Himachal: हाईकोर्ट ने कहा, विभागीय जांच में दोषमुक्त कर्मचारी को पिछली तिथि से मिलेंगे सभी सेवा लाभ
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मी को विभागीय जांच के कारण पदोन्नति से वंचित रखा जाता है और बाद में वह जांच में निर्दोष पाया जाता है, तो वह पिछली तिथि से सभी वित्तीय लाभ और पदोन्नति का हकदार है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी कर्मी को विभागीय जांच के कारण पदोन्नति से वंचित रखा जाता है और बाद में वह जांच में निर्दोष पाया जाता है, तो वह पिछली तिथि से सभी वित्तीय लाभ और पदोन्नति का हकदार है। अदालत ने सरकार को याचिकाकर्ता सुरेंद्र पाल चड्ढा को पदोन्नति के सभी वित्तीय लाभ देने का आदेश दिया। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को पदोन्नति लाभ न मिलना उसकी गलती नहीं, बल्कि लंबित कार्यवाही के कारण था। याचिकाकर्ता वर्ष 2012 में हेडमास्टर नियुक्त हुए थे। वर्ष 2015-16 के दौरान उनके खिलाफ कुछ शिकायतें दर्ज की गईं, जिसके चलते विभाग ने उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी।
इस कार्यवाही के लंबित रहने के कारण जून 2016 में जब उनके कनिष्ठ सहयोगियों को प्रिंसिपल पद पर पदोन्नत किया गया, तो याचिकाकर्ता का नाम सीलबंद लिफाफे की प्रक्रिया के तहत रोक दिया गया। जांच पूरी होने के बाद जब याचिकाकर्ता पूरी तरह निर्दोष पाया गया, तो सरकार ने उन्हें पदोन्नति तो दी, लेकिन लाभ नोशनल बेसस पर दिए। सरकार का तर्क था कि काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत और फंडामेंटल रूल 17(1) के तहत जब तक कर्मचारी ने पद पर कार्य न किया हो, वह वास्तविक वेतन का हकदार नहीं है। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि 2 जून 2016 से याचिकाकर्ता को प्रधानाचार्य पद के सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। इस प्रक्रिया को 3 महीने के भीतर पूरा किया जाए। यदि सरकार निर्धारित समय सीमा में लाभ नहीं देती है, तो उन्हें 6 प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान करना होगा।
विलंब माफी के आवेदन पर दिया निर्णय अंतरिम नहीं : हाईकोर्ट
ल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 14 के तहत राजस्व अधिकारी की ओर से विलंब माफी के आवेदन पर दिया गया निर्णय अंतरिम आदेश नहीं है। इसके खिलाफ अपील की जा सकती है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि कलेक्टर की ओर से देरी माफ करने का आदेश केवल एक अंतरिम आदेश था, इसलिए इसके खिलाफ अपील नहीं हो सकती। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि देरी माफ करने का आवेदन स्वीकार हो या खारिज, वह उस विशेष कानूनी बिंदु (सीमा अवधि) को निर्णायक रूप से तय करता है। यदि देरी माफ नहीं होती, तो अपील खत्म हो जाती। यदि माफ हो जाती है, तो अपीलकर्ता का सुनवाई अधिकार स्थापित हो जाता है। हाईकोर्ट ने वित्तीय आयुक्त के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को मंडलायुक्त के पास अपील दायर करने की छूट दी है। यह मामला धर्मशाला के असिस्टेंट कलेक्टर (प्रथम श्रेणी) के पास लंबित विभा
जन की कार्यवाही से शुरू हुआ था। 17 जून 2017 को असिस्टेंट कलेक्टर ने विभाजन के तरीके को मंजूरी दी थी। इस आदेश को एक अन्य प्रतिवादी ने कलेक्टर धर्मशाला के पास चुनौती दी। चूंकि अपील में देरी हो चुकी थी, इसलिए धारा 5 (लिमिटेशन एक्ट) के तहत देरी को माफ करने का आवेदन भी किया गया था। 7 नवंबर 2023 को कलेक्टर ने देरी को माफ करने का आवेदन स्वीकार कर लिया और मुख्य अपील को सुनवाई के लिए रख दिया। याचिकाकर्ता अशोक राय ने इस आदेश को सीधे वित्तीय आयुक्त (अपील) के पास रिवीजन याचिका के जरिये चुनौती दी।