की भाविका को परिवार की राजगद्दी और विरासत का आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। देखें तस्वीरें
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विस्तार
राजस्थान को लंबे समय तक अपनी सामंती परंपराओं, पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था और रूढ़िवादी मान्यताओं के लिए जाना जाता रहा है। पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बावजूद वर्षों तक 'सरपंच पति' जैसी प्रवृत्तियां हावी रहीं और महिलाओं के अधिकार अक्सर केवल औपचारिकता बनकर रह गए। हालांकि अब समय बदल रहा है। समाज की सोच में धीरे-धीरे सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगा है। इसका ताजा उदाहरण पाली और नागौर में देखने को मिला, जहां सदियों पुरानी परंपराओं को समय के अनुरूप नया स्वरूप देते हुए दो नन्हीं बेटियों को परिवार और ठिकाने की आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया। इन दोनों घटनाओं ने बेटियों को समान अधिकार देने की दिशा में एक नई सामाजिक मिसाल पेश की है।
नागौर में टूटी परंपरा
नागौर जिले की रियां बड़ी पंचायत समिति के सुरियास गांव में भी ऐसी ही मिसाल देखने को मिली। यहां दिवंगत कानसिंह राठौड़ की 10 वर्षीय पुत्री भाविका कंवर को 'पाग दस्तूर' कर परिवार की आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
कानसिंह राठौड़ का 15 जुलाई को बीमारी के कारण निधन हो गया था। उनकी एकमात्र संतान भाविका कंवर है। बारहवें की रस्म के दौरान परंपरा के अनुसार किसी निकट संबंधी को गोद लेने पर चर्चा हो रही थी। तभी परिवार की महिलाओं ने स्पष्ट कहा कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं होता, इसलिए पाग दस्तूर भाविका का ही होगा।
परिवार के इस फैसले का पीहर और ससुराल पक्ष ने सर्वसम्मति से समर्थन किया। इसके बाद दादी के पीहर पक्ष से शंकरसिंह राजावत और ननिहाल पक्ष से महावीरसिंह सिंगोद ने भाविका को पगड़ी पहनाकर 'पाग दस्तूर' की रस्म पूरी कराई। इस निर्णय को ग्रामीणों ने बदलते समाज और बेटियों को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
मारवाड़ की सदियों पुरानी राजपूती परंपराओं और पुरुष-प्रधान व्यवस्था को समय के अनुरूप नया स्वरूप देते हुए पाली जिले के ऐतिहासिक खैरवागढ़ ठिकाने ने महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल पेश की है। पूर्व जागीरदार और दो बार सरपंच रहे ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा के निधन के बाद उनकी 12 वर्षीय पुत्री तेजस्वी कुमारी जोधा को खैरवागढ़ की राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
जीवन के उत्तरार्ध की अमानत हैं तेजस्वी
ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा ने अपने जीवन का लंबा समय संतान के बिना बिताया था। जीवन के उत्तरार्ध में उन्हें पुत्री तेजस्वी कुमारी जोधा का सुख मिला। 15 जून को 78 वर्ष की आयु में उनके निधन के समय तेजस्वी उनकी इकलौती संतान थीं। वर्तमान में वह सातवीं कक्षा में अध्ययनरत हैं। पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होने के बावजूद परिवार ने किसी रिश्तेदार को गोद लेने के बजाय तेजस्वी को ही विरासत सौंपने का फैसला किया। आज के दौर में कई स्थानों पर बेटियों को केवल पगड़ी पहनाकर औपचारिक रस्म निभाई जाती है, लेकिन खैरवागढ़ ने इससे आगे बढ़ते हुए उन्हें राजगद्दी का वास्तविक उत्तराधिकारी घोषित किया।
65 साल बाद हुआ 'पाग का दस्तूर'
खैरवागढ़ परिवार में करीब 65 वर्षों बाद 'पाग का दस्तूर' आयोजित हुआ। पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण यह परंपरा लंबे समय से रुकी हुई थी। परंपरा के अनुसार पहले ऐसे मामलों में किसी दूर के रिश्तेदार को गोद लेकर गद्दी सौंपी जाती थी, लेकिन इस बार गांव के बुजुर्गों, समाज के प्रतिनिधियों, जागीरदारों और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से तेजस्वी को उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया।
तलवार की धार से हुआ रक्त तिलक
17वीं सदी के ऐतिहासिक खैरवागढ़ किले में वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच समारोह आयोजित किया गया। मारवाड़ (जोधपुर) राजपरिवार की ओर से महाराजा गजसिंह के प्रतिनिधि पहुंचे और उन्होंने आधिकारिक गुलाबी पगड़ी तेजस्वी के सिर पर बांधी। राजपूती परंपरा के तहत युवराज सुरेंद्र शंकर सिंह ने तलवार से अंगूठे पर हल्का चीरा लगाकर निकले रक्त से तेजस्वी का राजतिलक किया। समारोह में मारवाड़ के कई जागीरदार परिवारों, विभिन्न ठिकानों के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लिया।
850 साल पुराना है खैरवागढ़ का इतिहास
खैरवागढ़ की शासकीय विद्यालय के शिक्षक गोविंद सिंह राजपुरोहित के अनुसार इस जागीर का इतिहास करीब 850 वर्ष पुराना है। कन्नौज के राजकुमार राव सीहा वर्ष 1155 के आसपास मारवाड़ आए थे और उन्होंने राठौड़ राजवंश की नींव रखी थी। आजादी से पहले खैरवागढ़ ठिकाने के अधीन 84 गांव थे, जो बाद में घटकर 12 गांव रह गए।
पिता के सपनों को पूरा करेंगी तेजस्वी
तेजस्वी कुमारी जोधा ने कहा कि वह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए पिता के अधूरे सपनों को पूरा करेंगी और गांव के विकास के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करेंगी। ग्रामीणों ने इस निर्णय को बेटियों के सम्मान और समान अधिकार की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।