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AI: ऑस्ट्रेलिया में एआई के जरिए कोर्ट में गलत तथ्य प्रस्तुत करने का सनसनीखेज मामला, वकील ने जज से मांगी माफी

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Tue, 27 Jan 2026 05:33 PM IST
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सार

AI hallucination: ऑस्ट्रेलिया की विक्टोरिया सुप्रीम कोर्ट में एक हत्या के मामले के दौरान एआई से मिली गलत और मनगढ़ंत जानकारी पेश करने पर एक वरिष्ठ वकील को जज से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। वकील ने एआई की मदद से ऐसे अदालती फैसलों और सबूतों का हवाला दिया जो असल में कभी मौजूद ही नहीं थे। जब अदालत की जांच में यह गड़बड़ी सामने आई तो जज ने कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि न्याय व्यवस्था वकीलों की सत्यनिष्ठा पर टिकी होती है। यह मामला एआई 'हैलुसिनेशन' के बढ़ते खतरे को उजागर करता है और अदालतों में एआई टूल्स के इस्तेमाल से पहले सख्त सत्यापन की जरूरत पर जोर देता है।

Australian Lawyer Apologises After AI-Generated Fake Court Citations Exposed in Murder Case
AI in Court - फोटो : X
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विस्तार
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जरिए कोर्ट में गलत तथ्य पेश करने के बाद ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े वकील को जज से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने एक हत्या के केस में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल किया था। गलती यह हुई कि एआई ने उन्हें ऐसे पुराने अदालती फैसलों और सबूतों के बारे में बताया जो असल में कभी हुए ही नहीं थे और वकील ने बिना जांचे उन्हें कोर्ट में पेश कर दिया। यह घटना विक्टोरिया के सुप्रीम कोर्ट में हुई। आजकल दुनिया भर की अदालतों में यह समस्या देखने को मिल रही है कि एआई अक्सर गलत या मनगढ़ंत जानकारी दे देता है। वकील को अपनी इस गलती के लिए जज से माफी मांगनी पड़ी।

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क्या है पूरा मामला?

ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया सुप्रीम कोर्ट में एक वरिष्ठ वकील, ऋषि नाथवानी (किंग्स काउंसिल), ने हत्या के एक मामले में जज से माफी मांगी है। दरअसल, उन्होंने केस की पैरवी के लिए एआई का इस्तेमाल किया था, जिसने उन्हें ऐसे फर्जी अदालती फैसले और सबूत दे दिए जो असल दुनिया में कभी हुए ही नहीं थे। वकील ने बिना जांचे इन झूठे तथ्यों को कोर्ट में पेश कर दिया।

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जब यह गलती पकड़ी गई तो नाथवानी ने इसकी पूरी जिम्मेदारी ली और जज जेम्स इलियट से कहा कि वे इस चूक के लिए बहुत शर्मिंदा हैं। इस गड़बड़ी की वजह से केस के निपटारे में 24 घंटे की देरी हो गई। हालांकि, बाद में जज ने अपना फैसला सुनाते हुए आरोपी किशोर को उसकी खराब मानसिक हालत के आधार पर हत्या के आरोप से बरी कर दिया। यह घटना दिखाती है कि कैसे दुनिया भर की अदालतों में एआई के कारण गलतियां बढ़ रही हैं।

अदालत की कड़ी टिप्पणी

जस्टिस इलियट ने वकीलों के इस व्यवहार पर अपनी गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह गलती जिस तरह से सामने आई, वह बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है। जज ने समझाया कि पूरी न्याय व्यवस्था और अदालती कार्यवाही इस बुनियादी भरोसे पर टिकी होती है कि वकील जो भी जानकारी दे रहे हैं, वह सच है। कोर्ट का वकीलों के तर्कों पर भरोसा कर पाना ही सही इंसाफ करने के लिए सबसे जरूरी है।

कैसे पकड़ी गई गलती?

वकीलों ने बचाव में जो दस्तावेज पेश किए, उनमें विधानसभा के कुछ भाषण और सुप्रीम कोर्ट के ऐसे पुराने फैसलों का हवाला दिया गया था जो असल दुनिया में कभी हुए ही नहीं थे। जब जज की टीम ने इन फैसलों को रिकॉर्ड में खोजने की कोशिश की और उन्हें कुछ नहीं मिला तो उन्होंने वकीलों से उन फैसलों की कॉपी मांगी। तब जाकर वकीलों ने स्वीकार किया कि वे सारे हवाला 'मनगढ़ंत' थे। वकीलों ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने शुरू की कुछ लाइनों की जांच की थी और गलती से यह मान बैठे कि आगे की सारी जानकारी भी सही होगी।

एआई के इस्तेमाल पर चेतावनी

जज ने वकीलों को याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल ही एआई के इस्तेमाल को लेकर नियम जारी किए थे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि एआई से तैयार की गई किसी भी जानकारी का इस्तेमाल तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसकी अलग से और गहराई से जांच न कर ली जाए। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वकीलों ने इस मामले में किस एआई सिस्टम का इस्तेमाल किया था।

दुनिया भर में बढ़ रहे हैं ऐसे मामले

कानूनी दुनिया में एआई के जरिए गलत जानकारी (जिसे 'एआई हैलुसिनेशन' कहते हैं) देने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2023 में अमेरिका में एक विमान दुर्घटना के केस में चैटजीपीटी का इस्तेमाल कर फर्जी रिसर्च पेश करने पर दो वकीलों और उनकी फर्म पर 5,000 डॉलर का जुर्माना लगाया गया था।

इसी तरह, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वकील माइकल कोहेन ने भी एआई की मदद से ऐसे फर्जी फैसलों का हवाला दिया था जो कभी हुए ही नहीं थे। बाद में उन्होंने माना कि उन्हें पता ही नहीं था कि यह टूल झूठ भी बोल सकता है। वहीं, ब्रिटेन की हाई कोर्ट की जज विक्टोरिया शार्प ने चेतावनी दी है कि गलत जानकारी को असली बताकर पेश करना 'अदालत की अवमानना' माना जाएगा, जिसके लिए उम्रकैद तक की सजा हो सकती है।

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